पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३३२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३२८ वर्मन-तककार तमन् ( म' लो० ) तरति द-मनिन । सवैधातुभ्य मनिन् । चारो, हत्याकारो इत्यादि वाम करते है। २१ पाधार, उण ४।११ । यूपान. यस के काठका अनगा भाग। महारा । २२ महादेव । २३ बालित बित्ता । २४ जल के सय (स.पु. ) ऋषिमंद, एक ऋषि का नाम। नोचेको भूमि । २५ वक्ष, छाती। तबंट ( म. ५० ) त ति द्रुत गच्छति तब बाहनकात् सलक (म लो०) तनेम गमो गत्तेन कायति केक। अटम् । १ वत्मा, वर्ष । २ चक्रमर्द, चकवड़, पवार । १ पुष्करिणी, ताल, पोखरा । २ फनविशेष, एक फलका सर्ग (हि.प.) चाबुकका फोता । नाम । तर्राना : हिं० पु.) एक प्रकारका गाना। तराना देग्यो। तलकर ( पु.) १ए प्रकारका कर या लगान। सर्गे हि स्त्रो०) प्रत्ये क ऋतु में होनेवालो एक प्रकार यह कर मुर्शिदाबाद जिले में प्रचलित है। सूखे ताला- को घाम। बोंको जमोनके स्वत्वको तनकर कहते हैं । तष म० पु.) वृष तृष्णःयां भावे पत्र.। १ अभिलाय २ मुर्शिदाबाद जिनेके एक बिलका नाम। रम इच्छा । २ तृष्णा, चाह। ३ लप, बेड़ा। ४ समुद्र । जिलेमें जितने बिल सबमे यहो बिल बडा है। बहरम- ५ मय । पुरमे कई मोन पथिमको पोर जनिसे हो यह बिन तपणामलो ) ष भावे न्य.ट.१ पिपामा, तृष्णा प्यास । २ अभिन्नाप, इच्छा। तलका-१ महिसुर राज्यमें महिसुर जिले के अन्तर्गत तर्षित (म त्रि.) तर्षाऽस्य जातः । तयं तार का इतच। एक तालक । १ टषित प्यास।। २ जाताभिनाष, वाञ्छित, चाहा . २ उक्त तालुकका प्राचीन नगर । या पक्षा० १२११ ____उ० और देशा० ७७२ पू० पर महिसर शहरमे २८ मील सपल (म त्रि.) टष-'उन्लच । तृष्णायुक्त, जिम प्यास दक्षिण-पूर्व में कावेरी नदोके किनारे अवस्थित है। पूर्व लगो हो। ममयों या नगर तल साडू, तरकाड़, तथा तालकाड, तर्थावत् ( म० वि०) सषावत् वेदे पृष। माधुः । तृषित, नाममे भो प्रमित था। लोकमख्या प्राय: ३८५७ है। प्यासा। इम नगरमें कावेरी नदी के एक किनारे बहुतमे शेव- तह न (म' • पु० ) अनिष्ट करना, बुराई करने को क्रिया।। मन्दिर देखे जाते है। उक्त मन्दि का मर्वाश वानसे तर्हि ( म अध्य०) नद हिंन । उम ममय, तव। ढका हुआ है। कारो नदोके दुमरे किनारे जो मन्दिर तल (म.पु.की.) तलति तन-अच । १ अधोभाग, विद्यमान है, उसके विषयमें निम्नलिन्वित दन्तकयाएँ पेंदा, तम्ला। २ पाताल। ३ पृष्ठ रेश, किमो वस्तु का प्रसिद्ध है । किमो समय एक भिक्षु महादेवको अर्चनाके वाहरो फैलाव। ४ मुल देश, वह स्थान जो किमी जिये तलकाडमें पाये हुए थे। यहाँ पा कर वे बड़े हो वस्तु के नीचे पड़ता हो। ५ हथेली। परका तनया। अममञ्जसमें पड़ गये। असंख्य शिवमन्दिर देख कर वे ७ मध्यदेश। ८ स्वरूप, स्वभाव । ८ कानन, जङ्गल। सोचने लगे. कि यदि मन मन्दिग्में पूजा की जाय तो १० गत , गट्टा । ११ ज्याघातवारण, चमडे का बना पूजा के जितने उपकरण उनके पास सञ्चिन है, उसनेसे जो धनुषको डोरोको रगड़म बचन के लिये बाई' बाँहमें कुछ भी नहीं हो मकता, अथवा सब मन्दिरमें पूजा पहना जाता है। १२ घरको छत. पाटन । १३ कार्य किये बिना भो नहीं बनता, क्यों कि यदि वे किसो बोज । १४ थप्पड़, तमाचा । १५ तालहक्ष ताडका पेड़। मन्दिरमें प्रर्चना न करें, तो उस मन्दिरको देवमूत्ति १६ खादिमुष्टि. तलवार इत्यादिका मूठ। १७ मञ्य प्रमन्तुष्ट हो जायगो । ऐसा सोचते सोचत अन्तमें उन्होंने इस हारा तन्त्रीवादन, बाएँ हाथसे बोणा बजानेको मगहीन पर्थ से उरद खरोदा। वे एक एक सरद प्रति- क्रिया। १८ गोधा, गोह। १८ कलाई, पहुँचा । २० मन्दिर में उत्सग करने लगे। किन्तु पाचर्य है कि जब नरकवियष, एक नरकका नाम । सनरको व्यभि- एकनन्दिरमें उपासमा बाको सगी, तब सब उपद