पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२२३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


टोचाक ताविककार्य में अधिकार नहीं है। सा परमाबोमवार की शुरुषी पार . गौतमीवत बमें लिया - पामे जिनकी समातिनीकी सदसर माना "हिवानामनुपनीताना स्वधर्माध्ययनादिषु । चाहिये। संशिए समो प्रधान बॉन किया- यवाधिकारी नास्तीह सन्ध्योपासनकर्मयु॥ "बहान तिमिरान्धस्य मामाच्या तथास्यदीक्षितानान्तु मंत्रतंत्रार्चमादिषु । मेजयुन्मीलित मेन तसै मापुरमै गमः।" नाधिकारोऽस्त्यतः कुर्यादात्मानं शिवसंस्कृतम् ॥" पनामरूप तिमिररोगोमा . मस्य जैसे हिजातियोंको उपनयन बिना हुए पचयन पौर पचमको शशाकाहारा जो उसकी पचता नर कर मन्यापूजा पादि स्वकर्म में अधिकार नहीं होता. उसो सामनवको खोल सो, ऐसे बोगुनको नमस्कार है। तरह पदोक्षित व्यक्तियों को मवतव और पूजादि कर्ममें से गुर, वे शिष्धकी जरूरत है। गौतमीव. अधिकार नहा शेता। इसो लिए शिवसत होना तंबमें लिखा- . पावखकरे। सबके अध्याय लिहा- 'शिष्यः कुलीमः शुखामा पुरुषापरायणः । "ददाति दिव्यतावचेत् क्षिणुपात पापसन्तति । अपीतवेदकुशल: पितृमातृहिते रतः। तेन क्षेति विख्याता मुनिभिस्तंत्रपारगैः। धर्मविधर्मकर्ता व पु-एमपणे रतः। • यां विना नै व सिशि स्यान्मंत्रो वर्षशतैरपि ॥" सदा सावार्थतस्वहो तवेदो खाशयः॥ दिव्यता देती और पापसन्तति नाश करती है, इस हितैषी प्राणियो विस्य परलोकार्यकर्मव । लिए तपारग मुभिहाग यह दोक्षा नामसे प्रसि। वाङ्मन:कायबसुनिर्गमाभूषणे रतः। इसके बिना सौ वर्ष मंत्र पढ़नेसे भो सिधि नहीं होतो। अनित्यकर्मणसमागी मिस्याशुष्ठानतस्परः । दीक्षा लेने के लिए सदगुरुको पावश्यकता है। दोला। जितेन्द्रियो मितालस्यो जितमोहविवस्वास। गुरुका सक्षण इस प्रकार है- गुरुपद्गुणतेषु तस्कममादिषु भक्तिमान। "शान्तो दान्तः कुलीनश्च शुद्धान्त:करणः सदा । एपम्बिषो भवेत्रियस्त्वितरो गुस्सुम्यायः । पंचतत्वाचको यस्तु सद्गुरुः स प्रकीर्तितः। वर्षेकेण भवेदोग्यो विप्रः सर्वगुणाम्वितः। सियोऽसाविति चेत् ख्यातो बहुभिः शिष्यपासकः। वर्षहवे तुराजन्यो वैश्यस्तु पसरविनि:: चमत्कारी देवशक्रया सरगुषः कथितः प्रिये ॥ चतुर्विततः कविता शिवयोग्यता। अश्रुतं सम्मत वाक्यं व्यकि साधु मनोहरम् । यदा शिष्यो ममेद योग्यः पया सामन्तदा । तम्म सभ्यक्ति य एव सद्गुरुश्च सः। कृपया परया सम्यग् दीक्षामा विधिमाचरेत ।" ( याव) सदा य: शिष्यबोधेन हिताय च समाइला । पिच सोम, सजावरण, पुरुषार्थ पर, वेदपाठी मिप्रहानुपहे सर: सद्गुरुर्गीयते दुपैः ॥ निपुर, पितामाताक मास तत्पर, धर्म, धार्मिक परमार्थे सदा रष्टिः परमार्थ प्रकीर्तितम् । गुल्मेवान परशा, सबंदा बयासका यथा मर्मत गुरुपादाम्बुजे भफिर्यस्यैव सदगुक स्मृतः॥" दृढ़वाय चौर स्तपित्त, प्रागियीका सहा मासकारी, (मायातबर्थ) परलोकमें मासके लिए बर्मचारी, वायमनोवाकासे शाल, दाल, कुलीन, हामवरण, परतवर्क यानीवन गुरसेवामें निरत, अनिल पात्यागवारी, पूजक सिंह, प्रसिह, बहुशिवपासनकारी, चमत्कारी, सर्वदा तंबानुहानमे नत्पर, जितबिय, पसिनवारी, देवतिसम्मक, साधु, मनोहर, महंत और तबसमत मोह और मत्सरको जोतनेवाले, गुणन गोर गुपके परि- वाक्ववादी. तबमलको जो समभावसे जानते हो, शिष्य- बारवर्ग बी मुरुष समान भाव वरनेवाला, ऐसा शिष धोधमें जो सर्वदा ही हित करते रहते हैं, निग्रहा- होना चाहिये ; पन्ध प्रचार पिच गुषकी थिए दुखदायक हवामें समर्थ हो, बहा परमार्थ और संपारिक कि दो वर्ष