पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२५६

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पण्डित वीरसंतान क्षेत्रं देवींच योगिनी ॥ कि, वह कोटि मुखसे भी नहीं गाया जा सकता । कुलाचारं गुरुदी भनमापि न निन्दयेत् । वीरचक्रका पावरपा करने के लिए वोरको शक्तिदान मातृयोनि पक्राडा नग्नां स्त्रीमुन्नतस्तनीं। करना पड़ता है। वीरचक्रके बिना यदि शक्तिदान किया कांतेनोमितां कांता कामतो नावलोक्येत । जाय, तो दाना गैरव नरकको जाता है। या कार्य दंबा गुरु सुधां विद्यां श्रृंलां शकिकियात्मजां ॥ अत्यन्त गुलभावसे करना चाहिये। अर्थात काम, क्रोध, योगिनी भग्वीतत्व अष्टतत्व प्रपूजयेत् । मात्सय विकार. लोभ, कुत्सा, निन्दा, दुरालाप, इन चिमाता दुहिता भग्नी स्नुषा पत्नी च पंचमी ॥ पाठोंको गुप्त रखें। पशुचके यजेद्धीमान् पशुवत्तोषण चरेत् । ___ मन्त्र, मुद्रा, अक्षम्माला, योनि, वोग्सङ्गम, मण्डल, गधपुष्पं च माल्य च वखाद्याभरणानि च । घट. पीठ और मिछिद्रय, इन सबको गुप्त रखें। पगिड़त सिन्दूरागुरुकस्तृर्ग नानापुष्पाणि सुन्दरि । वीर, मन्तान, क्षेत्र, देवी, योगिनो, कुलाचार और गुरुदूतो भक्ष्य नानाविध द्रव्यं फलं नानाविध प्रिये ॥ रनको मनमें भी निन्दा न करें। एतद्रव्यगणं यस्तु भक्त्या ताभ्यो निवेदयेत् । __ माटयोनि पशकोड़ा, नग्ना स्त्री, उन्नत स्तनी, कान्त षष्टिवर्षसहस्राणि स्तिौ राजा भवेद्धवम् ॥ क्षोभिता और कान्ता, इनको कामभावमे अवलोकन न वीरचके मन्त्र सिद्धिर्भवत्येव न संशयः। करें। देवो, गुरु सुधा, विद्या ठगति, योगिनो, अमावस्यां चतुर्दश्यां पक्षयोरूभयो.पि ॥ भैरवोतत्त्व और अष्टतत्त्व की प जा करें। श्मशानेन गते नाचेत् सूचित न प्रकाशितम्।" . पश्नक मात', दहिता, भगिनो, पुत्रवप और मन्त्रसिद्ध होनम हो वीर होता है, मद्य बिना पोये ! पत्नो, ये पाँच शक्तियों समन्वि ।। हो कर पशुचक्रमें याग वोर नहीं होता। यथाविधि अभिषिक्त होने पर वोग कर गो। हमें पशु बत् तुष्टि आचरण करें । गन्ध, पुष्प, और यथाविधि अभिषिक्त होने पर कौलि को होता है। माल्य, वस्त्रादि ग्राभग्ण, 1मन्दर अगुरु कम्त रा, वीर चक्रमें हम प्रकारसे वीर और शक्तिको नियुक्त किया नाना प्रकार के पुष्प और फल ये मब ट्रव्य भक्तिपूर्वक जाता है। उनको अपंण करें। इ तरह पशुचक्रम याग करन- वोर और कोलिकोको अभिषिक्त बिना हुए चक्र पर वाला माठ हजार वष तक पृथिवो पर राजा होता है। बैठ कर याग न करना चाहिये। यदि करें, तो उन्हें वारचक्रम मन्त्रमिद अवश्य होगी, इसमें मन्द है नहीं। गैरव नामक नरक जाना पड़ेगा। दम क्रम के सिवा दोनों पक्ष की अमावश्या पार चतुर्दशोको श्मशानम आ वारचक पर कभी भी न बैठना चाहिये। म क्रम। कर ऐसा आचरण करें। कभी भी किमास प्रकट न बिना वीरचक्र पर बैठनमे पद पदमें उसको सिडिहानि करें। होतो है और रौरव नरकको जाना पड़ता है । मब तरह- को शराब, मत्स्य मुद्रा, पुष्प, स्वयम्भ व सम, कुण्डगी- "न नि दत् न हसत् वाति चक्रमध्ये मदाकुलान् । लोवद्रव्य, ये सब चोज साधकका पुन: पुनः वीरचक्र एतचऋगतां वार्ता' वहिर्नेव प्रकाशयेत् ॥ पर चढ़ाना चाहिये तथा अपनी शक्ति की पूजा करनी । तेभ्यो भोजन कुर्वीत नाहित'च समाचरेत् । चाहिये । भक्ष्च ट्रव्य ज्यादि क्रमसे कनिष्ठको निवेदन भक्त्या संरक्षयेदेतान गोण्येच्च प्रयत्नतः ॥" करें। परस्पर म्पर्श न करें। एक पासन पर और एक | चक्रम मदिरासत व्यक्तियों को देख कर हास्य और पात्रमें भोजन न करें। हौनजा देवीको ला कर शक्तिमन्त्र निन्दा न करें। इस चक्रको बास बाहरमें प्रकट न करें। हारा शोधित करें। वोर होमजाकी पजा और उनका उन पास बैठकर भोजन करें और अहित पाचरबसे शोधन करके शक्ति निवेदन करें। मधुममा वीरको जो विरत रहे । भलिप ब क उनकी रक्षा करें और यन्त्र होमजा कन्या प्रदान करेगा उसको पतना पुण्य होता है| पवक ये मब वृत्तान्त गुल रक्खें। (प्राणतोषिणी.)