पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३३३

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तलकार तलकोन ३२९ खर्च हो गया । इस पर वह भिक्षुक बहुत ही चिन्तित सलकावेरी-कारो नदोका उत्पत्तिस्थन । यह जुर्ग प्रदेश को पड़े । जिस मृति का पूना न हुई, उन्हें वे नदोके में पश्चिमघाट पर्वतकै ब्रह्मगिरि शमें अना० १२२३ दूमरे किनारे उठा ले गये. इम ख्यालसे कि दूसरी दमरो १० उ० और देशा. ७५३४१.“पू० में अवस्थित है। यहां मूर्तियाँ उन पर अपनी प्रधानता कर न म एक देवमन्दिर है। अनेक हिन्दूयात्रो प्रतिवर्ष यहाँ प्राचीन नलकाड़ नगरको अट्टालिकामें बालूमे ढंको प्रति हैं। कार्तिक अथवा अगहन महोने में मनमाम हुई है। यह बान्न गशि छटे पहाड़ को नाई प्रायः १ पपिनक्षम बहुत से लोग सान करनेको यहां पाते हैं। मोल लम्बी है। प्रतिवर्ष १० फुट के हिमावसे वह बानु म समय कुन प्रत्येक परिवार खान करने के लिये एक गशि बढ़ती जा रही है। उक्त बालुकास्त पमे ३० मन्दिर एक प्रतिनिधि भेजते हैं। प्रतिवर्ष मन्दिरमै गवमंगटका लोप हो गये हैं। उस मन्दिरों से दो के शिखर अब भी प्रायः २३२०, रु. खर्च होता है। दोख पड़ते हैं। किमो कि मी पपलक्षमें कोति'नारा तन्नको (हिं. स्त्री० ) पञ्जाध, अवध बंगाल, मध्यप्रदेश यण के मन्दिाको बाल कागशि कुक कुछ अलग को जाता तथा मन्द्राज में मिलनेवाला एक पेड़का नाम । मका है। हम नगर के प्रायः मभो । बालकाय है। वन काठ लाल और कुछ कुछ भूरा होता है और खेलोके माम अवस्था देखनमे अनुमान करते हैं, कि शेष शमी मामान इत्यादि बनाने तथा मकानों में लगानके काममें शोघ्र हो बालुकाच्छादित हो जायगा। स्थानीय प्राता है। लोगों का कहना है, कि इम नगरको अन्तिम रानीने यह स्थान वाल में परिगत होगा रीमा शाप दे कर कारो तन्नकोट ( स० पु० ) वृक्षविशेष. एक पेउका नाम । मदो में अपनः प्रा-त्याग किया था। तलकोन-मन्द्राज में कड़ापा जिने के अन्तर्गत वायलपाड़ ___ तलकाड़के अधिवायिाम प्र यः मभो हिन्दू है । तालुकका एक मन्दिर, जलप्रपात और उपत्यका। यह १८६८ ई०सक तन्नकाड़ नमोपुर तालुकका प्रधान शहर अक्षा० १३°४०० और देगा० ७०.१४ पृ० के मध्य पान- था। संस्कृत भाषामें तनकाइको दलकन कहते हैं। कोड पहाइपर अवस्थित है। एमके ग्राम पासमें धान दलवनर नामसे भी हम का उल्लं व देखा जाता है। और ईख की खेती होती है। मसूचा पहाड़ घने जङ्गल- तलकार का प्राचीन इतिहाम नहीं लित' और अगर में प्राच्छादित है जिम में कई तररके हरिन और सूपर पिलता भी ह तो २८८ ई० से उक्त ईमें गङ्गव गोय पाये जाते हैं। मन्दिर भो उमों के बीच अवस्थित है। हरिवनि तनका हमें अपनी राजधानो स्थापन को। एक ओर जलप्रपात कलकम्न शब्द करता हुमा बह रहा ६ठो शताब्दी में इस वर्क किमो दूमरे राजाने तलकाड़- है। इसके पाम इ) दो विगाल पाम के दरख्त है जिन्हें का दुर्गादि मस्क र किया । ८वीं शताब्दीके अन्तमें लोग राम और लक्ष्मण नामसे पुकारते हैं। ऊपर जाने- चोल-राजगण यहाँ शामन करते थे। यह शहर पैर को जितनी राहें गई हैं सभी सकोण है और हमेशा वंशीय राजाकि अधीन भी कुछ कान तक था । १०वीं जंगली जानवरोंका डर बना रहता है। जलप्रपात शताब्दोको यहाँ च्यसान बल्लाल वशको राजधानो ७० या ८० फुट नीचे जमीन पर गिरता है। कहते हैं, थो । १६वी शताब्दोमें पुनः गगवंशको जयपताका इस कि इस जलप्रपातमें स्नान करनेमे मभो पाप जाते मगरमें फहरने लगी। शिवममुद्र के पराक्रमसे ही यह रही हैं। स्थान फिरसे गङ्गवंशके हाथ लगा था । किन्तु इस के शिवरात्रिके उपलक्षमें अनेक यात्री दूर दूर देयोंसे तीनसे अधिक राजा तलकाड़में राज्य न कर सके। बाद यहाँ पाते हैं। यात्रियों में विशेष कर स्त्रियों को गख्या यह विजयनगरके किसो करदराजा अधोन पा गया। हो अधिक रहता है। प्रवाद है, कि हम प्रपातमें खान पन्त में १५३४ को मरिसुरके हिन्दूराजाने युद्ध में विजयो हो कर सलाह पर अधिकार कर लिया। १८ce में कर सका मन्दिरमें पूजा करनेमे बन्ध्या स्त्री पुत्रवतो यहाँ म्युनिसपालिटी स्थापित हुई। होती है तथा जिनको कंवल लड़की हो तो है, वे भो Vol Ix.88 ।