पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२९९

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तमा २६५ सुरती-तमामें कस्तूरी चन्दन पादि मचाले डास तमाम दो प्रकारका तेल और एक प्रकारका चार कर उसे कूटें और मटरको बराबर गोलियाँ बना ले। इन तीन पोगोंसे हो उक्त कार्य होते है । एक प्रकार. यह पानके साथ खायो जाता है। काशोको मुग्तो उमदा का तेल उहायु है। पानोमें समाक उबालनेमे, पानोके होती है। अपर यह तेस तेरने लगता है। इसमें हो समाक को विशेषता--तमाकूके पत्तोंसे एक प्रकारका निर्यास गन्ध पोर ग्राहित्व थोड़ा मया लामेवामा )-गुण रहता निकालता है, जो विषाक्त है। हुकको नलो उत तैन है यह उत्ताप नगमे वायुमें मिल जाता है । समाक पोर तमाकू के पत्ते वाहत होते हैं। देशोय वैद्यों के पोते ममय धुएं के साथ यह हो शरीरमें जा कर अपना मतमे नमाकू संक्रामक तथा विषघ्न है। क्रम प्रकाश करता रहता है। हुके के पानी मे विष-फोड़े पादिका विष और दूमरे प्रकारका तेल तमाक जलते समय चता रहता सूजन जाती रहती है। हर को लकड़ोमे जो तैलवत् है। इसका स्वाद कडपा होता है। यह विषात ने द्रव्य निकलता है, उमसे नमका घाव और रतौंधी द्रव्य है। इसको एक हो बूंदमे विनोको दम निकल मच्छो हो जाती है। कोषपदाह रोगमें नास, चना और जाती है। भिनिगार या मिरकासे इस तेलको सुल्तानो चम्पकक्षको छालका चुरा तोनीको एक साथ पोधित कर लेनिमे इसका जहर जाता रहता है। मिला कर प्रलेप देनसे रोग पारोग्य होता है। डा. तमाकूका क्षार--थोड़ामा गन्धकद्रावक मिना कर, लिथका कहना है, कि धनुष्टङ्कारमें मेरुदण्ड पर तमाकू ईषत् अम्ल जलमें तमाक को भिगो दें, फिर उममें को पुल्टिश देनसे कायदा पड़ता है। ज्यादा नाम कलोका चूना डाल कर उसे चुपावें ऐसा करनेसे एक मधनेसे अजोण ता. ज्यादा चुकट पोर्नसे शरोरयन्त्रमें प्रकारका वर्ण होन तैलबत् उहायु क्षार मिलेगा। यर दुर्वलका, यात्में कार्यशाम, पाकयन्त्र में कार्यानि इत्यादि जलसे भागे और अति विषात होता है। इसको एक होतो है . कभी कभी लकवा जैसा पानेप भी होता है। बूंदमे कुत्तामर जाता है। इसको गन्ध इतनी तीव्र है, समाके उचाल्ने हुए पानामे मेकने पर धनुष्टकारका कि एक घर में यदि इमको एक बूंद हवाके माथ मिल जाय प्रक्षिप घट जाता है। तमाकूका डण्ठन लड़कों के गुछ तो वहां खाम लेना भी कष्टकर हो जाता है। सूखे तमाकूके । देश में लगानिमे मृदु विरेचन होता है एक तरफका पोता प में यह क्षार २मे ८भाग तक रहता है । 'खैनी' खाने बढ़नसे उस पर तमाकूका पत्ता बाँध देनेमे सूजन पोर वाले उमके साथ चूना मिला कर खाते हैं, इसलिए उनके दट जाता रहता है, पर मिर और देश घूमती तथा के शरीरमें इम द्रव्यको अनिष्ट कारिता • बहुत ज्यादा होतो है । ष्ट्रोकनारन विषमें तमाकूका पानी प्रतिषेधक होती है। का काम करता है । चूने में तमाकू के पत्तोका चरा, हुक्क में पानी रहने के कारण हुक्के से ताक, पोने पर मिला कर प्लीहा ( पिलहो )के जपर उसका प्रलेप देनेरे उक्त विषाक्त द्रव्य शरोरके अन्दर पल्प परिमाणमें प्रविष्ट फायदा होता है । मसूद फूलन पर तमाक दबा रखनसे होते हैं। धुएँ के साथ, मोके भीतरसे पाने के समय, पाराम पड़ता है। उसका कुछ अंश ग्लोमें और कुछ पानी में रह जाता है। इसके अलावा यदि तमाक सेवनका अनभ्यास हो नलीदार हुक्के को नली बड़ो होने कारण उसमे विषात तो इससे उहार, वसन, दस्त और खाँसी हो जाती है। द्रवा पौर भो कम पेटमें जाते है । चुरुट पौनेसे यह सुभीता सहसा लकवा भी हो सकता है। समाक चबानेसे जितना नहीं होता। मस्य बनाते समय तमाकू मा चार और तेल- पनिष्ट होता है, उतना तमाक पोनेसे नहीं होता तथा / भाग बहुत कुछ नष्ट हो जाता है, इस कारण पुरुटकी । नस्व लेनमें उससे भी कम पनिष्ट होता है। नासधने अपेक्षा वह कम पनिष्टकर है। प्रथिवी पर ८० करोडसे मे अभावपि प्रापलिको सोखताका नाम, पम्निमान्दा अधिक लोग तमाकू पोते है।ग्राहा द्रवाके सेवनसे शरीर और सादवा परिवर्तन हो जाता है। ... और मन कुछ रोनित और अवसादशून्य होता है,