पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२४८

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२४४ पञ्चमकार तन्त्रका प्रधान अङ्ग है। पिट-सर्पण कुत्ते के मूबके सदृश है। जो व्यक्ति कालो और "मकारपंचकं दांव देवानामपि दुर्लभम् । साराका मन्त्र पा कर वोराचार नहीं करता, वह शूद्रत्व. मद्यमांस्तथा मत्स्यैर्मुद्राभिमैथुनैरपि ॥ को प्राप्त होता है। सुरा मभी कार्यो में आता है तथा स्त्रीमि: गार्थ महासाधुरर्चयेत् जगदम्बिका । पृथिवी पर येही एकमात्र मुक्तिदायिनो है। इस सुराका अन्यथा च महानिन्दा गीयते पण्डितः सुरैः॥ नाम हो तीर्थ और पान है। पायेन मनसा वाचा तस्मात्तत्त्वो परो भवेत् । वैटिक आदि ग्रन्थों में जिन मामाको भक्ष्य कहा गया कालिका तारिणी दीक्षां गृहीत्वा मद्यसेवनम् ॥ है, वे ही माम विशुद्ध हैं। रहस्य में जिन मोमीको न करोति नरोस्तु स कलौ पतितो भवेत् । भक्ष्ययोग्य कहा है, वे मत्सा मिक्षिपदायक हैं । पृथ क, वैदिके तांत्रिके चैव जपोमवहिष्कृतः ॥ मण्डल भ्रष्ट, गोधम, चणक आदिको मुद्रा कहते है, अब्राह्मग सएमोक्तः स एव हस्तिमूर्खः । यह मुद्रा मुक्तिप्रदायिनो है। भग और लिङ्गके योगसे शनीमूत्रसमं तस्य तर्पण यत् पितृष्वपि ॥ मंथन होता है। यह मैथन हो पञ्चम है। मकारों में कालीतारामनुमाप्य वीराचार करोति न । प्रथम मद्य द्वितीय मांस, हतोय मत्सा. चतुर्थ मुद्रा, पञ्चम शदत्व तच्छरीरेण प्राप्नुयात् स न चास्यथा ॥ मथ न है, ये ५ दृश्य हो पञ्चमकार हैं। या सुरा सर्वकार्येषु कथिता भुवि मुक्तिदा । पञ्चमकारका प्रथ- तस्या नाम भवेद् देवि तीर्थपान सुदुर्लभम् ॥ "मायामलादि शमनात् मोक्षमार्गनिरूपणात् । शुद्राणां भक्षोग्याणां यन्मांसं देवनिर्मितम ।। अष्टदु.खादिविरहान्मत्स्येति परिकीर्तितम ।। वेदमंत्रेण विधिवत् प्रोक्तो सा शुद्धिशतमा मांगल्यजननावी सम्बिदानन्ददानतः । भोक्ष्य योग्याश्च कथिता ये ये मत्स्याघमनने । सर्वदेवप्रियत्वाच मांग इत्यभिधीयते ॥ ते रहस्ये मया प्रोको मीनाः सिद्धिप्रदायकाः ॥ पंचम दवि सर्वेषु मम प्राणप्रिय भवेत् । पृथुका त डुला भ्रष्टा गोधूमचणकादय:। पंचमेन विना दी। चण्डीमन्त्र का जपेत् ॥ तस्य नाम भवदेवि मुद्रा मुक्तिप्रदायिनी ॥ यदि पंचमकारेषु भ्रान्ति चेत कुरुते प्रिय । भगलिंगस्य योगेन मैथुनं यद् भवेत् प्रिये । तस्य सिद्धिः कथं देवि चण्डीमन्त्रं कथं जपेत् । तस्य नाम भवेद्दे वि पचम परिकीतितम् ॥ आनन्द परम ब्रह्म मकारास्तस्य सचकाः ॥" प्रथमस्तु भवेत् मद्यमांसं च द्वितीयकम् । जिससे माया और मलादिका प्रशमन, मोक्षमार्ग का मत्स्यथैव तृतीय स्यात् मुद्राश्चैव चतुर्थिका । । निरूपण और पाठ प्रकार के दुःखाँका अभाव होता है, पंचमं पचमं विद्यात् पचैते नामतः स्मृताः।" । उमका नाम मत्मा है । माङ्गल्यजनन, मम्बिदाको पानन्द पञ्चमकार तन्त्रके प्राणस्वरूप हैं। पञ्चमकारक बिना दायक और मब देवताका प्रिय होनसे इसका तान्त्रिकको किसी भी काय में अधिकार नहीं है। पत्र नाम मास पड़ा है। पञ्चमकार मन कार्याम मेरे मवार देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं, मद्य, मांस, मत्सा, प्राक समान प्रिय हैं । पञ्चमकारके बिना चण्डोमन्त्रका मुद्रा और मथ न इन पांच मकारीसे जगदम्बिकाकी अप कैसे हो सकता है ? इसलिए उसके लिए सिधि भो पूजा को जाती है। इसके बिना कोई कार्य भी मिडि अमम्भव है। प्रानन्द हो परम ब्रह्म है और पबमकार नहीं होता और तम्ववित् पण्डितगण निन्दा करते हैं। उसका सूचक है। काली वा तागका मन्त्र ग्रहण करके जो मद्य मेवन नहीं "सुमनः सेवितत्वाच्च राजत्लात् सवदा प्रिये। करता, वह कलिम पतित होती है, तान्त्रिक जप, होम आनन्दजननादेवि सुरेति परिकीर्तिता । प्रादि कामि पनधिकारी होता है तथा वह व्यक्ति मुदंर्वति देवानां मनासि छावयन्ति च । पब्राह्मण और हस्तिमूख कहलाता है। उस व्यक्षिका | तस्मान्मुना इति स्याता दर्शिता म्याकुलेवरी ।'