पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३३१

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तव-ग ३९७ एम मनके हारा पहले तीर्थ-पावाहन करना तर्पणघाट-दिनाजपुर जिलेके मरहद परगने के प्रधान चाहिये। एक पलिग्राम। परगनिमें यही ग्राम मबसे मगहर है शूद्रगण भीम-तपण करके पिटतर्पण करें। ओर और करतोया नदी के किनारे अवस्थित है। इस के पास सब नियम सामवेदियों के समान है। हो अनेक गुफा और शालके वन हैं। प्रतिवर्ष चैत्र ऋग्वे दियोंका पंगा यजुर्वैदियों जैसा है, सिर्फ वा वंशाव माममें यहाँ एक भारो मेला लगता है जिममें पग्निप्वात्तादि पितरों का तर्पण तीन बार करना पड़ता प्रायः ४५ हजार मनुष्य इकट्ठे होते हैं। है। जन्माष्टमी तिथिमें मिफ जनमे ही पितरों का तांगा सपंगामन्त्र ( म. ली. ) कियामञ्जरो' नामक जनगन्थ- किया जाय, तो सौ वर्ष के गया-शाह का फल होता है। में उल्लिखित एक स्त्र । । आह्निकतस्व ) सर्प गो (म स्त्र०) प गिच करण ल्य ट डोए । १ गुरु. तन्त्रके मतमे तपंण तोन प्रकारका है--१ पातर. कन्दवन, विग्नी का पेट । २ गङ्गा । (वि.) ३ प्रोमि. २ मानम और ३ बाह्य । मोम. अ और अनलके मघट- दायिनो, टभि देनेवालो। मे मावलित जो परम अमृत, उस दिव्य अमृनमे परम तर्पणीय ( म. वि. ) शशिने योग्य । देवता का जो तर्पण किया जाता है, उमको प्रान्सर-नणछ, (म पु०) तय गछति रष-उ निपातनात् सर्पगा कहते हैं। प्रात्माको तन्मय कर अर्थात जिन देवता माधुः। १ भोम। (वि.)२ तर्पणाकांक्षो, जो का तर्पण करें, उम देवता के स्वरूप, लोन हो कर तर्पण कर में इच्छक हो। जो तर्पण किया जाता है, उसका नाम है मानमत यिनय (म. वि. ) हर-गिच नव्य। टक्षिक योग्य । तर्पण । विशुद्ध स्थानमें बैठ कर तांगा पारम्भ करना नपिणी 4 स्त्री०) न यति प्रोगात टप णिच-गिनि, चाहिये। पहले गुरुका तपंगा कर पोके मूलदेवोका : ततो डोप । पद्मनारिणो नता, स्थान कमम्बिनी। तर्पण करें। पहले बोजवय ग्रहण करें', पश्चात् विद्या तपित ! म त्रि.) हा णिच, त। प्रोणित, मन्तु किया गौर हतभुग्दयिता ( म्वाहा ) युक्त करके मूलदेवोका हा नाम ले कर "तर्पयामि नमः" इस पद का प्रयोग करें। तपि न (म त्रि.) वृष-णिच-णिनि । १ प्रोविता, मन्तुष्ट ____ कुलवारि हारा देवता, अग्नि और ऋषियोंका तपंग करने वाला । २ तर्पण करनेवान्ना । करें । तर्पणके आदिमें "तृप्यता" एम पदका प्रयोग : सपिनो म स्त्रो०) टप इन गौरा कोष । पञ्चचका- किया जाता है। गिणो। कहीं कहीं तपिन्नो एमा भा. पाठ देखा जाता ___ इस प्रकारमे विषण , रुद्र, प्रजापति, ऋषिगगा, oिa. है जिम का अयं भी यही है। तपिलो कपिन कादि। गण और भैरवोंका तर्पण करें। तपंगा के प्रारम्भ में 'त्रिपुर: रस्यन्न, तपिलो । स्वार्थे कन् । तर्षि निका, तल्पिलिका । पूर्व' इम पदका प्रयोग करना आवश्यकोय है। * तबू ज ( हि पु० ) तरबूज देगे। (त्रि.)६ नेत्रपूरण । बीजद्वयं तन्गेविद्या हुतभुग्दयिता तथा ।

  • "तर्पणश्च त्रिधा प्रोक्तं साम्प्रत तच्छृणुष्व मे ।

ततो देव्या: स्नामांते तर्पयामि नमः पद। सोमानिलसंघद्यात् स्खलित यत्परामृतम् ॥ देवाननीऋषींश्चैव तर्पयेत् कुलवारिणा । तेनामृतेन दिव्येन तर्पयेत् परदेवतां । तर्पणादौ प्रयुञ्जीत तृप्यताम् वृद्ध भैरव ॥ मान्तर तर्पण घेतन्मानसं शृणु साम्प्रतम् ॥ तथैव परमेशानि विष्णु रुद्र प्रजापति। आत्मानौं तन्मयम् कृत्वा सदा सन्तर्पितात्मवान् ।। एवं ऋषन् प्रताथ पिटनपि च भैरवान् ॥ . सर्वदा सर्वकार्येषु सन्तुष्ट स्थिरमानसः॥ तृप्यतां सुन्दरी गता पिता भैरव तृप्यताम् । उपविष्टः शुचौ देशे ततस्तषणमारभेत्। आदौ त्रिपुरपूर्वच तर्पणे विनियोजयेत॥" तर्पसिया पुरूनादौ मुलदेवींच तर्पयेत् । . ( गभर्वतन्त्र)