पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३४१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बारा-सीह तुपा करती है। इस जातिमें सो रस्म है कि लड़को तरी (फा• मो.) रिकादी। जब बारह तेरह वर्ष की होतो, तब वह किमी धनो यार. तष्ट (.वि.) नक्षत। १ तनुजत, शेला चा। के यहाँ बेटी जातो है, इम रस्मको 'सिर ढकाई' कहते रहिवालत, पीस कर दो दनोंमें किया इपा। ३ ताड़ित, हैं। ल को जब यारकै घरने लोट प्रातो है, तब अपने पोटा हुआ। ४ गुणित, गुण किया हुचा। जात भाईक एक भोज देना पड़ता है। मिस्सो नामको मष्टा ( म० .) १ विश्वकर्मा । २ छोलहाल कर गढ़ने- एक दूमगे रस्म है जिममें ये अपने दोती में निम्नो लगाना वाला। ३ छोलनेवाला। ४ एम पादिस्यका माम। पारम्भ करतो हैं। इसके बाद ननो जिमें वे बनाना त्वष्टा ( फा० पु.) तौबको एक छोटो सतरी। इसका पहने आती हैं, उतार फकतो हैं, इम रिवाजको 'नथन) व्यवहार ठाकर पूजनके समय मूर्तियोको बान कराने उतारन' कहते हैं। आन कल भारतवर्ष के प्रायः सब लिये होता है। जिलों में तवायफ पाई जाती है। कभी कभी ये लोग " तष्टि ( स. स्त्रो०) तक्ष-निच । तजप, दा करनेका काम। महफिलमें जा कर नाचतो गाती हैं। सष्ट, (संपु.) तम-त. पृषोदरा० कलोपे साधुः। १ नवाग (हिं. पु०) जलन, ताप, दाह। सूत्रधर, बढ़। २ विश्वकर्मा । ३ पादित्यभेद, एक समारोख (प्र० स्त्रो०) इतिहाम । मादित्य का नाम । नवालत (प० स्त्रो०) १ दोघं त्व. लम्बाई । २ प्राधिक्य, तम (हि.वि.) संसा, वैसा। अधिकता, अधिकाई। ३ झझट, बखेड़ा । तपकीन (प. सो०) दिलासा, तमझो । तविपुग्ला (मयो. ) विपुना कन्दोभेद, विपुला नाम का समरधान--अफगान-सुर्किस्तानका एक शहर। यह छन्द । चार अक्षरांका तगण होने पर यह छन्द होता है। प्रक्षा. ३६ ४२ ७० पौर देया• ६७ ४१ पू० पर तबियम् ( म०वि०) अत्यन्त वनवान् । ममुद्रपृष्ठमे १४८.५ फुट ऊँचे पर अवस्थित है। यह गहर नविष (स.पु. ) तय-टिषच्। १ स्वर्ग । २ ममुद्र । अपने प्रदेशमें सबसे विस्तृत और ममृद्ध है तथा मध्य ३ वावमाय । ४ शक्ति । ५ स्वर्ग, मोना । (नि.) ६ एशिया और काबुलका बाणिज्य केन्द्र है। इसमें ४००० हए, बुड्डा। ७ महत्, बड़ा। ८ बलवान्, ताकतवर । घर लगते हैं, उजवेग और ताजिकको हो संख्या मबसे तविषी (स्त्री० ) तविष संज्ञायां डोष । १ भूमि, अधिक है। यहाँ प्रायः जितनी मड़ में है, सभी १. या जमीन। २ नदो, दरिया ! ३ देवकन्या। ४ बन्न । १२ फुट चौडो है। तारीफ तो इस बातको है, कि सविषोमत् ( म त्रि.) तविषो अस्थ्यस्य मतप । दीलि. वे सबके मन बिलकुल मोधो चलो गई है, टेढापम की युक, चमक दमक। भी नहीं है। ममुचा शहरमें तमकुरधान नदीसे जल मविषोयु (म त्रि.) तविषोय.उ । बलप्रयोगकारो। जाता है। काफी पानी नहीं मिलने के कारण अच्छी सविषीवत् ( म०वि०) सासमो। जमोन रहते भो उपज बहुत कम होतो है। फस, मेवे तविष्या ( म स्त्रो०) बल, शक्ति, ताकत। पाटि हो अधिक पाये जाते हैं। तव्य-१ वेदान्तभेद । (वि०) तव-यत् । २ शक्तिशालो, तसगर (जि. पु. ) जुम्लाहों के तानेकी एक लकडो जो बलवान्, ताकतवर। नौलकवीके पास रहती है। तगखोस (० स्त्रो०) १ निक्षय, ठहराव । २ रोगका तसदोक (प. स्त्रो०) १ मचाई। २ समर्थन, पुष्टि, निदान । सचाईका निश्चय । ३ साक्ष्य, गवाही। सशरीफ (प• मो०) महत्व. इज्जत, बुजर्गी। तमहक (प० पु०) निछावर, सदका। २ बसिप्रदान, सन्त (फा० पु०) । एक प्रकारका विकला बरतन जिसका कुरबानी। ग्राकार थालोसा होता है। २ परात, लगन । ३. वाखानाम तामीफ (प०सी० ) अन्यको रचना । रहेमानका तबका बहा परतन, गमला। तसबीर (प.श्री.) जयमाला, सुमिरनी। Vol. Ix. 85