पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२७४

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२७० वपनकर-तपसे तपमकर (म. पु. ) संपनस्य करः, ६ तत् । रश्मि, सूर्य- सपभूमि (हि. स्त्री. ) तपोभूमि देखो। को किरण । तपराशि (हिं. पु. ) तपोराशि देखो । सपनच्छद (म० ए० ) तपनः अतिरुक्ष: छदो यस्य, बह- तपलोक ( स० पु. ) तपोलोक देखो । वो पाटित्यपत्रवत्ता मटारका पेड। तपवाना (हिं• क्रि०) १ गरम करवाना, किसो दूसरेको तपनतनय ( म०प० तपनम्य तनयः, ६ तत् । सूर्य के तपानकै काममें प्रवृत्त करना। २ अनावश्यक व्यय पुत्र यम, कणा , शनि, मुग्रोव आदि। करना, बिना प्रयोजनका खर्च कगना । सपनतमय। ( म'• त्रा० ) नयनतनय-टाप । १ शमोक्ष नविनय (म० पु ) तपस्वी पुरुषों को विनय करना। मय को अन्या यमुना, तपतो प्रभृति । तपड (हि. वि०) तपोवृद्ध देखो। सपनर्माण ( म० पु. ) तपनः सूर्यः तत् प्रियो मणिः । तपश्चरण (म क्लो०) तपम: चरण । तपश्चय, तपस्या। म य कान्तमणि । । तपश्चर्या ( म. स्त्रो० ) तपन: चया. ६.तत्। व्रतचर्या, तपनांशु (म० पु.) तपनस्य अंश:, ६ तत् । रश्मि, मूर्य तप, तपस्या । को किरगा। तपम् (सं. क्लो.) तप असुन् । १ वह जिसके द्वारा मन तपना (म० स्त्रो०) क्षुद्राग्निमन्य । निर्मल हो, शरीरको कष्ट देनेवाले वे व्रत और नियम सपना (हि० कि० ) १ तप्त होना, गरम होना । २ मन्ता जो चित्तको शुद्ध और विषयों से निवृत्त करने के लिये होना, कष्ट सहना, मुमोबत झेलना । ३ गरमो किये जॉय, तपस्या। २ पालोचनात्मक ईखरंज्ञान- फै लामा । प्रबलता दिखलाना, रोब दिखनाना। विशेष । ३ सुविधामा, सुधा और तृष्णा, भूग्व, प्यास । तपमात्मज ( म० पु.) १ यम, कर्ण प्रभृति । (स्त्रो०) ४ मोनादि व्रत । ५ शरोर वा इन्द्रियको वशमें रखनेका तपनस्य पात्मजा, ६-तत् । २ म य को कन्या, गोदावरी धर्म। ६ शास्त्रानुसार शरीर. इन्द्रिय और मनका शोधन । नदी, यमुना तपनी प्रभृति । ७ कष्ट मे किये जानेवाला चान्द्रायगा प्राजापत्यादि प्रायः सपनो ( म स्त्रो० ) तप्यते पापमनया तपल्य-डोष्। वित्त। ८ शास्त्रविहित तम्लशिलारोहणादि। ८ वान- १गोदावरी नदो। २ पाठा, एक लता, पाढ़। प्रस्थावलम्बीका असाधारण धर्म । तपनीय ( म० क्लो. ) तप-प्रनोयर.। १ स्वर्ण, मोना । २ सपके सोम भेद हैं-शारीरिक, वाचिक और कनकधुस्त र, धतूग । ३ वह जो उत्तम करनेका उपयुक्त मानसिक। हो, वह जो तापने के काचिन हो । देवताओंका पूजन, बड़ों का आदर सत्कार, ब्रह्मचर्य, ४ जनशास्त्रानुसार सोधर्मादि चार खगों के अड़तोस अहिंसा प्रादि शारीरिक तपके अन्तगत है। ट्रक विमानोंमेंसे एक । (त्रिलोकसार ४६५ गाथा) सत्य और प्रिय बोलना, वेदशास्त्र पढ़ना भादि ४ (पु० ) ५ शालिधान्य भेद। वाधिक तप हैं। सपनोया ( मको ) तपनीय स्वार्थ कन् । सुवर्ष, मोनावलम्बन, पात्मनिग्रह आदि मानसिक तप है। सोना। ये तप फिर तोन प्रकारक है-सात्विक, राजसिक तपनेछ ( म० को० ) तपनस्य सूर्यस्य इष्ट', ६-तत् । साम, भोर तामसिक ।। ताँबा। जो फलको आकासे परिशून्य हो कर परम हासे 'सपनष्ट' (म स्त्रो०) शमोमेद, एक प्रकारका शमोवृक्ष। उक्त तोनों प्रकारको तपस्याका अनुष्ठान करता है, वही सपनोपल ( म पु०) नपन इति नाम्ना ख्यात: य उपलः। मात्विक तप है। जो मनुष्य-समाजमें सवार, सन्मान सूर्यकान्तमणि । और पूजादि लाभके लिये उन तीनों प्रकारको तपस्थाका सपन्तक ( H• पु० महाराज उदयमक विदूषक वसन्त पनुष्ठान करते हैं, उसो पारविककलशून्य तपस्याको का पुत्र, नरवाहमदत्तका बन्धु । राजस तप कहत और पत्यन्त दुराबाहारा मरेके