पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२७३

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मात्रता-पनक परन्तु महत् प्रहार भौर पञ्चत मात्र इन मातो. तप:प्रभाव (म' पु. ) सपस: प्रभावः, ६-तत्। तपस्या- को प्रकृतिका कार्य समझना चाहिये। का प्रभाव । प्रकति स्वयं ही कारण है, मका पृथक् कोई तप:शोल ( वि.)पः एव शील स्वभावो यस्य, कारण नहीं है। मात्, अहसार और पञ्चतन्मात्र. ये बहुव्री । तपस्यापरायगा, तपस्याम लोन! सभी कार्य है। सांख्यद.) तप:माध्य (नि. पु. ) उपमा माध्यः, ३ तत्। तपस्या विशेष विवरण प्रकृति सन्दमें देखो। हारा साधनोय, तास्यासे माधन करने योग्य । सन्मावता म. स्त्री०) तन्मात्रस्य भावः तन्मान-सल मिड । संवि० ) तपसा सिद्धः, ३.तत् । तपस्या दारा टाप । तन्मात्रत्व। तम्मात्र देखो। सिद्ध, जिसने तपस्या करके सिवि लाभ की है। तन्मात्रिक (मं० वि० ) तन्मात्र सम्बन्धीय। तपकना (हिं क्रि०)१ उछलना, धड़वाना। २ टपकना तन्यता-तन्यतु देखो। देखो। सन्यतु ( स० पु० ) तनोति विस्तारयति तम-यतुच् । १ तपचःक (हि. पु० ) एक प्रकारका तुर्की वोड़ा। वाय, हवा । २ गत्रि, रात । ३ वाद्य-मतोतयन्त्रविशेष, ' तपडो ( हि स्त्रो० ) १ दूर. छोटा टोला । २ जाड़े के प्राचीन कालका एक प्रकारका बाजा । ४ गजल, गर अन्त में होनेवाला एक प्रकारका फल । पकने पर यह जमा । ५ प्रशनि, वच, बिजनो। ६ पजन्य, गाजतः पोलापन लिये लान्न रंगका हो जाता है। हुधां बादल। तपती ( म स्त्रो० ) १ सूर्य को कन्या। यह सूर्य को पत्नो तम्ब ( स० वि०) तन-त्युन्। १ अनादेश, उपदेगका छाया के गर्भ मे उत्पन्न हुई थों. बहत रूपवतो थों । कुरु प्रभाव । (पु.) २ वायु, हवा । सन्वि-काश्मीरको चन्द्रकुन्या नदीका एक नाम । वशीय ऋक्ष-राजपुत्र मवरण सूर्य के अच्छ भक्त थे। तन्वी (म० स्त्रो०) तनु-डो। १ कशानो, वह स्त्रो उनको शुश षामे तुट हो कर सूर्य देवने सपतोको उन्हीं के जिमके अङ्ग कश और कोमल हो । २ शालपर्णी । माथ विवा: कर दिया था। ( भारत ११.१अ• ) ३ थोकणको एक स्त्रीका नाम। (हरिव १३८ अ०) २ नदोविशेष. एक नदो का नाम । यई नदो दाक्षिणात्य ४ छन्दोविशेष, एक छन्दका नाम । इसके प्रत्येक चरणामें प्रदेशमें मह्याट्रि पर्वतसे निकल कर पश्चिममुख में परब ममुद्र में गिरी हैं। यह नदो कोण देगको उत्तरीय २४ वर्ण रहने हैं तथा १।४।५।१२।१३।१६।२३ ओर २४ सोमा है। तापी देखो। अक्षर गुरु होता है। तथा ५, १२वें और २४वें अक्षर पर विराम लेना पड़ता है। तपन (सपु० ) तपतोति तप कत्तरि ल्यु । १ सूय । २ तप (सं० पु. ) तप-पच । १ ग्रीम, ज्येष्ठ और प्राषाढभलात वृक्ष, भिलावे का पेड़ । ३ प्रवक्ष. मदार, मास । २ तपस्या। ३ ज्वर, बुखार। प्राक। ४ ग्रोथकान, गम्मौका ममय। ५ अग्न्यादिमें तप प्राचार (म.पु.) तपका पाचरण करना, उमको दानयुक्त नरकविशेष, एक प्रकारका नरक जिसमें जाते- प्रभाबना करना, प्रादि सब तप आचारक हो में हैं। हो शरीर जल जाता है। खुद्राग्नमय वृक्ष, परमौका तपस् देखो। पेड़। ७ सूर्य कान्तमणि सूरजमुखो। ८ साहित्यदर्पणोत सपःकर (म.वि.) तप: करोतिबाट।१ तपस्याकारी, स्त्रियों के योवन कालमें मत्व जात अलकारभेद, वह क्रिया जो तपस्या करता है। (पु. ) २ तपस्विमात्म्य, नपमो या हाव भाव आदि जी नायक वियोगमै मायिका मकली। करती है। अग्निमद, एक प्रकारको अग्नि । (पु.) १० रुपालय (म० वि०) तपमा अश', ३-तत् । तपसे क्षोग। शिव, महादेव । ११ ताप, जन्नन, दाह, पाच । १२ धूप। तपाक शसह (सं० वि०) सपस: कश सहते सह-अच। १३ जनशास्त्रानुसार विद्य त्प्रभ नामक गजदन्त । इन्द्रिय संयमादिकारक तपस्वी, जो तपस्वासे होनेवाले नवकूटोंमसे एक । (त्रिलोकमार ७४०, ९४८ गाथा) बारको सहनकर सकता। सपनक (सं.पु.)मालिधान्य भद, एक प्रकारका धान। Vol Ix.68