पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२४६

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२४२ तन्त्र अथवा माधक अपने शोरसे उत्थित रुधिरकं हाग ततः पुरनलिका भाले लिखेत् मन्त्र' वरानने । यन्त्र बना कर मद्य और मांस उपचार तथा अपुष्प सिन्दूरपुत्तली देवि ततो वहा तु तापयेत् ॥ हारा देवोको प जा करें, फिर अनन्यचित्त हो कर ताट्यत् मूलमंत्रण मूलमत्रेण रक्षयेत् । हजार जप करें। इससे माधकको मिचि हो जायगो। भालयेत् शुद्धदुग्धेन अथवा दधिवारिणा ॥ "अथवा परमेशानि गंगातीरे वसेत् सुधी। ततो हुकार प्रजपेत् सहस्र परमेश्वरि । उपवासद्वयं कृत्वा कुर्यात् म्नानमतन्द्रितः ॥ तत: साक्षात् भवेदेवि नात्र कार्या विचारणा ॥" नतो देवी समभ्यर्च धूपदीपमनोरमैः । परले जितने भी उपाय कह गये है, उनमे यदि हविष्यात्रैश्च नैवेद्यः स्वयं भुभीत वाग्यत: ॥ देवोके माक्षात न हो, तो माधकांक हिताय और भो भुक्त्वा पीत्वा स्त्रिया साई निशीथे जपावमः । एक परम ङ्गत उपाय कहा जाता है। यदि एक प्रया- जपेत् सहस्रं देवेशि ततः सिद्धिर्वगनने ॥" गके द्वारा सिद्धि न हो, तो हिताय और तृतीय उपाय अथवा माधक गङ्गा किनारे जा कर दी उपवास जानना चाहिये। करें, फिर अतन्द्रितभावमे मान करें तथा धप, दोप, पहले शुक, रक्त, नोन और पोत वस्त्रमे मम्मण अव. हविष्यान्न और न वेद्य हारा प.जा करक म्वयं हविष्यान्न यवमम्पन्न एक पुत्तलिका बनावें । मनोहर रनवम्ब हारा भोजन करें। क्रोधरूपमे उस मूर्ति को पूना करे। उसके बाद यन्त्र में ___ भोजन और पान करके स्त्रोके साथ निशोथरात्रिम । रक्तचन्दन लिखित वोजमन्त्र द्वारा अभ्यर्चना करके महम निर्भय हो महस्र जप करें। हमसे माधक को जप करें। तत्पश्चात् शाल्मलाकाष्ठ वा निम्न काष्ठकै हारा मिद्धि होगी। अग्नि जलावे और पूजा करें। अनन्तर पुत्तनिकाके कपान "अथवा वामूलस्थो दिगवासामुक्तोशवान । पर मन्त्र लिग्वे और सिन्दूर का पुत्तनिका को अग्निमें लताभिवष्टिनोभूत्वा अपेन्मन्त्रमनन्यधाः॥ तपाव । मलमन्त्र द्वारा ताडन और रक्षा का। बादमे तत: माक्षान् भवेददेवि नात्र कायां विचारणा ।" दुग्ध अथवा दधि वा जल द्वारा मालित कर। पोले पर्वोक्त उपायसे यदि मिडिलाभ न हो तो माधक महस्रबार इङ्गार मन्त्र का जप कर। हममे निश्चय हो नग्न और मुक्त केश हो वटवृक्षके तले लता हारा वेष्टित देवो माक्षात् दशन होंग, इममें मन्द नहीं। भी कर अनन्यचित्तमे मन्त्र जपे। इमोसे निथय हो "अथवा ताड यत् देवि ! नार्गमहेन पार्वति:: देवीका मानात्कार होगा। हविष्याशी दिवा भूत्वा ब्रह्मचारिममो नरः ॥ "एतेनापि प्रयोगेन यदि साक्षानजायते । गतो ताम्बूलपुरास्यो लनामडलमध्यमः। ततो देवि ! प्रवक्ष्यामि उगयं परपा मम् ॥ नारसिंहेन देवेशि पूटितन्तु मनु जपेत् ॥ एकेनैव प्रयोगेण यदि साक्षानजायते । तनो लक्षपेनेव साक्षात् भवति नान्यथा । द्वितीयं वापि कुर्वीत नृतीयं वाथवा प्रिये ॥ अवश्य आयते साक्षात् ममैव बचन यथा ॥" नृतीयेन नचेत् सिद्धि स्तापायं वदामि ते । अथवा नारमिह मन्त्र द्वारा देवोको ताड़ित करें'. बने शुक्ले तथा रके पीने वा नीलवाससि ॥ दिनमें हविष्याशो हो कर ब्रह्मचारोके ममान होवें । पुतली रचयेद्देव्या: सर्वावयवसुन्दरीम् । रात्रिको ताम्ब न चर्वण करके लतामण्डल मध्यवर्ती पूजयेत् कोधरूपेण रक्तववैमनोहरैः॥ हो नारसिंह मन्त्र पुटित कर जप करें। इस प्रकार १ तत्र देवी जपेत् यन्त्र समभ्यर्थ सहस्रकम् । लाख बार जप करनेसे देवो साक्षात् दर्शन देती है। रक्तचन्दनबीजेन तत्र कल्पितमालया ॥ इसमें विन्दुमात्र भो सन्देह नहीं। ततः शाल्मलीकाण्ठेन निम्बकाष्ठेन वा प्रिये । "अथवापि वगरोहे नौकालोहेन पार्वति । पहि प्रज्याल्य यनेन तत्र वहिप्रपश्येत् ॥ -शूल' निर्माय यत्नेन पटे देवीन्तु : ल्पयेत् ॥