पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२५१

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तत्र. द्रव्यशुद्धि- " मः शुचिसहसुरन्तरोत महोता वेदिसदतिगि. दूरोनसत् । नृमहरसदृतमहयोमसदना गोजा ऋतजा अट्रिना ऋतं वृहत् ।" इम मन्त्रको ट्रय के अपर तोन बार पढ़े। उसके बाद द्रव्यमें अानन्दभैरव और प्रानन्दभैरवो का इम मन्त्रकै हारा ध्यान करें। ___पहले पञ्चमकारका विषय बणि त हा है, बहतांक मनमें धारणा हो सकतो है, कि पञ्चमकारका मेवन पुण्यप्रद है, किन्तु शोधन और माधन धिन मद्य पान करनेका निषेध है । इमो लिए कुलाण वतन्त्र में पञ्चमकार का विषय निम्नलिखित रूपमे वणित हा है- "वहवः कौलिक धर्म मिथ्याज्ञान विडम्बकाः । सुबुया कल्पयन्तीस्थ' पारम्पयविमे हिनाः ॥ मद्यपानेन मनुजा यदि सिदि लभत वै। मद्यपान ताः सर्वे सिद्धि गरछन्तु पामगः ॥ मांसभक्षणमात्रेण यदि पुण्या गतिभंवेत । लोके मांसाशिनः सर्वे पुण्यभाजी भवन्ति हि ।। स्त्रीसम्भोगेन देवेशि यदि मो भान्ति व । सर्वेऽपि जन्तवो लो के मुक्ता: स्युः मोनिषेवनात् ॥ बधा पानन्तु देवेशि सुरापानं तदुच्यते । यामहापातक देवि वेदादिषु निरूपितम् ॥ अना यमनालोच्यमस्पृश्य प्राप्यपेयकम् । मद्य मांस पशनान्तु कौलिकानां माफलम् ॥ अमेध्यानि द्विजातीनां मद्यान्येकादशैव तु । द्वादशात्य महाम' सर्वेषामधम स्मृतम् ॥ मुग वै मलमन्नानां पापात्मा मलमुच्यते । नात् ब्राह्म गाजन्यौ वैश्यश्च न सुगं पिवेत् ॥ सुगदर्शनमात्रेण कुर्यात् पुर्यावलोहनम् । नत्समाघ्राणमात्रेण प्राणायामत्रय चरेत् ॥ आजानुभ्यां भवेत् मो जले चौपब से दहः । ऊर्ध्व नामेत्रिरात्रन्तु मद्यस्य पर्शने विधिः ॥ सुरापाने ज्ञान कृते ज्वलन्तीं तां विनिक्षिपेत । मुखे तथा विनिक्षिप्ते ततः शुद्धिमवाप्नुगत् ॥ मत्स्यमांसादिदोषस्य प्रायश्चित्तविधिः स्मृतः । अविधानेन यो हग्यात् आत्मार्थ प्राणिनः प्रिये ॥ निवभरके घोरे दिनानि पशुरोममिः। सम्बितानि दुराचारस्तिर्यगयोनिषु जायते । अनुमन्ता विश्वसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपहर्ता च खादिताटो च खातकाः । धनेन च क्रेता हन्ति खादिता चोपभोगतः। खातको खातबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधोवधः॥ मांससन्दर्शनं कृत्वा सूर्यदशनमावरेत् । तस्मादविधिमा मांसं मद्यश्च नाचरेत् क्वचित् ॥ विधिवत् सेव्यते देवि परमार्थ प्रसीदति ।" ( कुलार्णवतन्त्र ) बहतमे मनुष्य मिथ्याज्ञान हे हरा विड़म्बित हो कर मद्यादि पान करनेमे पुण्य होता है. ऐमो कल्पना किया करते हैं। यह उनका महाभ्रम है। मद्य पोनेसे ही यदि मिद्धि होती, तो शराबी पामर भी मिति लाभ कर लेते। माम भक्षण कानसे हो यदि पुण्य होता, तो मभो मामभक्षो मनुष्य पुण्यवान् हो सकते हैं। स्त्रो. मम्भोगमे हो यदि मुक्ति होतो, तो सभी नम्पटी अनायाम मुक्त हो जात किन्तु ऐमा नहीं है, वृथा मद्य पोना तो शराबवारांका गराव पीना है। वेद आदिमें शराब पौनक जैम दोष लिखे हैं, वृ या मद्यपान करनेसे व मबमभाव लगते हैं। यह शराब अम्पृश्य, अनाय और अपय हैं। कवन कोलिक काय में फम्नप्रद है। मभी प्रकारका मद्य विजांक निये अपय है। अवका मल हो मद्य है, इमलिये हिजोको कभो भो शराब न पानी चाहिये। यदि किमो तरह शराबको देख में, तो सूर्य का दर्शन करना उचित हैं। देववश यदि सगको सूध लें, तो उन्हें प्राणायाममम्वत्रयका प्राधरण करना पड़ेगा। घुटनों पानी में खड़े हो कर एक दिन उपवाम करनसे शराच मूधनका पाप नष्ट होता है। देववग यदि मद्यका स्पर्श हो जाय, तो नाभि पर्यन्त जनमें खड़े हो कर तोन दिन उपवास करनसे उसका पाप जाता रहता है। कोई यदि अज्ञानमे सरापान कर लें, तो वे अग्नि प्रज्वलित करके स्वयं उममें निक्षित होवें। मा करने में अचानकत सुरापानमा पाप नष्ट होता है। मत्मा और मांसादिका प्रायश्चित्त भो इमो भौमि है। प्रविधानमे अपनो प्रोसिके लिए जो लोग मत्मा और मांसादिका हनन करते हैं, वे तपशुके रोमको संख्या अनुसार घोर भरकम वास करते है तथा