पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३२३

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पहले अवश्यमी रहता है। किन्तु जैसे यह वृक्ष उस द्वारा सृष्ट है, अतः निराकार जगदोग्खर हारा उसको वयका पूर्व क्तो नहीं होता, उमी तरह इस वृक्षसे सृष्टि नहीं हो सकतो, इस प्रकारको शङ्का खड़ी कर उत्पत्र फल भी इस वृक्षका पूर्ववर्ती नहीं होता रस- यदि उनमें भो शरीरको कल्पना करें, तो जगटोखरजे लिए यह वृक्ष इस वृक्षजात फलजन्य नहीं है। सो शरीरको सृष्टि के लिए पृथक् एक शरोरो जगदोखर को तरह यह घट यदि इस घट में स्थित होता, तो यह घट कल्पना करनी पड़ेगो और उनके शरीरको सृष्टि के लिए इस घटसे भिन्न होता तथा यह घट य द इम घटज्ञान भो पुनः पृथक शरोरो परमेश्वर की कल्पना करनी पड़ेगो, स्वरूप हो, तो यह घट ज्ञान मामग्रीसे जन्य होता। इस तरस अनन्त, कोटो कोटो साकार अगदोहरको और जिस पदार्थ को स्वीकार किया उस तरह पदर्थ- कल्पना करने पर भो किमो हालतमै मृष्ट कार्यका निर्वाह में प्रमोम पापत्ति धाराको कल्पना के कारण पनिष्ट नहीं हो मकता इसलिए दार्शनिकों ने एकमात्र जगत् प्रमङ्ग होता है, इम अमवस्था दोष और उक्त अनवस्था-! स्रष्टा माना है। अथवा यह ममागरा पृथियो शून्य में टोषक भयमे किमो एक पदार्थ को मोमा स्वोकार करना अपने शक्ति तलमे है या अन्य किमो मुहहत् माकार पड़ता है । यथा-अविभज्य परमाण को निस्वयव न मान आधार पर है, इस प्रकार मदे हाक्रान्त हो कर यदि कर उमको मावयव मानना होता है तथा उक्त अवयव में पृथिवोका कोई माकार आधार मान ने, नो उम पुनः अवयवको कल्पना आवश्यक है। इन प्रकार आधार वस्तु को स्थिति के लिए पुन: और एक साकार अनन्त अवयवको कल्पना करने पर मर्षप और सुमेरु के आधारको कल्पना करनी पड़ेगी। समान परिमाणापत्ति हो सकती है। कारगा जो वस्त! __ इस प्रकारमे उम भो आधारको कल्पना करनी जिमको अपेक्षा अधिक संख्यक अवयवों हाग म गठित पड़ेगो, पर तो भी यह नि ग य नहीं होगा कि, पृथियो है, वह वस्तु उसको अपेक्षा महत् परिमाणविशिष्ट है। किम के आधार पर है। इस प्रकार के अनवस्थादोष के तथा जो ट्रव्य जिम वस्तुको अपेक्षा अल्पसंख्यक अवयवों कारण ज्योतिर्विदोन पृथिवीका कोई माकार प्राधारा- द्वारा संगठित है, वह वस्तु उसका अपेक्षा क्षुद्र है। न्तर नहीं माना, पृथिवी अपनो शक्ति के बलसे सटा अतएव इम जगह जमे पार्वतीय परमाणके अवयव : श्राकाशमें विद्यमान है, ऐमा वे स्वीकार करते हैं। अनन्त हैं, उसो प्रकार मर्षपोय परमाणके अवयव भी पात्माश्रय आदि जो चार आपत्तियोंका उपख किया अनन्त हैं, दोनांक न्यूनाधिक्यका निश्चय करना माध्यातोत गया है, उनके सिवा अन्य आपत्तियां का नाम है प्रमाण- है। म तरह दोनों को अनन्त अवयवविशिष्ट मानना वाधिताथ प्रसङ्ग। पड़ता है। सुतरा दोनों में परिमाणगत कोई वैलक्षण्य न यह प्रमाणवाधितार्थ प्रमग दो प्रकारका है --एक होनसे दोनोंम हो ममान परिणाम को आपत्ति हो सकतो व्याग्निनिर्णायक और दूमरा विषयपरिशोषक । ब्यालिनि- है। इस अनवस्थाभयसे परमाणुको निरवयव कहना यक उमें कहते हैं, जिस तर्क के द्वारा व्यानिकी निम- होगा तथा जैसे विचारालयमें अपराधो है या निरपराधो, यता हो, लोमे धूममें वह्निको व्यालिका निश्चय होने पर, यह निश्चय करने के लिए गवारको जरूरत है, उसो उस धूम दाग वह्निको अनुमिति इषा करतो है। प्रकार गवाह देनेवाला उम घटनास्थल पर था या नहीं, किन्तु जब तक धूममें वहिके व्यभिचारका मन्दह रहे, इस तरहको भापत्तिसे यदि गवाहको गवाहो मजूर को तब तक व्याप्तिका निश्चय नहीं होता। जाय, तो उन्ना गवार के लिए गवाहोको जरूरत है, इस इसलिए तक द्वारा व्यभिचार सन्देह (वधि अर्थात् तरह पसंख्य माक्षोको पावश्यकता होती है । सुतरां किसो, प्रभावाधिक धमको विद्यमानताका प्रभाव )-को तरह भी विचारक निष्यत्र होने की सम्भावना नहीं, इस दूर करना आवश्यक है, जैसे--धम वहिव्यभिचारो है स्थानमें भो ऐसे अनवस्थादोषके भय से केवल एक साचो या नहीं ऐसा "न्देह होने पर धूम यदि वहि व्यभिचारा प्रचलित है, अथवा वसमाव ही किसी न किसी शरोरी हो, तो वतिने उत्पब नहीं होता। कारण ना जिससे