पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२८७

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२८ ईट बाँध देती और इषको शाखा लटका देती है। देखा जाता है। दपकुमारचरित, वात्कथा प्रति वर्ग भोमादेवोमे सभी अत्यन्त भय करते हैं। देवोका अन्यों में नामलिन वादेशका प्रधान बन्दरके जैसा वर्णित क्रोध बहत प्रचण्ड है। १८वों शताब्दी में महाराष्ट्रीय- है। प्राचीन संसात ग्रन्थ पढ़नेमे मान म पड़ता है. कि गण वनदेशक) ल टते लुटने जब तमलुकको पहुँचे थे, वोपमागर चौर भारत महासागर होपावलोके साग तब देवकि भयमे उन्होंने वहाँ कोई अत्याचार न किया। ताम्रलिमका यथेष्ट बाणिज्य चलता था पोर समुझे उन्होंने बहुत धूमधाममे देवोको अचमा को। मन्दिरके केवल ८ मोलको दूरी पर यह शर अवस्थित रहा। निकट रूपनारायण नदाका वैग मन्द है, किन्तु कुछ दूर । सामग्निामे बौडधर्म पन्तरित होने पर यह हिन्दूधर्म का जा कर इसका वेग बहन तोब हो गया है। अधिवामियों- नोर्थ क्षेत्र हो गया है। किमो किमान तममा निमः का कहना है, कि रूपनागयग्म नदो देवोकं भयमे डर । अर्थात पाप-कलशित. रन टी शब्दोंसे सामानिसको करको मन्दिरके निकट धार धार बहन लगी है। पनक व्यक्ति निरित को है, इसमे जाना जाता है बार नदी बढ़ कर मन्दिरके ममोप तक पहुँच गई थी। कि पूर्व कालको इम स्थानमं धर्म नियम उसना प्रति- एक बार मन्दिरसे केवल ५ गजका ही फक था । जलकै पानित नौं होता था। जो कुछ हो, तामलित उत्पत्ति प्राघातसे मन्दिर नष्ट हो जायगा इम पागलसे पुरोहित- मम्बन्धम एक कहानी इस तार प्रचम्नित है-विणा अच गणा भागने लगे। किन्तु नदोका जल कुछ दूर और बढ़ कल्कि अवतार है त्योका विनाश करत करत बहुत कर पाई हट गया । मन्दिर निरापदस रहा। कान्त हो गये, तब उनके शरोग्मे साम्रलिपमें पसोना नमलुको विषण का एक मन्दिर है । प्रवाद है, युधि गिरा । देवधर्म हारा लिप्त हो जानेमे यह स्थान पवित्र ष्ठिरके अश्वमेधयतका घोडा जब तमलुक आया. तब संवमें परिणत हो गया और इसका नाम ताम्मलित पडा। यहाँकै प्रयरवगीय राजा तानवज उसे पकड़ा। अतएव मस्तक प्रन्योंमे लिखा है, कि भारतवर्ष के दक्षिण- प्रश्वरक्षक मनाक अधिपति अजुनके माथ उनको गारो दिकस्य तालिम सोधमै खान करनेमे मनुष्य मब पामि मुठभेड़ हुई। लड़ाई में ताम्रध्वजको जोन हुई और विमुक्त होते है। फिर भी कहा है, कि जब महादेवने वे या माथ अर्जुनको बाँध कर लाये । कण स्वयं टचका मध किया, तब ब्रह्महत्या पापर्क कारणा उनके विष्ण थे, इम कारण कप और अजुनको एक माथ हाथमे दक्षका किन मम्तक परिघष्ट न इमा। दूसरा बध हुए देख ताम्रध्वज पितान अपने लडकका तिर- कोई उपाय न देख उन्होंने देवताओंको शरण ली। देव- स्कार तथा अषणसे मविनय निवेदन किया। मयंदा गणन उन्ह' पृथ्वोकं ममस्त तीर्थीम पर्यटन करनेको लष्ण और अजु नसे दर्शन होता रहे, इस प्राशासे उन्होंने मनाह दो। महादेव ताम्रलिश छोड़ कर पोर दूसरे एक मन्दिर बनवाया और उममें कृष्ण तथा अर्जुनकी टूमरे तीर्थो मे डो पाये, किन्तु उनका प्रभोष्ट मिहन प्रतिमूत्ति स्थापन करनेको आज्ञा दी। उन दोनों प्रति इमा। उनके साथ दसका मस्तक धर्म लिल अवस्थाम मूर्तियों का नाम जिष्ण और नारायण हैं। प्रायः ५४ गया। तब व हिमालय पर्वत पर तपस्या करने लगे। मो वर्ष व्यतीत हए. म्यानोय नदाम इम मन्दिरको इस ममय विषा, भगवान्न उनके मामन उपस्थित हो पामसात् कर लिया है, किन्तु दोनों प्रतिमूनि योको रक्षा कर सामलिलमें जानके लिये उनसे कहा । उनके कथना- की गई थी। बाद गोपजातीय किसी स्त्रोन एक मन्दिर नुसार शिवजोन तामलिलमें जा वर्ग भौमा और जिष्ण - निर्माण कर. उसमें उस मूर्तियां सापित की । मन्दि- नारायणके मध्यवत्ती जलाशयमें नान किया। मान रको पाखति और निर्माणकौशल वर्गभीमा देवीक करने के बाद हो उनके हाथसे दक्षका मस्तक नोचे गिर मन्दिर सरोका। पड़ा, इसी कारण इस खानको कपालमोचन कहते हैं ... तमसुक पत्वात प्राचीन शहर है। इसका संसहात नाम और यह एक प्रधान तीर्थक्षेत्र में गिना जाता है। काल- तालि। महाभारतमें भी ताबविधवा यो क्रम यह खान नदी गर्म हो गया है। पब मी