पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३२८

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में एकवस्त्र पहन कर तर्पण करना हो, तो एक पर पहलेको प्रतिपदासे (महानया प्रमावास्या तक प्रेतपक्ष जसमें और एक पैर स्थल पर रख कर तर्पण कर । जन- कहलाता है ) पोर गङ्गादि तीर्थ में सब दिन तिमतपंग में उतर कर तर्पण करना हो तो नाभिमात्र जन्नम हैं। किया जा स . ता है। दाहान्तमें और प्रेत के उद्देश्यमे स्थान पर तपंगा करने के नियम कुछ विशेष है, यदि कोई निषिद्ध दिनको भी तिलतण करें। ऐमो दशा में किसी उहत जन हाग तपर्ण करें तो उसमें तिल मिन्ला नैवें। दिन भो तिनतर्पण निषित नहीं है। यदि तिमिश्रित न किया जा सके, तो विवक्षण वाक्ति मौवर्ग, ताम्म वा रोप्यमय अथवा खतनिर्मित पात्रसे को चाहिये कि, वह वामहस्तके द्वारा तिल ग्रहण करें। पितगेका सर्पण करने से सब कुछ अक्षय होता है। तिलतपंगा करना हो तो अगष्ठ और अनामिका सुवर्णदिके पावकं विना अथवा तिन और दर्भ के हारा वामहस्तसे तिल ग्रहण करें और पावस्थ कर बिना सांगोदक पितगं के लिय लिकर नहीं होता। पितरांका तप करें। किन्तु ऐसा समग्र द्रव्य के अभाव में समझे। सोवण जो वाक्ति तिलको रोमम स्थ करके पितगंका तपंग प्रादि पात्रमें सुवर्ण हाग उदक पिट मोर्थ को स्वयं करके करत है, पिटगण उस तपणके हारा तर्पित न हो कर देना पड़ता है। उनका रुधिर और मल हारा तर्षित होते हैं। जलसे पंगा करना हो तो पावमेंसे जन ले कर अन्य "रोमसंस्थान तिलान् कृत्वा यस्तु सन्तर्पयेत् पितॄन् । शुद्ध पात्र में वा जलम भर हुर गड़हमें निक्षेप करें, वहि:- पितरस्तर्पितास्तेन रुधिरेन मलेन च ॥"आलिकतत्व) शून्य स्थानमें परित्याग न करें। तप ण का जन जलपात्र- वाम करमें जहाँ रोम न हो. वहीं तिन्न रखना मे एक बिलम्त ऊँचेसे छोड़ना चाहिये । चाहिये। किसी शुद्ध पात्र में मिल रख कर पंगा करना उपवोतो हो कर देवों का, निवोतो हो कर मनुष्या. उचित है, ऐसा करने मे लोमसे मिलनकी मम्भावना नहीं। का और प्राचीनावाति हो कर पितरांका तप किया वावहार भो मी तरहका देखनमें आता है। विजगगा जाता है। तप गण करते समय वामहस्त बहुतर कुशयुक्त ताम्रनिर्मित सिलधानीको वामहस्त मणिबन्धमे संयुक्त करे पोर दक्षिण हस्त कुशपत्रहय निमित पवित्रयुक्त करके सपण किया करते है। तिलक बिना शुद्ध जनसे करें। किन्तु ग्राहियांक लिये प्रतिदिन इन द्रव्यांका भी सपण हो सकता है। किन्तु सिलतर्पण अधिक फल- स ग्रह कर कार्य करना अन्त काठन है । इसा लिए दायक है। शास्त्रकारांने एक सहज उपाय निर्धारित किया है। कुश, रोप्य वा स्वर्णा रोय दाहिने हाथको अना- दहिने हाथको तज नोंमें रजत और अनामिकाम सुवण मिकामें पहननो चाहिये। एक हाथसे सपण करना धारण कर, एसा करनस हो यादि धारण करनका निषिद्ध है। यव पौर त्रिपन हारा देवतगा, तिल पर काय हा जायगा। कुशमोटक हारा विवृतपंण करना विधय है। तिलक "तजन्या रजत धार्थ स्वर्णधार्थमनामथा। अभावमें सुवर्ण और रजतयुक्त करके जल देवें। उसके कार्यकरै यस्मान्नतुवन्याः कशा: कुशाः ॥" आहिकतत्त्व प्रभाव में दर्भ युक्त जल द्वारा तर्पण करें। इसके सिवा सामगगणको चाहिये कि वे मनकादि दिव्यमनष्य- अन्य प्रकारसे तणन वार। तिलकै अभावम क्रमश का तर्पण प्रत्यङ मुख हो कर करें। सामगेतर लोग प्रतिनिधि कहे गये हैं। इससे हो स्पष्ट प्रतीयमान होता उदा मुख हो कर तर्पण करें । देवगण पूर्व, पिवगण होता है, कि तिलयुक्त तर्पण ही प्रशस्त है। रविवार, दक्षिण, मनुष्यगणा प्रतीची और प्रसुरगण उत्तर दिशाको शुक्रवार, हादशो और अमावस्यानिमित्तक बाइक मिवा भजमा किया करते हैं, इसलिए तर्पणादि कार्य भी उता अन्य बाइके दिन, सममो, जन्मतिथि पोर संक्रान्तिमें। दिशामों की तरफ मुंह करके करने चाहिये । देवोको तिल तर्पण न करें। किन्तु अयम और विषुवस क्रान्ति, मोतिक लिए तोन बार जलतपंण करें और ऋषियों में प्रहकाल, युगादि, प्रेतपक्ष ( महाला) अमावास्यासे लिए एक बार। पिता पितामह, प्रपितामह, मातामह,