पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२१७

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"सृष्टिश्च प्रलयश्चैव देवतानां यथार्चन । "आपमं त्रिविध प्रोतं चतुर्षमेश्वर स्मृतम् ॥ साधनं सर्वेषां पुरश्चरणमेव व ॥ कल्पश्चतुर्विधः प्रोक: भागमो शामरस्तथा । षट्कर्मसाधनंचैव ध्यानयोगश्चतुर्विधः । मामलश्च तथा तन्त्रं तेषां भेदा: पृथक् पृथक ॥" सप्तमिलेक्षणैर्युक्तमाग तद्विदुर्बुधाः ॥" भागम तीन प्रकारका है, चौथा रखर । कल भी मुष्टि, प्रलय, देवतामोको पूजा, सबका साधन, पुर चार प्रकारका है-पागम, डामर, यामल और तंत्र । वरण, षटकर्म साधन और चतुर्विध ध्यानयोग, इन सात महाविश्वसारतबमें लिखा है- प्रकारके लक्षणों के रहने पर उसको पागम कहा जा "चतुःषष्टिश्चतन्त्राणि यामलादीनि पार्वति। मकता है। सफलानीह वाराहे विष्णुकान्तासु भूमिषु। "सर्गश्च प्रतिसर्गश्च मन्त्रनिर्णय एव च । काभेदेन तन्त्राणि कषितानि च यानि च। देवतानाच संस्थानं तीर्थानाश्चैव वर्णनम् ॥ पापमोहनायैव विफलानीह सुन्दरि।" तथैवाश्रमधर्मश्च विप्रसंस्थानमेव च। यामल बादिको ले कर ५४ विष्णु कान्ता भूमि. संस्थानश्चैव भूतानां यन्त्रागानव निर्णय: ॥ पर फलदायक। कल्पभेदसे जोन की गये, उत्पत्तिविबुधानाच तरुणां करूपसंज्ञितम् । पाषण्ड मोहन के लिए है, उनसे कुछ फल नहीं होता। संस्थान ज्योतिषाश्चव पुराणाख्यानमेव च ॥ श्रेष्ठता। महानिर्वाण तबमें महादेवने कहा है - कोषस्य कथनश्चैव व्रतानां परिभाषणम् । "कलिकल्मषदीनानां द्विजातीनां सुरेश्वरि । शौचाशौचस्य चाख्यानं नरकाणाश्च वर्णनम् ॥ मेध्यामेधाविचाराणां न शुसिः श्रोतकर्मणा। हरचक्रस्य चाख्यान बीपुंसोश्चैव लक्षणम् । न महिनायैः स्मृतिभिरिसिदिनुणा भवेत् ॥ राजधा दानधर्मी युगधर्मस्तथैव च ॥ अत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्य सत्य'मयोच्यते। व्यवहारः कथयते च तया चाव्यात्मवर्णनम् । विना त्यागममार्गेन कलो नास्ति गतिः प्रिये। इत्यादिलक्षणयुक्तं तन्त्रमित्यभिधीयते ॥" श्रुतिस्मृतिपुराणादौ मयेवोक्त पुरा विवे।" सृष्टि, प्रलय, मंबनिणय, देवताओं का संस्थान, आगमे। कविधानेन कलौ देवान् यजेत् सुधी: २० । तो वर्णन, पायमधर्म, विप्रसस्थान, भूतादिका. कलिक दोषसे दोन बाण क्षत्रियादिकं पवित्र पौर संस्थान, निर्णय, विवधगणको उत्पत्ति, कल्प अपबित्रका विचार न रहेगा। इसलिए वेदविहित कम वर्णन, ज्योतिष-संस्थान, पुगणाख्यान, कोष कथन, व्रत हारा वे किस तरह मिशिलाभ करेंगे ? एमी अवस्थाम कथा, शौचाशीचवर्णन, स्त्री-पुरुषका लक्षणा, राजधर्म, स्मृतिमंहितादिके हारा भी मानयों के इष्ट को मिति नहीं दानधर्म, युगधर्म, व्यवहार और आध्यात्मिक विषयको होगी। प्रिये ! मैं सत्य हो कहता वना रत्यादि लक्षणों के रहने पर उसको तंत्र कहा कि कलियुगमें जा सकता है। पागममार्ग के सिवा और कोई गति नहीं है। शिव! "सृष्टिश्च ज्योतिषारूपाने नित्यकृत्यादीपनम् । मैंने वेद, पति और पुराणादिमें कहा है कि कलियुगमे कमसूत्रं वर्णभेदो जातिभेदस्तथैव च ॥ साधक तन्योलविधान हारा देवोंकी पूजा करेंगे। धुगधर्मश्व संहगातो यामलस्याटलक्षणम् ।" "कलावगममुल्लङ्य योऽन्यमार्गे प्रवर्तते । . सष्टितत्त्वे, ज्योतिष-वर्णन, नित्यवत्य. कल्पसूत्र, न तस्य गतिरस्तीति सत्यं सत्यं न संशयः ॥" वर्णभेद, जातिभेद और युगधर्म, ये पाठ यामलके कलिकालमें जो पागम (तन्त्र ) उन्नान करके पन्य मार्ग पवलम्बन करेगा संचमुच हो उसको साति .. वाराहीसबके मतसे समस्त तबके नोक देव नहीं होगी। खोक, बलोक और पाताललोक में ८ लाख तथा भारतमें "निवीयर्याः धौतजातीया विषहीनोरगा इव। शाखमावान- . ... मयादौ सफ लम्कलो ते मृतका हव। . Vol. IX.:54