पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२५८

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२५४ शोर्यवान् और तरुणवयस्क हो. तो शवसाधनार्थ उमको । शवको संस्थापन करके पर्चना करें और उस पर पारो- लाना चाहिये। हण करें। कुछ कुणोंको उमके पैरोंके मोचे डाल देना स्त्रो-रमण छाग पनित ओर कुष्ठादि महापातक रोगग्रस्त चाहिये। शव केशीको प्रमारित करके उसकी चोटी शवका परित्याग करना उचित है। खेछाप न क मारे बाँध देवें। उसके शरीरको देवस्वरूप मान कर पूजे हुए व्यक्तिका और वृष्का शव ग्रहण न करना चाहिये। और बादमें उत्थित हो कर 'भोम-भोरु-भयाभाव', इस टुर्भिक्षम मरे हुए व्यक्तिका शव अथवा बामो मुदा भो मन्त्रका पाठ करें। उसके परीके सले त्रिकोण्यन्त्र शवमाधन के लिए अनुपयुक है। स्त्रियों जैसे रुपवालेका! लिखना चाहिये। शव भी वर्जनोय है। "तेनोत्थातुं न शक्नोति शवश्च निश्चलो भवेत् । नाना प्रकारके साधनोमवमाधन वोराचाग्यिाका उपविश्य पुनस्तत्रबाह निःपार्यपादयोः ॥ एक प्रधान माधन है। समलिए इसका स्थान विशेष होना इस्तयो कुशपास्तीर्य पादो तत्र निधापयेत् । आवश्यक है । शून्य गृहमें, नदीतोर पर, पर्वत पर, निर्जन ओष्ठौ तु संपुटी कृत्वा स्थिरचित्त स्थिरेन्द्रियः ॥ स्थानमें, विल्वमके मले अथवा श्मशान वा उमके ममोय मदा देवी हृदि ध्यात्वा मौनीजपमधाचरेत् । वर्ती वनस्थल में साधना करनी चाहिये। अष्टमो वा चतु. चलासनात् भयं नास्ति भये जाने भयेत्तुतम् ॥ दशी अथवा क्लष्णपक्षीय मङ्गलवार को हिप्रहर गत्रि हो यत्प्रार्थयसि देवेशि दातम्य' कुजरादिकम् । शवमाधनाका उपयुक्ता ममय है। श्मशानादि स्थलमें दिनान्तरे च दास्यामि स्वनाम कथयस्व मे ॥ शवको ला कर कुश-शय्या पर स्थापन करें और फिर इत्युक्त्या संस्कृतेनैव निर्भयन्तु पुनर्जपेत् । न्याम करना प्रारम्भ करं। पीठमन्स लिख कर गन्ध ततश्चन्मधुर वक्ति वतन्य लीलया नौ ॥ मष्यादिक द्वारा अर्चना करें। पोई प्रामन-प्रदान कर ततः सत्यं कारयित्वा परन्तु प्रार्थयेन्नरः । मन्त्र दाग रक्षा करें । उसके बाद शव के मुख पर विधि- यदि सत्यं न कुर्याच्च वर वान प्रयच्छति ॥ पक देवताओंका पाप्यायन (तुष्टि) आवरण डालें। तदा पुनर्जपेद्धीमान् एकाप्रयतमानसः । 'भूवनयो' और अन्समें 'फट' का प्रयोग कर उसके बाद सस्ये कृते वरे लब्धा संत्यजेस्तु जपादिकम् ॥ शवको प्रक्षालित करके यनपूर्वक स्थापित करें और फल' जातमिदवास्वा झुटिकां मोचयत्ततः । किमी प्रकारमे भीत न होवें, यत्नसे भी यदि स्थापित न शवं प्रक्षाल्प संस्थाप्य मोचयत् पादवन्धनम् ॥ को, तो एला, लवङ्ग, कर्पूर, आतोफल, खदिर और पादचक्रं मोचयित्वा पूजाद्रव्य अले क्षिपेत् । पाईक हारा शवको अधीमुख कर तथा उस शव अले च गर्ने वा नि:क्षिप्य स्नानमाचरेत् ॥ के मुखमें ताम्ब ल देवें । उसके पोठ पर रख कर ततश्च स्वगृह गत्वा वलिं दत्वा दिनान्तरे। चन्दन विलोपित करें। बादमें मूलको प्रादि करके पूजयित्वा ततो देवी याचितोह वलिप्रियम। कटादेश तक चतुरस्र मगहल का बोच में चतुरियुक्त तेन गृहन्तु सर्वे च मया दत्तमिद वलिम् । अष्टदल पन बनावें । उसके बाद चैनेय, अजिन, कम्बला. परेऽडि नित्यमाचार्य: पञ्चगव्य पिवेत्ततः॥ तरित करके न्यास करें और निकटमें 4 जा द्रव्य रख ब्राह्मणान् भोजयेत्तत्र पचविंशतिसंख्यकान् । देखें । कुछ दूरी पर एक उत्तम मापकको रखना चाहिये सप्तप'चविहीन पा कमाच्चैव दशावधि ॥

  • "यष्टिविद्धं शूलविद्धं खानविद्ध पयामृतम्।

सत: स्नात्वा च भुक्त्वा व निवसेदुत्तमे स्पड़े। वजविद्धंसपदष्ट चांडाल नामिभूतकम् । यदि न स्यात् विप्रभोज्यं तदा निधनितां प्रजेत् । तरुण सुन्दर शुरै रणे न समुज्वलम् । तेन चेनिधन नस्यात् तदा दवी प्राप्पति। . पलायनविशून्यच सम्मुखे रणवर्तिनम त्रिरात्र वा पंडात्र वा नवरात्रच गोपयेत् ॥ (तन्त्रसारभूत भावचूडामणि ) | श्री.शय्या यदि गच्छेस्तु तदाध्यापि विनिर्दिशेता