पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२६८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२६४ प्रसम्बन्ध वाक्यको सम्बत कर ग्रहण किया जाता है। प्रयोजन विमान देखो। असहादिप्रयुक्त वाक्य का प्रतषेध और खवाक्यमिधि १०पपदेष कारण निर्देश कर कार्य करनेको तम्बयुति हारा होतो है। पपदेश करते है । यथा जल पानसे घरोर में जल सञ्चय जहाँ पर वाकाका अथ स्पष्ट नहीं है तथा कुछ होता है, दमो लिये जलोदरको वृद्धि होतो .है, परन्तु जटिल माल म पति वहां दम तम्बयुतिहारा वाक्यका जल नहीं पीनेमे जलोदरको वृद्धि हो हो नहीं मरतो । अर्थ मल और पट किया जा सकता है। ११ उपदेश-कतव्याकत व्यके निर्देशको उपदेश १ प्रधिकरण-म शब्द का अर्थ अध्याय या अधिः कहते हैं। कार है । यथा दार्वजोवितोय अध्याय । १२ प्रतिदेश-प्रत अर्थ के अतिरिक्त निर्देशको २ योग. इस शब्द का अर्थ अन्वय है। यथा-वायु, अतिटेश कहते हैं। यथा हिकावासो तृष्णार्थी डोने पितोर कफ यथाक्रममे गोतल, उषण और मोम्यगुण- पर दशमल या देवदारुका काथ या मदिरा सेवन करे विगिष्ट है, यहां पर वायु गोतल, पित्त उगा और कफ कि सविपात उबरमें रोगोका खाम और कृष्णाको मोम्यगुणविशिष्ट , दमो तरह अन्वय माझमा पड़ेगा। अधिकता र तो है। इसलिये सबिपात ज्वरमें दशमून ३ हत्वर्थ-एक अर्थ दुमका माधक होनमे उमको प्रो. मदोरको संयुक्त कर सेवन कर सकते हैं । यही हेत्वयं करते हैं। यथा पित्त गौर रकको चिकित्माको पर साङ्गतिक चिमबके अन्तर्गत वाक्यको ही प्रति ममानता है। हम वाक्य डाग यह भी जाना जाना रित निर्देश कहते हैं। है कि पित्तक प्रकोप होने के प्रकोपको भी मम्भावना १३ अर्थापत्ति--प्रवत अर्थ के साथ विपरीत अर्थ के कर निकित्सा करनी पड़तो है। योधकको पर्थापत्ति कहते है। यथा प्रदर और शुक्र- ___ पदार्थ-पदार्थ नका अर्थ अभिधे । र्थ है, लच्या- थं या रानाथ नहीं ३ । जिम तर वाममें पोर अवोगत शैथिन्धको चिकित्सा एक ही है, इसलिये जो प्रदरमें प्रपथ्य है वही शुक्राय थिज्य में अपथ्य माना जा सकता है । रक्तपित्त में विरचन नहीं देना चाहिये । यहाँ पर गिरे १४ निण य-प्रत्रके उत्तरका नाम हो निगा य है। चन शब्दमें विकृत् प्रभृति विरेचनसर्गात योग हो ममझना चाहिये न कि एरगह (डोहातेन। क्योंकि विरे- १५ प्रम-प्रसङ्ग शब्दका अर्थ प्रमङ्गक्रमसे प्रर्था- चनवर्गमें एरण्ड लेन का उल्लेख नरें है। न्तर निर्देश है। ५ प्रदेश-जो हो गया है वही होगा, हम तरहको १६ एकान्त निर्देश करनको एकान्त कहते हैं। यथा मम्भावनाको मटेश करते हैं। यथा चन्द्रको राजयक्षमा उमा (गरमो)के विना उपर नहीं होता, यहाँ पर यदि कहा चरकोत विधिः प्रथमित हई थो. इमोनिये दुमरको भी जाय कि किसी किसो ज्वरमें गरमी नहीं रहती है तो राजयम मो विधि में प्रशमित होगा। एकान्त निर्देश नहीं होता। 4 उद्देश --मंक्षेप कथनको उहेग कहते हैं। यथा १७ अनेकान्त-अनेकान्त शब्दका पर्थ हो भो स्वादु, अम्न और लवण वायुनाश करना है, यही यक्षा सकता ओर कभी कभी नहीं भी हो सकता है। परमपम कहा गया है, इसीलिये इसका नाम उद्देश है १८ अपवर्ग --जो निहमके वहिभूत है, उसे ___७ निर्देश-उदाहरण दे कर विस्तारपूर्वक कथन- छोड़ कर नियम निर्देश करनेको अपवर्ग कहते है। को निर्देश कहते हैं। यथा दाडिम्ब (अनार) पोर पाँवखाके मिवा समस्त ___८ वाकाशेष-वाक्य में जब कोई बात असमान प्रकारके अन्न हो पित्तकर होता रहती है तो उसे वाक्यशेष कहते हैं। यथा वाद्य १८ विपर्याय-विपरीत पर्थ के प्राणको विपर्याय वायुके साथ प्राभ्यन्तर वायुको समानता है, यहां पर कहते हैं। यथा स्वादु, धन्न पोर लवच वायु नाश वाच वायु पोर पाभ्यकर वायु एक नहीं है, या करता है, इसलिये कटु, तिल पोर अपाय वायु प्रकोप वासपासमाना परताहै। . ... ...