पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२८०

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समाप-तसशर्मिकुण्ड समाष ( म० पु० ) तप्त मापमित सुवर्णाटिक यत्र, | तमराजतेल (म'० ली.) पायुर्वेदीत सेलविशेष, एक तर बद्री । परोक्षाविध्य, यादोन कालको एक प्रकार की हका दवाई का तेन्न । परीक्षा । यह । रोता कमी मनुष्यको अपराधी या निरा प्रस्तुत प्रणाली-भरमौका नन्न ४ सेर, मदार महि- पगधी माबित करने के लिये को आतो थी। इसमें लाई जन, धतरा, वासक, मम्हाल, दामूल कारख, बला या नबिक बगानम बोस पल तेल और घी डाल कर उसे प्रत्ये कका रस ऽ४ मेर कल्काथं पोपन, बला, मोठ पोपल- अग्निहारा उत्तल करते थे । बाद उममें एक माषा मोना मल, चोतको जड़, कटफन्न, धतूरे के वोन, चव्य, जोरा, छोड़ कर अपगधोको उमे बाहर निकालने के लिये कहा सोया, पुनणं वा, हलदा, देवटाक, ईशलामा, शुक जाता था । यदि उमको पंगुली में छाले श्रादि न पड़ते मूला, कुड़, दुरालभा, कालाजोरा मिजका गाँट, मदार तो वह मचा ममझा जाता था । ( गृहस्पति ) का गोंद, जयपालमन्न नागटोना, विडंग, मैन्धव, यव इम का दूसरा विधान भी इस तरह है.- क्षार, रक्तचन्दन, मञ्जिनका जड़, उत्पल, मिच, जेठी मोने, चांदो, ताब, लोह और मट्टी के बरतनको भन्नी मधु, रामा, काकड़ामोंगा, कगट कारो और वरुणको भांति परिस्कार कर अग्नि पर रख छोड़ते थे बाद उनमें छाल, प्रत्येकका दो तोना । इस प्रकारसे यह तेल बनता गायका ती या तेल डालते थे। इसके बाद विचारक है। शिरःपीड़ा में यह औषध विशेष फलप्रद है। तथा . धर्मका आवाहन और पूजादि करक निम्नलिग्वित मन्त्र नत्रशूल काशल, तरह तरहका मविपात, वातनमा, हारा अग्निको शुद्ध करते थे। गलया, मब तरह का गोथ, ज्वर, पिलहो, मारोग, ये "ओं पर पवित्रममृतं धृतत्व' याकर्मसु । • मब रोग उपशान्त हति हैं। दह पावक पापं त्वहिमशीतशुचे। भव ॥' यह तेल और एक प्रकारका होता है। प्रस्ततप्रणालो -- बाद जिस मनुष्यको परीक्षा करना होतो उसे उप- कटतेल ४ मेर. गोमत्र १६ मेर, क्वाथके लिये धतूग वास करना पडता और तब मान कर पाद्रवस्त्रयुक्त हो (प्रतिका), डारमरज, झिण्टो, जयन्तो, मभाल, प्रतिज्ञापत्र मस्तक पर रख कर निम्नलिग्विन मन्त्र पढ़ना शिर!ष, हिज्जल प्राा महिंजन मिलित दशमूल, प्रत्येक पड़ता था- २ मेर, जल ६४ मेर, शेष १६ सेर कल्कार्थ मदनफल, 'ओं वमग्ने मर्वभूतानाम-नश्च ति पावक । त्रिकटु, कुड़, काला जोरा, ठ, कट फन्न. वरुण झाल, साक्षिमत् पुगयपागेभ्यो ब्रूहि मत्य करे ग ॥" मोथा. हिज्जल, बलगगे, हन्तिाल, जवापुष्य विष, मन:- यह मन्त्र पढ़ कर उस खोलत हुएममे तामाष निका- शिला. काकड़ामोंग', र कचन्द र, सचिनो छान. अज लन पर यदि परीक्षार्थीको उगलीम छाले आदि न पड़ते मायन और बचौक ज?. प्रत्येक का दो तोला। इससे तो वह मचा मझा जाता था। (दिव्यतत्व) दिव्य देखो। शिरःशल, नेत्रशून पण ल, ज्वर, दा, स्वेद, कामना, मानमुद्रा (म० स्त्री.) तमा अग्निसन्माला मुद्रा, कर्मधा। पागड, और तेरट तररका विपात नष्ट होता है। शरोर पर धारणोपयोगी अग्नि सन्तप्त भगवान्का आयु- शिरःशलमें यह तेन विशेष फलप्रद है। भेषज्यरावली) धादि चित, हारका शंखचक्रादिक छापे। वैष्णव लोग तमरुपक (म लो० } नाम वडिगोधित रूपक रुप्य', पर्म तपा कर अपनी भुजा तथा दूसरे अङ्गों पर दाग कम धा० । विशुद्ध र प्य, तपाई ही और साफ चाँदी। लेते हैं । यह धार्मिक चित्र होता है और वैष्णव लोग तमलोमश ( स० पु ) काशोश एक प्रकारको धातु, से मुक्तिदायक मानते हैं । मुद्रा देखो। कसोस। सप्ताहम् (म लो० ) सम्म रहा, कर्मधा० अम समा- तमलोह (स• पु. ) नाकविशेष, एक नरकका नाम । मान्स । १ वकि, भाग। २ तत्रवत् निर्जनाम, वह तमशूमि कुण्ड (म. पु. ) सल्ला अम्मिमयो धर्मि लोड एकस स्थान जलों पर कोई दूसरा मनुष्य जा मही प्रतिमूर्ति यत्र तथाविध बुख यत, बाबा। नरक सकता। विशेष, एक नरकमा माम। "