पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२५२

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तत्र २४८ फिर तिर्यक योनिमें जन्म लेते हैं। राम प्रकारको पशु ! मुखमें ताम्ब ल देव और रमन्त्र का ध्यान पर पड़ामन्च हत्या घातक अनमोदक, विश्वमिता, निहन्ता, खगेटने हारा षडङ्गन्यास करें। बाद में मानकान्यास करके वाले, बेचनेवाग्ने, मर्ता, उपहा और खानवाने ऋष्यादिन्याम करें। मूल हारा व्यापक करके मस्तक पर ये भी पापके भागी होते हैं। इमलिऐ मामके ट्रेवते सौ बार मूलमन्त्रका जप करें। उदयमें कामबीज और ही मूर्य का दर्शन करना चारिये। किन्त विधिवत बुधबोज. नाभिम श्रीबीज, गुादेशमें म बोज, मोम्निमें अर्थात् मदगुरु के उपटेगानगर पञ्चमकाा मेवन करनेमे कामबोज और कुगडली में कुल्ल कुगडलो शक्तिबीजका जप परमार्थतत्व लाभ शेगा: अन्यथा भो निकन पोर करें। वाममें माया और कर्ण में महेश्वरो श्रवण करावें । विशेष पापजनक है। अतएव माविकों को कोई भी उता रूप अनुष्ठान करनसे नारोशद्धि होती है। कार्य अपनो इच्छा के अनुसार न करना चाहिये। "सूर्यकोटिप्रतीकाश चन्द्रकोटिमुशीतलम् । अष्टादशभुज देव पञ्चवक्त्र त्रिलोचनम् ॥ शुद्ध शक्तिका फल- "साधिता च गद्धात्री यद्यद्दति पार्वति । अमृतार्णवमध्यस्थ ब्रह्मपद्मापरिस्थितिम् । वृषारूढं नीलकण्ठ सर्वाभरणभूषितम। तत्सर्व सत्यतां याति मन्यं सत्यं न मंशयः ॥" कालखट्टांगधर घंटाडमरुवादिनम ॥ नारो शोधिता होने पर जगहातो तय होतो है पाशांकुशधर देव गदामूषलधारणम् । पोरबह नारो जो कहे वही मत्य होता है, इममें पन. खड्गखेटकपटोशमुद्गर शुलदण्डधृक् ॥ मात्र भी मशय नहीं। विचित्र खेटक मुण्ड वरदाभयपाणिनम् । शक्तिशोधन -- लोहित देवदेवेश भावयेत् साधकोत्तमः॥" "इदानी कथयिष्यामि नारीगा शोधनं प्रिये । प्रम मन्त्र से ध्यान करके "हमक्षमलवरयु प्रानन्द अप्रे वा दक्षिणे वापि संस्थाप्य मण्डलोपरि ॥ भाले न मण्डलं कुर्यात् पुरं सिन्दरेण च । भैरवाय वषट्" इस मन्त्र के द्वारा आनन्दभैरवका तीन बार पजा करें। पोछे अानन्दभरवीका ध्यान करें। नयने कजलं दशात् मूलमन्त्र जपेत सुधीः ॥ “भावयेच्च सुधा देवी चन्द्रकोटपायुतप्रभा । अन्यैश्च विविधव्यभावगेत् शाक्तमन्त्रत:। हिमकुन्देन्दुधवलां पंचवक्त्रां त्रिलोचनाम् ॥ ताम्बूलं वदने दद्यादिष्टमूर्ति विभाग च ॥ अष्टादशभुजेमुक्तां सर्वानन्दकरोयताम् । तत: षडंगमन्त्रैध षडंगन्याममाचरेत् । प्रहसन्तीं विशालाक्षी देवदेवस्य सम्मुखीम् ॥" मातृकाण नतोन्यस्य ऋष्यादिन्याममाचरेत् ॥ इस प्रकारसे आनन्दभैरवोका ध्यान करके "सक्ष मुलेन व्यापक कृत्वा मूर्ध्न मूलं शत' जपेत् । मन्नवरयौं सुधादेव्यै वषट" इस मन्त्र से पुजा करें तथा हृदये कामवीजच वधूवीजश्च संजपेत॥ ट्रव्यमै शक्तिचक्र लिख कर क्रमानुमार "ल " नाभौ श्री गुह्यदेशे च सर्ववीजच पार्वति । लिखें। मौलौ च वागभव कामं कुण्डली कुलकुण्डलीम ॥ ऐमा करनेसे शिव और शशिका योग होता है, इस शक्तिबीज जपेमंत्री सर्वसिद्धीश्वरो भवेत । लिये द्रव्यमें अमृतत्वको चिन्ता कर धेनुमुद्रा द्वारा अमृतो वामे मायां श्रावयेच कर्णेचैव महेश्वरी ॥ करें। "वं' इस वरुणामोजको तथा मूलमन्त्रको पाठ एवं क्रमेण देवेशि नारी शुद्धिः प्रजायते।" बार जप कर देवताम्वरूप उस द्रव्यका ध्यान करें। नारीशति करनी हो, तो नारीको ला कर उसे अग्र. इस तरहसे द्रव्यशधिहोती। भागमे वा दक्षिण में मण्डल के अपर स्थापित करें। "एतत्तु कारण देवि सुरसंघनिषेवितम् । कपाल पर सिन्दूर द्वारा त्रे पुरमहल करें। नयनों में अतएव तस्यानाम प्ररेति भुवनप्रये ॥ काजल लगा दें। फिर माधक मल मन्त्र जपें । पन्य अस्याः गन्ध: केशवस्तु तेन गन्धेन कौलिक।.. विविध व्यहाग तिमवसे उसको सम्बोधन करें। पूजवेश्च पर देवी पालिका दक्षिण शिवाम् ।