पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२३२

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२२८ है. जिनका मुखमण्डल गजरांजके महश है, जिनके दूसरे दिन बानपूर्वक नित्यनिया भमाधान करके गाय सबदा भद या से भा गये हैं, जिनका प्ररो जन्ममे किये हुए पापयुन हायक निये तिलकाञ्चन सर्पराज द्वारा विभूषित है. जो रत्नावस्त्र और रक्त अङ्ग उत्सग कर ४); प्रिये ! उसके बाद कोशीको लिक राग धारण करते हैं, प्रमे देव गगापतिको भजना करना लिये एक भोज्य उत्सर्ग करना चाहिये (५।। पोछे ' चाहिये। सूर्य को अर्घ्य प्रदानपूर्व के ब्रह्मा, विष्णु, शिव, नवग्रह हम प्रकारका ध्यान करके मानम उपचार दाग और माटगणोंको पूजा कर वसुधाग देनी चाहिये । ( गघ च! पूर्व चतुर्थी । भान्त नाम उच्चारण फिर कर्म अभ्य दय को कामना लिये जियाद करें। ग म: द अन्तानमा कर गन्ध पुष्यादि अनन्ता गुरुक पार जा कर प्रणतिपूर्वक प्रार्थना ६५ : पा र पोत्र शशिकांको पूजा करना चाहिये। करें कि, 'नाय ! श्राप कोन्निकरूा पद्मवन के वल्लभ हैं। तीवा, ज्व...मन्दा. मोगटा, हामरूपिणी, उग्रा, तेज- कपानि! सब मेरे मस्तक पर अपने चरण कमल को. म्तो पार माया, इन पाठमियांको पूर्वादिक्रम में छाया प्रदान कर। महाभाग ! मेरे शुभपूर्णाभिषेकके पूजा कर मध्यदे में विघ्रविनाशिनो को जा करनो विषयमें पाप आज प्रदान करें। मैं पापके प्रमादसे चाहिये । तवा. ज्वलिली नन्दा, भोगदा. कामरूपिणो, निर्विघ्न कार्य सिद्धि र मकू।" उग्रा तेजस्वगे और पया इन पाठ पोठशक्तियों को ___"वत्स ! शिवशक्ति आज्ञानुसार पूर्णाभिषेकरी अभि- पूर्वाःिक्रम पूजा करके मध्यदेश में विनविनाशिनोको षिक्त होओ। महावी आदेशानुमार म्हाग अभीष्ट पूजा करने चाहिये । '३) बादमें । प्रणवपाठपूर्वक मिद होवे।" शिष्य गुरुसे इस प्रकारका आज्ञा ले कर 'नमः' पदान्त नाम उच्चारण करके) कमलामनको पूजा सर्वोपद्रवोंको गान्तिक निये तथा प्रायु, लक्ष्मो, बल और करना पड़ती है। कौनिष्ठको पुनः ध्यान करके आगेग्य लाभके लिये सङ्कल्प करे * । मशोधित पञ्चत स्वरूप उपचार द्वारा गणेशको पूजा इस प्रकार में . क सङ्गन्य हो र वस्त्र, अलङ्कार, करनो परत है। इसके उपरान्त उन चदि के गणेश, भूषण और शुरू साथ कारग हारा गुरुको अर्चना गणनाय गमनाथ, गणक्राड़ एकदन्त, रतातुगल, कर वरण करे । लम्बोदर, महोदर, विकट, धूमाभ, विघ्रनाशन, गजानन, (४) एते गन्धयुष्पे आं कमलासनाय नमः । इनको पूजा करनो चाहिये। (५) एते ग•धपुष्पे ओं गणेशाय नमः । एते गन्धपुष्पे ओं अनन्तर ब्राह्मो आदि अष्टशक्ति और इट्र आदि दश ___गणनायकाय नमः इत्यादि। दिकपालांकी हा काक दिक्पाला अस्वसमुदायको * ओं तत्सदद्य अमुक मास अमुराशिस्थे मारे अमुके पा (निरज क्षमस्व इप वाक्य हाग) पूर्वक विघ्न- पक्षे अमुकति नौ अमुरूवारे अमुकनभने अमुकगोत्रः अमुकप्रवरः राजको विमन करें। अमुवेदी अमुक । खाध्यायी कुरिकाखण्डान्तर्गतामुकत्रदेशीया. म प्रकापसे विघ्नराज को पूजा करके अधिवास करें मुकप्रामवासी श्रीअनुक देवशर्मा नि:शेषोपद्रवशान्तिमाम आयु- पौर पञ्चतत्त्व द्वारा ब्रह्मा कुलसाधकोंको भोजम लक्ष्मीवलारोग्यकामश्च शुभपूर्णामिषेचन करिये। इस वामको करावें। कह कर संकल्प करना चहिये। (३) पूर्व दिशा -एते गन्धपुष्पे ओं तीवा। नमः। अग्नि +ओं तत्सदद्य अमुक मासि अमुकरराशिस्थे भास्करे अमुके देशामें-एने गन्धपुष्पे ओ ज्वालि-य नमः । दक्षिण दिशामें -... पक्षे अमुकतिथौ अनुभवारे अमुनक्षत्रे अमुकगोत्र: अमुकप्रवरः ओं गन्धय नमः | नक, दिशामें ---ओं भोगदाने नमः । पश्रिम अमुकवेदी अमुक शाखाध्यायी कुमारिकाखडास्तर्गतामुकप्रदेशीयामु । दिशामें-ओं व ! रूपिय नमः। वायु दिशामें -- ओं उपाय प्रामवासी श्रीअमुक देवशर्मण: अमुक गोत्र अमुक प्रवर अमु:- नमः । ससः दिशा--ओं तेजस्वय नमः । ईशान शाम - बेदीनं अमुकशासानातिन कुमार काखण्डान्तर्गत-अमुक-प्रदे.. 'ओं सत्याय नमः । मध्यमें --ओं विघ्नविनाशिन्यै नमः। चीय-अमुकमामनिवासिनं श्रीमंतममुकाबन्दनाय एक्वेन भवन्त .