पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२२०

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२१६ नाम लोकसंख्या तारा, ४१ ववधात, ४२ विमसमभा, ४३. मणिशक्षिका प्रत्यनिरासस ८८.. १४ वे लोक्यविजय, ४५ मम्यूट ४६ मर्म कालिका, ४७ महालक्ष्मीमन्त्र ५५.५ कुरुकुला, ४८ भूतडामर, He कालचक्र, ५० योगिनी, देवोतन्त्र १२००० ५१ यागिनो ज्वार, ५२ यागिनोजाल, ५३ वोगाम्बरपोट, त्रिपुगणव ५४ उखडामर, ५५ वसुन्धरामाधन, ५ नराम, ४७ डाका- सरस्वतीतन्त्र २२०५ र्णव, ५८ क्रियासार. ५. यमान्तक, ६० मञ्ज श्रो. ६१ प्राधातन्त्र २२८१५ तन्त्रसमुच्चय, ६२ क्रियावसन्स, ६३ हयग्रोव, ६४ सहीण, योगिनीता (श्म) २२५३२ ६५ नाममनोति, ६६ प्रमृतकर्णिकानामसङ्गोति, ६७ योगिनीतन्त्र (श्य) गूढ़ोत्पादनामसीति, ६८ मायाजान्न, ६८ सानोदय, वाराहीतन्त्र ७० बमन्ततिलक, ७१ निष्पवयोगांबर, और ७२ गवाचतन्त्र . ४५१५ महाकालतन्त्र नारायणोतन्त्र ५०२०३ इनके मिवा हिन्दुओं के तान्त्रिक मवच को भाँति नेपाली मृडानीमन्त्र ( १म) ४४८. बोडोंमें भी प्रमग्य धारणोम ग्रह है। बौहतन्त्रोंमें बह- मृडामोतन्त्र ( २य) का चोन बोर तिब्बनी भाषा अनुवाद हो गया है। मृडानीतन्त्र ( श्य) तिब्बतमें तन्त्र ऋगयुके नामसे प्रसिद्ध हैं, ऋग.युद् ७८ वाराहीसमें लिखा है-इनके मिवा बौद्ध .और भागों में विभक्त हैं। इनमें २६५. स्वतन्त्र ग्रन्थ है । कपिलोत भनेक उपतन्त्र है । जैमिनि, वमिष्ठ, कपिन्न, उनमें प्रधानतः चौहों के गुह्य क्रिया कागड, उपदेश, स्तव, भारद, गर्ग, पुनम्त, भार्गव, सिड, याज्ञवल्क्य भृगु, शुक्र कवच, मन्त्र और पूजाविधिका वणन है। शिवोक्ता तन्त्र घरम्पनि प्रादि मुनियों ने बहुतमे उपतन्त्र रचे थे, उनको शाता, शेव और वैष्णवके भेदमे तीन प्रकार के हैं। तान्त्रिक गिनतो नहीको मकती। गण स्वसंप्रदायभुना सन्त्र के अनुमार हो चला करते हैं। हिन्दुओं के तन्त्र जिस प्रकार शिवोत है, घोडौके तन्त्र उत्पत्ति । तम्ब गास्त्रको उत्पत्ति कदमे हई है, इसका भी उमो प्रकार बुद्ध हारा वर्णित है। बोडोंके निर्णय नहीं हो मकता। प्राचोन स्मृतिसहितामें तन्त्र भी मस्कृत भाषामें रचे गये हैं । बौद्यतन्त्रों में ये तन्त्र चौदह विद्याओं का उल्लेख है, किन्तु उनमें तम्ब ग्योत हो प्रधान-१प्रमोदमहायुग, २ परमार्थ सेवा, ३ नहीं हुआ है। इसके सिवा किसो महापुराणमें भी पिण्डोक्रम, ४ सम्म टोडव, ५ हेवज, ६ बुद्धकपाल, ७ तन्त्रशास्त्र का उल्लेख नहीं है, इत्यादि कारणों से सम्ब मम्बरतन्त्र वा सम्बरोदय, ८ वाराहीतम्ब वा वाराही. शास्त्रको प्राचीनतम पार्यशास्त्र नहीं माना जा सकता। कल्प, ८ योगाम्बर, १० डाकिनीजान्न, ११ शुकयमारि, तन्त्रोक्त मारणोच्चाटन-वशोकरणादि पाभिचारिक क्रिया- १२ कृष्णयमारि, १३ पौतयमारि, १४ रायमारि, १५ का प्रसङ्ग अथर्व संहितामें पाया जाता है सहो किन्त खामयमारि, १६ क्रियास ग्रह १७ क्रियाकन्द. १८ क्रिया- तन्त्र के अन्यान्य प्रधान लक्षण नहीं मिलते । ऐमो दशामें सागर, १८ क्रियाकल्पद्म, २० क्रियागाव, २१ अभिधा- तन्त्रको हम अथर्व सहितामूलमें नहीं कह सकते। नोत्तर, २२ क्रियासमुच्चय, २३ साधनमाला, २४ साधन. अथर्ववेदोय वृसिहतापनीयोपनिषदमें सबसे पहले तन्त्र समुच्चय. २५ साधनस ग्रह, २६ साधनग्न, २७ माधन- का लक्षण देखने में पाता है। इस उपनिषदमें मन्न. परोधा, २८ साधनकल्पलता, २८ तवज्ञान, ३० जान- राज-नरसिंह-अनुष्टुभ प्रमङ्गमें सान्त्रिक मालामन्चका- सिधि, ३१ गुहासिद्धि, ३२ उद्यान, ३३ नागार्जुन, ३४ स्पष्ट प्रीभास सूचित हुआ है। शराचार्य ने भी जब उता ३४ योगपीठ, २५ पीठावतार, २६ कालवीरतन्ध वा उपनिषद के भाष्यको रचना को तब नि:सन्द वह पहरोषण, ३७वष्यवीर, ३८ वषा सत्व, २८ मरीषि, ४. वो ७वीं पताम्होने भी पालेका जिल्लोक