पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२५३

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तो वह नि देव इसका सेवन करते है, इमलिये इसका नाम पूजाके प्रभावसे माधक शीघ्र ही सिहि लाभ करते है। सुग है। इस सुराकी गन्ध ही केशव है, उम गन्धक इसमें समर्थ होने पर समस्त द्रव्य न दे कर सिर्फ प्रशस्त हारा कौलिक-परा कालिका देवोको प.जा करें। द्रश्य निवेदन करना चाहिये । ___ मांसशोधन–'ॐ प्रतहिष्ण स्तवते वीर्येण मृगोन भूचर और खेचर पादिका माम हो उत्तम सिद्धि- भोम: कुचगेग विष्ठा यस्योरुषु त्रिषु विक्रमे धियन्ति भुवः प्रद है। मभो प्रकारकै धान्यको मुद्रा कहते हैं। खेत, नानि विखा।" इस मंत्रमे माम शोधित होता है। पोत और रतापुष्प लाना चाहिये । षड़ वीर, अष्टवीर वा मत्स्यशुद्धि-"ॐ तहिष्णो परमं पदं मदा पश्यन्ति सूरयः नववार इनसे जो प्राप्त हो, उसको ल्पना करें। इम दिवोव चक्षर'ततं । ॐ तहिनामो विपन्य बोजाग्यवां R: प्रकारको कल्पना करनेसे वोरचक होता है पाचार्यको मप्रिन्धत विष्णोयत् परम पद" दम मनके द्वारा मत्मा दक्षिणा दे कर पीछे वोर को दक्षिगा देखें। अप्तख्य शहि करें। पातक और ब्रह्महत्यादि पातक वोरचक्र के प्रभावसे तत्क्षण मुद्र शुद्धि-"ॐ विष्ण योनि कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि दूर हो जाते हैं। चक्र यदि विधि और दक्षिणाही न हो विमतु आमि चतु प्रजापतिर्धाता गर्भ दधातु ते । तो वह निष्फल है। "गर्भ देहि सिनीवाली गर्भ देहि सरस्वती। राजचक्र-'चतुर्वर्णा कुमार्यश्न स्वरूपा सुमनोहरा । गर्भ ते अस्विनौ देवा वाधत्तां पुष्करन ।” यामिनी योगिनीव रजकी श्रपची तथा । इस मंत्र द्वारा मुद्रारादि करें। पहले जो विधान कैवर्तकममुत्पन्ना पंचशक रुदाहृता । कह गये हैं, उनमें चमकार शोधित होते हैं। किन्तु एता प्रशस्ता सकला साधकेन नियोजिता ॥ पंचमकार शोधित करने के लिये सिद्ध गुरुको जरूरत अर्पयेत् मधुपथच शुद्धिच्छागलसम्प्रवा। है। बिना सिद्ध गुरुक कोई भी माधक इमको अपनी धर्मार्थकाममोक्षार्थ राजचक्रं विधीयते ॥ इच्छानुमार नहीं कर सकता, यदि करेगा, तो उससे षष्टिवर्षसहस्राणि देवलोके महीयते ।" फलको प्राप्ति न होगो। अतिशय रूपवती सुमनोहरा चतुर्वर्णा कमारो-एसो ___चकानुष्टान-मिद्धतान्त्रिकगण चक्रानुष्ठान किया करते यामिनो, योगिनी, रजकी, चाण्डाली और कैवर्ता-ये हैं । यह अति गुह्य व्यापार है। निशौथगनिमें उसका पञ्चशक्ति हैं, ये पञ्चकन्या माधक हारा नियोजित होने अनुष्ठान करना पड़ता है। पर प्रशस्ता होती है। पश्चात् मधु, मद्य पौर मास अर्पण वी चक-"वीरचक प्रवक्ष्यामि येन सिध्यन्ति माधकाः। कर',इम प्रकारसे राजचक्र होता है। इस राजचक्रके अन या पूजया देवि देहसिद्धिः प्रजायते ॥ प्रभावमे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्ति तथा देव- शक्ते यो न समप्रादि यत्प्रशस्त निवेदयेत् । लोकमें षष्टि सहस वर्ष वाम होता है । भूचराणां खचराणां तत्तन्मांसः सुसाधय ॥ देवचक्र-“देवचक्रं प्रवक्ष्यामि यत्सुरैः क्रियते सदा । मुद्रा सर्वाणि धान्यानि युक्तानि परमेश्वरि । शक्क यस्तत्र वक्ष्यामि दिव्यरूपा मनोरमा ॥ श्वेतपीत' च पुष्पाणि रकानि च विशेषतः ।। राजवेश्या नागरी च गुप्तवेश्या तथा प्रिये । अष्टवीर'च षडवीरं नववीर तथा प्रिये। देववेश्या ब्रह्मवेश्या शक्तयः पंचदेवता ॥ कल्पयेत् वीरपन्थिश्च यथालब्धाच सुन्दरी ॥ राजसेवापरा राजवेश्या गुप्ता च कौलजा। वीरेभ्यो दक्षिणां दद्यात् आचार्याय विशेषतः । देववेश्या नृत्यकारा ब्रह्मवेश्या च तीर्थगा ॥ असंहयपातकश्चैव ब्रह्महत्यादिपातकम् ॥ नागरी कस्यचित कन्या रम्भाकामरजस्वला । नाशयेत् तत्क्षणात् देवि वीरचक्रप्रभावतः । पंचैता शकया देवि देवचक्रे नियोजयेत्॥" दक्षिणाविधिहीनं च तचक्र निष्फलं भवेत् ॥" देवचक्रका विषय कहा जाता है-देवता सर्वदा उस वोरचक्रका विषय कहा जाता है, कि जिसको देवचक्रका अनुष्ठान किया करते है। इस देवचक्रमें Vol. IA. 63