पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३२२

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३१८ मे न्यायशास्त्रको तर्कशास्त्र भी कहते हैं। तर्क पहने ऐसा सन्देश होने पर यह वृक्ष यदि हम वृक्षसे उत्पन मंशय, फिर सके और अन्तम निर्णय--इन सोन अंशा होता, तो इस वृक्षका अनधिकरण कालके उत्तर में परिममाज होता है। क्षणमें उत्पब न होता अर्थात् इस वृक्ष के उत्पन्न होनसे ___ उक्त तक में कोई पदार्थ पापाद्य वा आपादक पहले भा यह वृक्षा होता, क्योकि जो वस्त जिम ( अर्यात व्याप्ययापकभाव ) नहीं होता । क्योंकि जला- पदार्थ से उत्पन होतो है, उस वस्तुसे पहले वह शय यदि धूमविशिष्ट होता, तो पटविशिष्ट भी होता, पदार्थ अवश्य ही रहता है अपनो उत्पतिसे पहले इस प्रकारको प्रापत्ति कभो भो मम्भव नहीं तथा यह पाप कभी भो महों रहते । इमलिए यह बस एस वृक्ष मे यदि मनषा होता, तो शृङ्गविशिष्ट होता, ऐमो पनि उत्पब नहीं है। अन्य जिम आपत्तिमें स्वमें खत्तित्व कोई नहीं करता। इमो लिए याप्यका आरोपयुक्त आपादक होता है । उमापत्तिका नाम भी आत्माश्रय सापकका प्रारोप कश गया है, अर्थात यापक पदार्थ में है। जिस प्रकार इस पृथिवो पर पर्वत प्रादि स्थित हैं, हो अापत्ति हुआ करतो है। उक्त स्थानमें धमका व्यापक उमो प्रकार इस पृथियों के उपरिस्थित हो कर यह पट नहीं है और न मनुषत्वका व्यापक शृङ्ग, रम पृथिवो है या नहीं? ऐसा मशय होने पर यदि यह निए उनको वर आपत्ति नहीं हुई। उक्त आपत्ति के पृथिवो इम पृथिवोके ऊपर स्थित होतो तो इम पृथिवी. पक्षमें पापाद्यका अभाव निश्चय होने पर यह ज्ञान उत्पन्न मे यह पृथिवा भिन्न होतो, क्योंकि अधिकर गसे प्राध्य होता है । इमलिए जन्माशय यदि मविशिष्ट होता तो पृथक होता है. यह सब जगह देखा गया है । अधिकरण द्रय होता. रोमो आपत्ति नहीं होता। कारण, जलाशय और आधेय एक ही व्यक्ति हो, ऐसा किमोन भी नहीं में द्र यत्व का प्रभाव नहीं, किन्तु द्रयत्वका निश्चय हो देखा । है। यह तर्क ५ प्रकारका है - अात्मा श्रय, अन्य न्याश्रय, यह अापत्ति हितोय आत्माश्रय है। जिस आपत्तिम चक्रक, अनवस्था और वाधितार्थ प्रमङ्गः । स्वप्रत्यचसे स्वमात्र अपेक्षणोय अथवा स्वमें स्वज्ञानस्वरूप इनमें जो आपत्ति स्वयें व अपेक्षणीय होने पर होती आपादक होता है, वह आपत्ति टतोय आत्माश्रय है। है. उमका नाम है आत्माश्रय, अर्थात् प्रापत्तिम अत्मा यथा-म घटका प्रत्यक्ष यदि इम घटमावसे उत्पन्न को ( अपनी ) अपेक्षा करतो है इमन्निए हम आपत्तिका होता, तो घटको उत्पत्ति के बाद सब समय इसका नाम प्रामाश्रय है। प्रत्यक्ष होता. जब कि इस घटका प्रत्यक्ष कारण यह जिमके अभावसे जो वस्तु मम्भव नहीं होतो, उसको घट मात्र है और वह घट सर्वदा हो है। कारणके बिना अपेक्षा कहते हैं, अपेक्षा भी उत्पत्ति, स्थिति और जाति के कार्य क्यों नहीं होगा, अथवा यह घट यदि एतद्घट भेदसे तीन प्रकारका है । यथा--वृक्ष उपजनमें बोज और जानरूप हो, तो यह घट ज्ञान सामग्रोसे उत्पन्न होता, पुत्रादिको उत्पत्तिमें पिता माता, वस्त्रादि बनानमें तोत कारण जो ज्ञानरूप होता है, वह ज्ञान मामग्रोसे मृत आदिको अपेक्षा होती है, तथा किसो पदार्थ के अवश्य ही उत्पन्न होता है। मामग्री शब्दसे इस कारण मस्थापनको आवश्यकता होने पर अधिकरणाको अपेक्षा ममूहका बोध होता है, जिससे कार्य हुआ करते हैं। चाहिये, किमो पदार्थ को शनि अर्थात् अभिव्यक्ति (ज्ञान) स्वमें स्वापेक्ष अपेक्षणीय होने पर जो अनिष्टको आपत्ति पावश्यक होने पर इन्द्रियादि अपेक्षित होतो है, इमा होतो है, उसको पन्योन्याश्रय कहते हैं। फलत: लिए उत्पत्ति, स्थिति और अप्लिके भेदमे आक्षेप सोन जिम भापत्तिमें खजन्ध अन्यत्व, सुत्ति वृत्तित्व, स्वज्ञान प्रकारका हनिमे प्रामाश्रय भी तोन प्रकारका है। ज्ञानमयत्व. इनमेंसे कोई भी एक पापादक हो, यही वस्तुतः जिम प्रापत्तिमें खमें खजन्य पापादक होता है, पन्योन्याश्रय है। यथा-यह वृक्ष यदि इस वृक्षजात वहो पापत्ति प्रथम भामाश्रय, जैसे-एक वृक्षको फलजन्य होता. तो यह बमजात फल इस वृक्ष के पैदा देख कर 'यह वृक्ष रस वृक्षसे उपजा है या नहीं होने से पहले पवश्य हो होता, क्योंकि कारण कार्य से