पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२९५

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कई तरहको मगर तमाकू पैदा होतो।। मोठी पोर सिन्धो ये तोन तरह की समाव यहाँ बोग्दादो तमाकू की फसल ब पच्छो और ज्यादा होतो।। होतो, कारण किसान लोग बोने के लिए इसके बीज खोया तित गौर भन्न पावादविशिष्ट है। ज्यादा काममें लाते पोर पसन्द करते है। सम्भवतः समके मीठी-इसका खाद मोठेपनको लिए होता है। बोज सबसे पहले बोग्दादसे ही भारतमें लाये गये थे, सिन्धी-पति इसी लिए इमका नाम ऐगा पड़ा है। मध्यभारत-म्बालियरके पन्तगत भेलसा नामक नोकी -दमको पत्तियों खूब लम्बी और नोकदार स्थानको तमाकू बहुत उमदा होती है। बङ्गालमें यह होती है, इसलिए इसका नाम “नोको" पड़ा है। यह भेलसाके मामले प्रमिह है। राजपूतानाके अन्तर्गत देशी पौर "मोका” के भेदमे दो प्रकारको है। अमेिरको तरफ भी एक प्रकारको उहाट समाज पैदा घामली - यह लाहोर, अमृतसर और सियालकोटमें होती है जिसे 'पामरो" कहते है। होती है। इनको मिर्फ पत्तियाँ हो व्यवहत ओतो हैं, बाल । --इम देशमें यथष्ट सम्बाकू होती है। तमाकू डंठल किसी काममें नहीं पाते। को खेतोके लिए इस देशमें कितना जमीन लगो हुई है, इसका निर्णय नहीं हुआ। क्योंकि, यहाँ तमाकूको ___पूर्वी -पहले बङ्गालमे एम जातिका तम्बाकू के बोज उत्पत्ति अधिकतामे होने पर भो देशको कषिमें उसको ला कर लाहोरकी तरफ दमको खेती की गई थी, इम- गिनतो नहीं है । रगपुर. बिहुत, पूर्णिया दरभङ्गा, २४ लिए इसका नाम पूर्वी पड़ा है। इसको खेती में यहाँ कुछ परगना, दुयार, चयाम पहाड़ भोर कोचविहार ज्यादा खर्च पड़ता है। यहाँके लोग इसे पानके साथ जिलेमें और जग हमे तमाकूको खेतो ज्यादा होती है खाया करते हैं । धनिक लोग इसको पोत भी है। तथा सब स्थानों के उत्पब द्रव्यम हो व्यवसाय चलता है। जंगनी--मकी पत्तियां देखने में बंगनको पत्तियोमे अन्यान्य स्थानांकी तमाकू वहींके लोगोंके व्यवहारमें मिलती-जलतो होती है, इस कारण इसका नाम बेंगनी खतम हो जाती है। जो किसान तमाकूको खेती करने- पड़ा है। उस देश इमोका प्रचार ज्यादा है। का निश्चय करता है, पर उसके लिए प्रायः अपने घर सुरती-सूरतमे बोज ला कर इसको पहले पहल वा गोग्राहके पामको जमोन चुनता है । बारासातको सरफ खेतो की गई थी, इसलिए इसका नाम सूरती पड़ गया। जहाँ नालका खतो बद हो गई है, उन जमीनों पर यह तिक्त और कड़ी होती है। करनाल जिले में देशो समाकूको खेतो अच्छी होती है। श्रावण, भाद्र और तमाकु, खेतांके गुण और पत्तकि प्राकारानुसार तीन तर आखिन मासमें, समाकूके पौधे ५६ पञ्चक होने पर को उत्पन्न होती है-बुगड़ी, सुरनाली और खजरी। उन्हें दूसरी जमीन में गाढ़ी है तथा माधसे चैत्र मास डेरा-स्मारमखाँ जिले में दो प्रकारको तमाकूको पैदायश तक पत्ते तोड़ लिए जाते हैं। रगपुर और कछाड़की है-मिन्धार और गारोबा। गारोबा अति निकष्ट तमाकू समाकू समम्त पूर्व भारत और ब्रह्मदेशमें जाती है। रङ्ग है। यहाँ लोग इसे कान्दाहारो समाकूके माथ मिला पुरको जमीन और पाब-हवा तमाकके लिए बहुत हो कर पानी तमाकू जमात है । गारोबा तमाकूमें स्वाद और उपयोगी है। राजपुरुषोंका अनुमान है, कि कुछ दिन गन्धको विशेषता कुछ भी नहीं है। बाद यहाँको तमाकू और भो उमदा हो कर बहुतसे सिन्ध-खरीफ फसलके बाद इस देश में समाकको देशम विस्वत होगी । तमाकूको रक्षा करनेको व्यवस्था खेती होती है। यहाँ समाकूको पहली फसलको मेहरो पच्छो होने पर इस विषय में प्राथाके अनुसार फल मिन्न करते । एक मास बाद दूसरी फसल कटती है, जो सकता है। बाटो या "बापर" कहलाती है। शिकारपुरी तमाकू १८६७ ई० में रखपुर के एक व्यखिने अपने यनसे प्रस्तुत इस देशम उमदा समझी जाती है। इसके सिवाकी तमारिसको प्रदर्शनीम भेजकर पदक पुरस्कार