पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३२१

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सलिए ताहारा यह मोमोसित नहीं होता । दुरूर मनुषाका भ्रम पा. पोहे 'यदि यर मनुवा है. तो हाथ विषयमें तक छोड़ कर शास्त्रका अनुमरण करना मचित पैर जरूर होते ऐमा नक सदित होने पर यह वास्तव में है। शास्त्र समझने के लिए भी तक की जरूरत है. किन्तु मनुष्य नहीं है. ऐसा स्थिर होता है । मोगत नामके बोड वह तक शास्त्रानुकूल है । शास्त्रसे प्रतिकून तक हो कहा करते हैं. कि यह शामान विचित्र पदार्थ समूह प्रतिषिद्ध हुधा है। शास्त्र प्रादि किसी भी विषय के जामने. विज्ञानमय ज्ञानस्वरूप है, अर्थात् मोते ममय जमे बाघ, में न ही एकमात्र कारण है। तक के बिना किसी भी हाथो, मनुषा पाटि दोख पड़ते है किन्तु पसलमें वे कुछ विषयका वास्तविक तत्वार्थ माल म नहीं होता। यह भी नहीं है. केवल रूप हैं, उसो प्रकार आपत् अवस्थामें तक शास्त्रानुयायो होना चाहिये, ऐसा न होनेमे उसे पृथिवो, जल, मनुषा पाद जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहे कुतर्क वाद आदि कहते हैं । इस प्रकार के कुतर्क वादियो- हैं, वे पदार्थ भोजनस्वरूप है, जानके पतिरित कुछ से किमी तरहका भो सके न करना चाहिये तथा करने भी नहीं। में भी कोई फल नहीं होगा। (वेद' तद०) दममें न यायकों का कहना है, कि सोते समय जो गौतमसूत्रमें तर्क का विवरण इस तरह लिखा है पदार्थ अनुभूत होते हैं, जग जाने पर वे पदार्थ मिष्या 'अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्वज्ञानार्थमुहस्तर्कः।' अर्थात् मन:कल्पित मात्र माल म पड़ते हैं; इसलिए (गौतमसूत्र १।०) वाप्रिकपदार्थ ज्ञानम्वरूप होने पर भो जाग्रत् अवस्थामें जो व्यापाका प्रारोपप्रयुक्त व्यापकका आरोप हो तक. नाना प्रकार के पदार्थ दोख रहे हैं वे कभो भो जानमय पदार्थ है अर्थात् ध मादिका प्रारोप करके व्यापक नहीं, ज्ञानमे भिव है। इस प्रकार दोनों के वाक्य मुन है। व्यापक वति आदिका जो आरोप होता है. उसो. कर, हम जो पदार्थ-ममूर देख रहे हैं. यद जामस्वरूप को तक कहते हैं। है या ज्ञान के अतिरिक्त, यह मशय अवशा हो उपस्थित 'भागेप'का अर्थ है अयथार्थ ज्ञान । सूत्र में 'कारणोपा होता है। बादमें दृशामान चराचर पृथियो, जल, पत्तित: इन शब्दों में व्यापाका भागेपप्रयुक' यह अर्थ मनुषा, पशु, पक्षी आदि पदाष्टी यदि ज्ञानम्वरूप हो, जान. तथा 'उ' शब्दसे वापकका आरोप ऐसा अर्थ हुआ है। से भिव न हों, तो हम प्रतिदिन पृथिवोको पृथियो, जल - 'सक हारा क्या फल होता है। शिषाने जब गोतम को जल, मनुषाको मनुषा नहीं समझ सकते थे तथा देवसे यह प्रश्न किया, तब महर्षिने उत्तर दिया-किमो दृथिवीका पृथिवो और जल को जल इत्यादि रूपमें हमको पदार्थ में विशेष संशय होने पर तक करना चाहिये, जैसा ज्ञान हो रहा, वैमा औरका भो होता है, सर्कसे मशयको निवृत्ति हो कर यथार्थ पक्षका निर्णय वास्तवमें वाद्यपदार्थ स्वाप्रिकमान को भाँति जामरूप हो जायगा।' होते तो पृथिवोको पृथिवो, जन्नको जल इत्यादि एक इमलिये तर्क पदार्थ निणं यमें विशेष प्रयोजनीय है। रूपसे समस्त व्यक्तियों के अनुभावका विषय नहीं होता। तर्क के विना कभो भो एकताका निश्चय नहीं होता। जब देखते हैं, कि स्वप्रावस्थामें सबका ज्ञान एकसा नहीं जैसे जलसे उत्थित वाष्पको देख कर बहुतोको 'वाष्य है होता, इस प्रकारका तक उदित होने पर हवामान या धुमाँ' ऐसा सन्देश हुआ करता है। अनन्तर यह पदार्थ समूह ज्ञानम्वरूप नहीं ज्ञानसे पृथक है, प्रया यटि धुमाँ हो, तो जलमें अग्नि हो सकती है, किन्तु हो ऐसो अवधारणा होती है। इन सीके बिना पसंशयः वस्तुतः जसमें पम्नि नहीं होती. तो वाष्य का निकलना रूपमे कभी भी एकतरको अवधारप नहीं होती। इस कैसे सम्भव हो सकता है, पतएव यह धम नहीं है। लिए पदार्थ निण यमे तक बहुत पावशाक है। प्राणी. इस प्रकारको पापत्ति जिसको उपस्थित होती है, उसको मात्र को तक इपा करता है, किन्तु विशेष परिचय न इस तक के वारा'याधुषा नहों, वाय' ऐसा नियय होनसे उसको तक नहीं समझते होता है। दूरसे एकाच काहनो देश बार इससे न्यायपामि तर्कपदार्थका विस्वतरूपाने प्रकाश होने Vol. Ix. 80