पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२१५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२११ उसे वैसा ही वर दिया। इधर इन्द्रादि देवतापाने जब शान्तभावसे महम करते तथा चमता रहने पर भी किसीके सुना कि शिवदासको केवल एक पत्र बुननेसे हो हमास विरुद्ध ये हाथ न उठाते हैं। इनको निहिता हो या तकको जीविका प्रतिपालन करनेका वर मिला है तो नही तोभो ताँती कासे की ये निर्वाध पोर कापुरुष उन्होंने सोचा कि ऐसा होनेसे ममस्त मनुष्योंको वस्त्र नहीं समझ जाते है। मनुष्योंका या विखास रसमा प्रवल है मिलेंगे, ऐसो हालत में अब उपाय वह करना नितान्त किनकी निविताके विषय में इस साल कई एक पावश्यक है जिससे वह शिवदाम अनेक वस्त्र प्रस्तुत कर गल्प प्रचलित हो गये हैं। कोई तातो घास के जंगलमें सके ऐसा मोच कर उन्होंने सरस्वतीको शिवदामको स्त्री बाड़के भमसे तैर रहा है, उधर कोई तातो पृथ्वो पर कुशावतोके पास भेजा। सरस्वतो कुश्शावतोके कण्ठ पर गिरी हुई रोटोको जो चन्द्रमाके नमसे देख रहा जा बैठों । इतने में जब शिवदास वर ले कर घरको लौटा है, कोई ताँती लावाके बन्धन में बंधा हुपा है, और चाओ तो कुणावतीने उमसे पूछा "आपने कौनसा वर लिया या दलपति पा कर उसके मुंहसे खड़का ढकन, आँख. है?" शिवदासने आद्योपान्त समस्त विवरण कह सुनाया। से बन्धन और कानसे कई खोल कर अपनो अगाध कुशावतो सरखतीको प्ररोचनासे बोलो, “प्राह : पापन बुद्धिका विकाश करते हुए स्तम्भ काट कर हाथ बाहर यह क्या वर लिया है ? यदि एक वस्त्र बुन कर छह निकालनेका उपाय बतला रहा है तथा उमो समय दूसरो माम तक बैठे खायगे तो बालबच्चे किम तरह इस बार ऑखम भरको, मुहमें खड़ और कानमें कई डाल कार्य को सोखेंगे, प्रतिदिन कपड़ा बुननेमे हो पुत्रगण देता है यह जान कर कि मायद सुतीक्ष्ण बुद्धि बाहर न कर्मिष्ठ हो सकेगे। इसलिये आप अभी जा कर वर निकल जाय। घर कोई तातो दूध देनेवाली गायको लौटा दीजिये और इस बासको उनमे प्रार्थना कीजिये। एक मास तक न दुक कर पिलवार के दिन एक ही बारमे कि में प्रतिदिन कपड़ा बनगा और प्रतिदिन खाऊँगा।" । उसके एक मासका दूध जब दुहने के लिये जाता पौर शिवदास स्त्रोको बुद्धिको प्रग'मा करते हुए उसो समय उतना दूध नहीं पाता है तो गायको पोठ पर बैठी हुई गौरोके पाम गया और उक्त वर लोटा कर पुनः घर मक्खीको कोरचोर समझ कर मारनेमें गायको हो हत्या पाया। उसी दिनसे वह कपड़ा बुनने लगा और उसे प्रति कर डालता है और वह मक्खो जब उड़ कर उसके दिन बेच कर खाने लगा। देवताको इच्छा पूरी हुई। भाईके जपर जा बैठती है तो उसका भाई उसे बतला इस तरह बुद्धिमान् तन्तुवायोंको सुबुद्धि आदि पुरुषने देता है कि मक्खो यहाँ है, मक्सोको मारनेमें वह अपने खीय महा बुद्धिमत्ताका परिचय दे कर अपने को तथा भाईको हो धराशायो कर देता है। उधर कोई तातो अपने वशधरोंको कम कुगल और परिश्रमी होने में बाध्य लोभसे कष्ट पा रहा है और कोई अभिमानमें चूर है। किया। आज भी अन्न तन्तुवायगण अपनी दुरवस्था देख कहीं नाँनो दलबल के साथ मड़कसे साड़नेके लिये जा कर इस उपाख्यानको करते हुए अपने आदिपुरुषांको रहा है। इस तरह के सेकड़ों गल्प अत्यन्त रखित भावले दोषी ठहराते है। उन्हें ग्लानि करते हैं। ये सब गणतन्तुवायोकी नि- यह गल्प यथार्थ में मत्य हो वा न हो, लेकिन साधा- हिसाके परिचायक हों या नही, रचयिताको विहे षवुद्धि, रण मनुचोका दृढ़ विश्वास है कि तातियों की बुद्धि उनके परनिन्दामियता और तलवायोंके अपर वहमूल बैर उपाख्यान-वणित आदि पुरुष से अधिक पृथक नहीं है। स्पष्ट प्रक्षाथ करते है। तांतीकी निधि और मौकताका पर्थ पारिभाषिकमा जो कुछ हो, पाज कल बहुतसे सन्तुवाय-युवक हो गया है, और इसी पर ये निरीह, टुल, भोक, उद्यम- अपनी प्रखर बुद्धिमत्ताका परिचय देते हुए राज्यकार्य में शून्य और थोड़े ही में सन्तुष्टचिप्स हो जाते है। समस्त प्रविष्ट हो रहे हैं। ये जिस तरह तोष्ण बुद्धि, मर्व कार्य दिन परिश्रम करके अत्यन्त कष्टसे दिन व्यतीत करने कुशलता, उद्यमशीलता प्रभृति द्वारा बहुतोको परास्त पर भी ये संतुष्ट रहत है। बलवानका पत्याशार ये कर रहे हैं, उस पब कोई उन्हें निर्वाध कहनेका