पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२७९

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तपोवन-मालक संपोवन (मलो . ) तपमो वन, ६-सत्। १ सापस मेव्य तमकुन्ध (म.पु.) तसा कुम्भो यत्र, बहवो । नरक- वनविशेष, मुनियों का आत्रयस्थान, वह एकान्त स्थान भेद, एक भयानक नरकाका नाम। इसके चारों ओर जहाँ मुनिगण कुटो बना कर तपस्या करते हैं। २ मी गरम कड़ाह है जिनमें लोहेका चर्ण और तेल सदा नामका एक तीर्थ, वृन्दावनस्थित एक वन । यहाँ गोप- खौलता रहता है। उन्हों कड़ाहोंमें दुराचारियोंको कन्या कात्यायनो व्रत करते हैं। इसके पास हो चीरघाट मस्तक नोचेको ओर करके यमके दूत फेंक दिया करते है। (भक्तमाल) वन्दावन देखो। और गिह उनके नेत्र, अस्थि इत्यादि उखाड़ उखाड़ उनमें तपोवन (म० को०) तपमा वल, ६-तत् । तपस्याका बल, डाल देते हैं। जब उनमें उनका प्रत्येक पङ्ग गल जाता तपस्योका प्रभाव। है तो यमके दूत उसे करो या चमचेसे घोटते है। तपोवृद्ध ( म. वि. ) तपमा वृद्धः, ३-तत्। तपोज्य ष्ठ, जो रम तरह आवर्तयुक्त महातलमें दुष्कर्मकारी मनुष्य तपस्या हारा येष्ठ हो। तयोहशन ( म.F.) १ मानषि भेद, तपसोमूर्ति का उन्मथित होते हुए पनक प्रकारको यन्त्रणा पाते हैं। (मार्कण्डेयपुराण ; नरक देखो। एक नाम । २ तामम मनुके एक पुत्रका नाम । तमकच्छा ( म' पु-क्की. ) तन जलदुग्धादिना पाच- तपस्य देखो। रितं कच्छ यत्र वा तमने प्राचरितं। बादशाहमाध्य तपोनी । हि स्त्रो० ) १ ठगीको एक रसम। जब वे व्रतविशेष, बारह दिनों में समान होनेवाना एक प्रकारका मुमाफिरीको लूट मार कर उनका माल घर ले जाते हैं व्रत । इस व्रतमें व्रत करनेवाले को पहले तीन दिन तक तच यह रमम को जाता है । इममें वे मिल कर देवोको प्रति दिन तीन पल उषा दूध, सब तोन दिन तक प्रति. पूजा करते और उन्हें गुड़ चढ़ा कर उमौका प्रमाद दिन एक पल घी, बाद तोन दिन तक नित्य ६ पल उष्ण प्रापममें बाँटते हैं। जन और अन्त में तीन दिन तक ता वायु मेवन करना तल ( में त्रि०) तप-न। १ दग्ध, तपा हमा, जनता पड़ता है। दूध गरम किये जाने पर जो उष्णवाष्पनिक हुआ। २ तापयुक्त, जिममें अधिक गरमी हो। ३ लता है वही तलवायु मानो गई है। टुःखित, पीड़ित। यह व्रत करनेसे हिजोंके सब प्रकारके पाप नष्ट हो तमक ( म० ला० ) १ रोप्य, चॉदो । २ स्वर्णमाक्षिक।। जाते हैं। प्रायश्चित्तविवेकके मतसे यह व्रत चार दिनों में तलकाञ्चन ( म० लो०) तमं यत् काञ्चन', कर्मधा० । भो किया जा सकता है। पहले तीन दिन यथाक्रमसे अग्निस योगसे विमल काञ्चन. आगसे माफ किया हुआ दध, घो और जल सेवन करना चाहिए और चौथे दिन मोना। तमकुगड़ ( स० पु. ) प्राकृतिक उष्णा जलधारा, गरम उपवास करना चाहिये । इसको चतुरहसाधा तमलच्छ कहते हैं। प्रायश्चित्त देखो। पानीका सोता । पहाड़ों या मैदानों में कहीं कहीं गरम पानीके सोते मिलते हैं। इसका कारण यह है कि या तो तलखल ( म० पु. ) औषध कूटनेका गरम किया हुपा पानी बहुत अधिक गहराईमे या भूगर्भके मध्यको अग्नि- तलजला ( सं स्त्रो० ) तप्त जल यस्याः, बहो । जेन- स ताल चट्टानों परसे होता हुआ पाता है। ऐसे जलमें शास्त्रानुमार मोतानदोंके दक्षिण तट पर देवाख्य वेदो. खनिज पदार्थ मिले रहने के कारण इसमें स्नान करनेसे से भागे उक्त नामको एक विभङ्ग नदो है। इसका जल प्रायः गेग जाता रहता है। ऐसे गरम जलके सोते यूरोप गरम है इसीलिये यह नाम पड़ा है। और अमेरिका में बहुत पाये जाते हैं। दूर दूरके मनुष्य सलपाषाणकुण्ड (म पु०) तमामा पाषाणानां कुण्डमिव । उन्हें देखने तथा उनका जल पीने के लिए वहाँ पास, मरकविशेष, एक नरकका नाम ।। और बहुतसे मनुथ रोगसे छुटकारा पानेके लिये महीनों सलवालुक (म'• पु० नम बालुका पत्र, बहुब्री० । १ नरक- उनके किनारे रह जाते । जल जितना हो गरम होगा विशेष, एक नरकका नाम । मरक देखो। (वि०) २ इसमें इतना ही गुख अधिक होता है। उत्तामाकामय, गरम किया बाल ।