पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३२९

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प्रेमातामह, प्रमातामह माता पितामही और प्रपिता- तपण प्रयोग-पसे जो ममये कहा गया है, उस महो, इनको तीन बार पिटतोथ द्वारा सईप करें। ममय के अनुसार प्राचीमावोसो पोर दक्षिणमुख भी कर किन्तु माताके पनुरोधसे मातामझो, प्रमातामहो और कताञ्जलि पूर्व क- वृक्षप्रमातामहीको एक बार नप या करना चाहिये। "ओं कुरुक्षेत्रं गया गंगा प्रभास पुष्करानि च । इन बारह व्यक्तियोंमसे जो जीवित हो. उनको छोड़ तीधाग्येतानि पुण्यानि तर्पणकाले भवविहा" कर उनमे ऊँचे पुरुषको ग्रहण कर बारह संख्या पूर्ण । यर मन्त्र पढ़ कर तीर्थावान करें। पीछे पूर्व करें। मन्यामी पोर पतित व्यक्ति के लिए भो पाहो मुख उपवीतो हो कर देवतर्पण करें। "ॐ मास्टप्यता, विधान समझ। ॐ विष्णुस्त प्यता पो रुद्रस्टप्यता, ॐ प्रजापतिस्तप्यता' तदनन्तर विमाता, ज्येष्ठ नाता, पित्रव्य, मातुल __ब्रह्मादि प्रत्ये क देवताको विपत्र के साथ देवतीर्थ वारा पादिका तर्पण करें । बान्धवोंके तर्पण के बाद सुदीका एक एक अञ्जलि जलप्रदान करें। इस प्रकारसे देवतण सपंगा करें। सुहद यदि असवणे हों तो भो उनका करके- तर्पण किया जा सकता है। "ओं देवा यक्षास्तथा नागा गन्धवाप्सरसोऽसुराः। बाह्मण को, असवर्ण होने पर भी भीष्माष्टमोमें भीष्म- का तर्पण करना पावश्यक है। ब्राह्मण आदि जो वर्ण क्रूरा: सर्ग: सुरीश्च तरवो ब्रह्मगा खगाः॥ विद्यावरा जलाधारास्तथैवाकाशणामिनः । भोष्माष्टमा भोमको जल नहीं चढ़ाते, उनका एक वर्षमै निराहाराश्च ये जीवा: पापे धर्म रताश्च ये ॥ कमाया हुपा पुण्य नष्ट हो जाता है। तेषामाप्यायनायतददीयते सलिलं मया।" ' ब्राह्मण यास्तु ये वो दद्युभष्माय नो जलम् । सम्बत्सरकृतं तेषां पुण्यं नश्यति सत्तम ॥" यह मन्त्र पढ़ कर देवतौथ के द्वारा एक पनलिजल (आलिकतत्त्व ) प्रदान करें। बादमें पश्चिममुख निवौती हो कर- पहले देवतर्पण, फिर मनुष्यतर्पण, पश्चात् मरोयादि "ओं सनकश्च सनन्दव तृतीयश्च सनातनः । ऋषितर्पणा, उसके बाद अग्निष्वात्तादि पितरोका तर्पण, कपिलवासुरिश्चैव बोदः पश्चशिसस्तथा । अनन्तर चतुर्दश यमतर्पण कर पितरोका नर्पण करें। सर्वेते वृप्तिमायान्तु मरतेनाम्ना सदा।" पोछे रामतपण करें। इन समस्त तर्पणोंमें प्रशना होने पर शामुनि यह मन्त्र दो बार पढ़ कर प्रजापतितो के द्वारा दो लिखित समितपंण करें। इस संक्षिप्त तणसे पञ्जलि जल प्रदान करें। उसके बाद पूर्व मुख उपवीती समस्त तर्पा सिद्ध होंगे। हो कर 'ॐ मरीचिम्टप्यता, ॐ पविस्टप्यता, ॐ पहिरा- स्त्री और शूद्र तर्पणमन्त्र ब्राह्मण के हारा पाठ करा स्त प्यता, पुलस्त्यस्त प्यता, ॐ पुलहस्तृप्यता, ॐ बात कर खुद 'नमः नमः' उच्चारण करके जल चढ़ावें । किन्तु स्टप्यता, ॐ प्रचेतास्तृप्यतां ॐ वशिष्ठस्त प्यता भगुः पिनादिका नामोल्लेखपूर्वक जो वाक्य कहे जाते हैं, स्तृप्यता, ॐ नारदम्प्यता" यह कह कर मरीचिसे उन्हें स्त्री और शूद्र कहेंगे । अनुपनीत और जीवत्: __ नारद पर्यन्स यथाक्रमसे प्रत्ये क को देवतीर्थ दाग एक पितक व्यक्ति प्रेततर्पणके सिवा अन्य तर्पण नहीं कर एक अञ्जलि जल चढ़ावें। सकते। एमके उपरान्त दक्षिणमुख प्राचीनावोती हो कर ॐ रनमे पहले मानवको निचोड़ना न अग्निष्वासा पितरस्तप्यतामितत् मतिलोदक तेभ्यः स्वधा, चाहिये । याज्ञवलकाने कहा है, जो तर्पणसे पहले खान- ॐ सौम्याः, ॐ विश्वसः, ॐ उमपा:, ॐ सुकालिमा, बस निचोड़त, उनके पिवगण महर्षियोंके साथ ॐ वर्हिषदः, ॐ पाज्यपा: मनको पित्तोथ हारा सतिस निराध बार पसे जाते है। एक एक पचलि जसपी -- Vol 1x.82