पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२९८

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२९४ तमा पौर सुगन्धित बनाने के लिये उममे मड़े केले, पतर तथा | बनतो है । कर्णाटक प्रदेश में पीनो समाक नहीं चलती, न्यान्य मशाले डालते हैं । मधनीका हो अधिक प्रचलन है। इस देश में हिन्दू लोग, 'गुडक' वा पोनो तमाकूमें ग्वमोग ही विशेष प्रमिह हुक्का क्या चीज है यह भी नहीं जानते। मुसलमानों के है। बहुत उमटा तमाकूके पत्तों के साथ गुम्नकन्द हुक्के में तमाक पोमा हिन्दुओं के लिये जातिनाथका कारण (मिसरो और गुलाबको पखड़ोसे बनता है, मेवका : समझा जाता है किन्तु नस्यसेवन अति पादरणीय है। मुरब्बा, पानका मूखा हुआ दरा, मुश्कवाल (चन्दन को ! यहूदो, आर्मनो भोर परवके व्यवसायो लोग मसलोपत्तन भाँति सुगन्धवाला लकड़ो), चन्दन, इलायचा, कंवड़ - को नास ले कर नाना स्थानों में फिरते हैं। मसलो. का इत्र. कोकनवर ( सुमिष्ट फलविशेष) और अमल पतनको नस्यप्रस्तुतप्रणालो बहुत हो महज है। जिसमी तामका चूर्ण मिला कर फिर उसे मड़ा कर खमोरा पत्तियाँको नास बनानो हो, उसके डण्ठल और नमें निकाल तमाकू बनायो जातो है । मम्तोसे मम्तो खोग - कर पाधीको घाममें सुखा दें और सूख जाने पर उसका तमाकू रुपये में 5७ मेर तक बिकतो है। अमलो चरा बना लें । बची हुई अाधो तमाकूको नमक के पानो. रखमोग-तमाकू हण्ड में भर कर बिना वजनके बिकती में उबाल लें। उबालने के बाद जो पानी बचे, उसमें नयो है। पञ्जाब, दिल्ली, लखनज पादि स्थानों में खमोरा : समाकू भी उबालो जा सकतो है । ऐसा करते रहनेसे समाकू बनती है। खमोगके माथ मऊंट तमाकू पानी क्रमशः तमाकूर्क पर्कमे गाढ़ा होता रहता है। असमें पतं मिला कर दूमगे तमाक बनती है। पानो जब गुड़की तरक्षका हो जाता है तब उसको ठण्डा विहारको ताफ खमोरा बनानक निए जटामासो, ; किया जाता है । फिर उसमें थोड़ोसी ब्राण्डी (विलायती करिना, सुगन्धवाला भोर सुगन्धकोकिन नामक गन्धद्रव्य शराब मिला कर पूर्वोक्त तमाकूका चूग डाल दिया मिलात हैं। लखनऊमें "बादशाहों' तमाक खमोरा जाता है । छह दिन तक यह सड़ता रहता है । पोछे वह पन्तगत है। यह अति उपादं य बस्तु है। नस्य धोतल में भर कर बचा जाता है। पोनी-तमाकू बहुत जगह पच्छो बनतो है । पञ्जाबको चुरुट-विशिरापल्लो, बदेश पादि स्थानों में चुरुटके खमोरा और लखनऊको बादशाही-तमार्क मिवा चुनार, कारखाने है। इन स्थानास अपने नामसे मशहर हर चहालगढ़, गया आदिको तमाकू भी बहुत उमदा होतो सरहके चुस्टीका विलायत के लिए रतनी होतो है। है। बङ्गालम विष्णु पुर और पामरपुरको पानी-तमाक! इसके सिवा सभो जगह देशो चुरुट बनते हैं । मानिला, प्रति उत्कष्ट समझा जातो है। कलकत में विष्णुपुर, काभाना, लङ्का और यवहोपको तमाकूकै चुरुट भी विदेश पानरपुर, गया, चगडालगढ़को तमाकू ही ज्यादा बिकतो को जाते हैं। है। इनके साथ ग्राहकोंको रुचिके अनुसार खमोरा- बीडी-यह शाल या बादाम पादिके पत्तोंमें तमामू. समाक भी मिलाई जाती है। विणुपुरको सर्वोत्कष्ट का चुरा लपेट कर बनाई जातो है। गरीब लोग इसे पोनो तमाक कलकत्त में ) सेर बिकतो है। हिलोमें चुटकी तरह मुलगा कर पोते हैं। यह ब्राहाणाँके सिवा इसको "पियानी वा पिइनी कहते है। तमाक पोनेके अन्य लोगोंके लिए बड़ी प्रिय वस है। लिये इका, नलो प्रादिको पावश्यकता होतो है। 'खैनी' वा 'सुखा'-पश्चिम में विशेषत: विक्षर, इसका ___गस्य वा नास। मसलोपतनको नाम जगत्प्रसिद्ध ज्यादा प्रचार है। तमाकूके सूखे पत्तोंको खैनी' कहते चौर जगत्व्याप्त है। यह बोतल भर कर बेचो जातो है है। बंगाल में से 'दोता' कहते हैं। लोग रसको चबा और ख व सरम और खुशबूदार होती है। इसके सिवा कर खाते हैं। काशी, पहिया और पञ्जाब प्रान्तमें भी सूचनो बनती सूखा-समाके पत्तोको,चूनाके साथ रगड़ कर गोली- है। काशीको नाम सुगन्धयुक्त और प्रसिद्ध पर बहुत कड़ी सी बना लेते हैं और जोभके सखे रख कर इसका रस होती है। पसाबमें नोको और विहारमें मोतिहारी नास साबरते।