पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२६३

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लोकका माहात्मा गोलोषसे भी सौगुना सके अपर .मायावकलसंखज्या विषा मिना यदोन्मुखी। षोड़पपवयुक्त मोहान्धकारनाशक निमल पर जो शिवशक्तिविभागेन जायते सृष्टिकल्पना । यमलोक कहलाता है। यहाँ बाई पोर गौरी चौर प्रथमे जायते पुत्रो प्रसंझो हि पार्वति ॥" दाहिनो ओर सदाशिव विराजमान है। इस पनके अपर ब्राण्डका प्राकार कैसा है और सृष्टि किस तरह पत्रस्यसमन्धित ज्ञानपन है, जो तपोलोक कहलाता होतो है ? पार्वतोमे महादेवसे ऐसा प्रश्न किया । उत्तर है । यहाँ शिवको बाई पोर सदानन्दरूपिको सिमाली में महादेवने कहा-"ह पाति ! नाना विग्रहविशिष्ट अवस्थान करतो हैं। जनका पाकार ही ब्रह्माण्ड तथा स्थल-सूमादि "तपोलोकं गोलोकस्य चतुर्लक्षगुण शिवे । विग्रह हो ब्रह्माण्ड कहलाता है। उसमें मवपर्वत पौर ब्रह्मलोकेषु ये देवा वैकुठे ये सुगदयः। मानकुलाचल ( महेन्द्र, मलय, मन्न रातिमाम, ऋक्ष- तपसापि न लभ्येत तपोलोकमत: शिवे । पर्वत, विन्ध्य, पारियान-ये ७ कुलपर्वत १) मूल भादिसे तपोलीकसमा नास्ति लोसमध्ये सुलोचने । ले कर मस्तक पर्यन्त सुमेरु पर्वत है। मेरुके अबदेश- सालोक्यं महाकं स्यात सारूप्यं जनलोकके ॥ में भूर्लोकादि समवर्ग, और अधोभागमें सल पाताल है। मायुज्य तपोलोकेषु निर्वाण हि तर्धगे। सत्यलोकमें प्राकाररहित महाज्योतिःस्वरूपिणी महा- अतो ब्रह्मादपो देवास्तपोलोकार्थिनः सदा। शक्ति मायाकै हारा प्रात्माको पाच्छादित कर रखा है। तस्य लोकस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते ॥" यह महाशक्ति चनकाकाररूपिणी तथा हस्तपदादिरहिता तपोलोक गोलोकको अपेक्षा चार लाख गुना प्रधान और चन्द्र-सूर्याग्निस्वरूपिणी है। यह महायति माया- है। ब्रह्मलोक और वैकुण्ठस्थित देवगणा भी तपस्यार्क रूप वल्कलका परित्याग कर स्वयं प्रपनको दो भागों में हारा इस भवलोकको नहीं पाते। इस तपोलोकके विभता करतो है । उस समय शिव और शक्ति विभागसे समान दूसरा कोई बोक नहीं है। महर्लोक में सालोक्य, पहले मष्टिको कल्पना होती है तथा उसी समय प्रथम पुत्र होता है जिसका नाम है ब्रह्मा। जनलोकमें सारूप्य और इस तपोलोकमें सायुज्यलाभ "शृणु पुत्र महावीर विवाह कुरु यत्नतः। होता है । इसके बाद हो निर्वागा है। ब्रह्मादि सभो एतच्छत्वा ततो ब्रह्मा उवाच सादर प्रिये ॥ देवता इम सपोलोकको प्रार्थना करते है । इस लोकका त्यो विना अननी नास्ति शति मे देहि सुन्दरीम । माहात्मा करने में में ममर्थ नहीं हूं। तच्छुत्वा जगतां माता स्वदेहा'मोहिनी ददौ। "किमाकारन्तु ब्रह्माण्डं तन्मे ब्रुहि महेश्वर । द्वितीया सा महाविद्या सावित्री परमा कला । सृष्टिप्रकार सम्मध्ये किमाकार हि तत्त्ववित् ॥ अस्याः संग' समासाथ वेदविस्तारण 56 ॥ शंकर उवाच- अनायास सृष्टिकर्ता भव त्वं महीमण्डले ॥" जन्तोराकार ब्रह्माण्ड नानाविप्रह' पार्वति ॥ इस प्रकार ब्रह्माके उत्पन होने पर महाशसिने उनसे ब्रह्माण्ड' विग्रह प्रोक्तं स्थलक्षुद्रादिक हि तत्। कहा -"8 महावीर! तुम विवाह करो।" बापाने मेरुः पर्वतस्तन्मध्ये तथा सप्तकुलाचलाः। शक्तिको रसके उत्तरमें कहा-"पापके सिवा मरी पौर मूलादिमस्तकान्तं वै सुमेर म पर्वतः । कोई भी जमनी नहीं है, मैं विवाह करूंगा। पाप स्थितं मेरोरधोभागेद्वध गुल्याश्चोर्धदेशत: ॥ मुझे यति प्रदान करें। इस पर महाशतिने अपने शरीर- मूलीकादि महेशानि सप्तस्वक्रमेण हि । से मोहिनोयक्ति उत्पब कर ब्रह्माको दी और कहा- द्वगुल्या: सप्तपातासास्तिष्ठन्ति परमेश्वरि । "यह पति हितीय महाविद्या और परमकला है. उमका सत्यलोके निराकारा महाज्योतिःस्वरूपिणी। नाम है सावितो। तुम रसका सा करके वेदविस्तार माययाच्छादितात्मानं बनकाकाररूपिणी ॥ करो।स महीमहल पर तुम अनायास ही सष्टिकर्ता हस्तपादादिहिता चमार्याग्निपिणी। होवोगे।"