पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२२२

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२१८ '। माली, साकी यी मतान्होने रहोंने बवा, चिवान्यास, नामादिविता, नित्वादिबिया, मुस तिम्बत जा कर तांत्रिक धर्म का प्रचार किया था। यह विषा, सवन्यास, पारपूजा, सण, उपविद्यान्यास, सभवानी किनमे भी पाले किमी वनवासीने जा पातनिर्यय, नित्यपूजा. सर्याय तीर्थ संसार, गुर्मादि कर वहां धर्म प्रचार किया होगा। प्रतएव मभव है पूजन, दोचा, पूर्वाभिषेक, प्रायवित्त, निम्बपुष्यपूजा, किवा वा गोड़से ही नेपाल, भूटान, चीन पाटि दूर दमनकपूजा, वसन्तपूजा, योचक्रपूजा, दीक्षाकाल. दोक्षा- देशों में तान्त्रिक धर्म विस्त एषा था। . भेद, सर्वतोभद्रादिचननिर्षय, यवनिरूपण, पुन्धार गुजराती भाषामें लिखे गए 'भागमप्रकाश में लिखा वाचन, नान्दोवाद, नवयोनि, कौलवाह, मबयोधम, हिन्दू राजाभोंके राज्यका मालियों ने गुजरात मन्योहार. मामपागयण, तस्वपारायण, पक्षाान्याम, महा- उभोई, पावागढ़, अहमदाबाद, पाटन प्रादि स्थानेमि प्रा घोढान्यास, महान्यास सम्मोहनन्यास, सौभाग्यवईन कर कालिकामूर्ति स्थापित को घो। बहतमे हिन्दू व्यास, अन्त्येष्टिक्रिया, विविधमद्रा, पवधूतादिणिय .राजा और प्रधान प्रधान व्यक्तियों ने उनको मदीना आदि नाना विषयोंका वर्णन किया गया हैं। यहर की थी। (आगम १२ ) वास्तव में देखा जाय मनुके टीकाकार काम कमने लिखा है- तो फिलहाल जो बाल पादि देशों में मवगुरुका प्रच- "वैदिकी तान्त्रिकीश्चैव द्विविधा श्रुति कीर्तिताः।" लन वह भी मांत्रिकीके प्राधान्य कालमें प्रनलित हा वैदिको और तान्त्रिकी इन दो श्रुतियोका निटंग है। था। पेमा मगुरुका नियम पहले मथा। बङ्गालो इसलिए कुछ कमहके मतमे, तन्त्रको भी श्रुति कहा जा तांत्रिकीनोम प्रथाका प्रथम प्रचार किया था । उनको सकता है। पादियामलके मतसे- देखा-देखी भारत के नाना स्थानी वा नाना मप्रदायों में "आगतः शिवक्त्रेभ्यो गतोपि गिरिजालये। पस प्रकारके मंत्रगुरुकी प्रथा चल पड़ी है। मग्न तस्य हदम्भोजे तस्मादागम उच्यते ॥" __ मभी सत्र प्राचीन नहीं माने जामकते। त्यागिनी. हे दुर्ग! शिवके मुखमे निकल कर तुम्हारे दयपनमें तब कोचराजबंगले प्रतिष्ठाता विशमिका परिचय मग्न हुपा, रसीलिए रमको पागम कहते है। दिया गया है। विश्वभारत में नित्यानन्दको जन्मकथा कुलाणं वके मतसे- का वर्णन किया गया है। इसलिए ऐसे तत्र ईसाकी इते श्रुत्युक्त आचारबेतायां स्मृतिसम्भवः । १५वीं शताब्दीसे बादकसमें मन्देही क्या? द्वापरे तु पुराणोकं ब्लो भागमकेवलम् ॥ बङ्गालमें महानिर्वाचनका सर्वव पादर होता है, विष्णुयामलमें वर्णित है- वित जगह किम्बदन्ती है कि, मामा राममोहन "आगमोकषिधानेन कलौ देवान् यजेत् सुधीः। राब गुरुने रस पन्धकी रचना की थी। शतिरनाकर- नहि देवाः प्रसीदन्ति कलो चान्यविधानतः॥" में हाधिवतंत्रणा उहख है। किन्तु नितान्त नः बुद्धिमान मनुष्य कलिकालमें पागमोत व्यवस्थाक निक प्रावतीषिणोके मिवा अन्य किसी प्राचीन वा अनुमार ही पूजा करेंगे। अन्य नियमसे पूजा करनेमे माधुनिक संवेसया महानिर्वाणतबका नामोखेच देवगण प्रसब नहीं होते। गरहनेसे इसका पानिकस्व ही प्रतिपन होता है। बद्रयामलके मृतसे- बोरं, मिक्तबमें लाल पन इत्यादि शब्दो हारा यही "मन्त्रैर्भवेदीक्षास्वागमोक शृणु प्रिये प्रमाचित होता कि, भारतमें जोंके पागमनके यो कृत्वा कलिकाले च सभी मेवरा" पादाम्बोजी रचना हुई। . भागमोसा परामबहारा दीचा लेग, रसके सेमेसे · प्रतिमव विषय । तवीमें प्रात:स्मरण, जागविधि, मनुषको कलिकालमें सर्व अभीष्टको सिधि होगी। 'विपुल पारण. भूपति, भूतपति, प्राणायाम, संध्या बीके मतदे, सबसे पालेदीचा पाय करके अप, पुरवाया गयास, परमात्मा बधिर्मा पोई ताबिक बागि व डावना चाहिये, विना