पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३४२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३३८ तसमा-तसर तसमा ( फा० पु. ) चमड़े को धज्जो जो कुछ चौड़ो और नर कीड़े यौन मर जाते है। तब मिर्फ पर ही डोरोको प्राकारको नम्बी होती है, चमड़े का चौड़ा। भविषात् तसर-कोटव'शके वंगरक्षक रह जाते है। फोता। इन पण्डोसे १११२ दिन के भोतर छोटे छोटे लट मसर ( म०प०) मोतीति सन सरन् किच्च । । मूत्रष्टिन, मैसे कोड़े निकलते है और पत्तों पर रेंगते फिरते हैं। जलाहीको टरको। २ एक प्रकारका कोड़ा। इम ममय ये कोड़े बड़े हो पेटुक होते हैं। लगातार कमा-कोयेय-मूत्रविशेष, एक सरसका कडा और मोटा '! कोमल पत्तों को खा खा कर जल्दो जल्दो बढ़ते रहते है। रेशम । बङ्गालके अन्तर्गत छोटा नागपुर प्रदेश, बाले. एम ममय ये ३।४ बार खोलो या कलेवर बदलते रहते वर, मय रभन, केवझड़ प्रादि स्थानोम, बांकुड़ा, वोर। है। खोली बदलते समय कुछ देर के लिए ये आहारविहार भ्रम, मेदनीपुर जिले के जङ्गालों में तथा बङ्गालके अन्यान्य छोड़ कर चुपचाप पड़े रहते हैं। इस तरह १०।१५ दिनमें स्था नाम शाल, पियाल, हरोतको, विभोतको आमलको, ये अपनो पूरी बाढ़को पहुंच जाते है । उस समय इनका कुमम, मोन्न, बदगे आदि वृक्षों पर तमार्क कोड़े पानी आकार ३२४ इश्च मे ५।६ इन्च तक होता है। ये कोड़े है। इन्हीं कोड़ोमे तमर पंदा होता है। यह कहना। मटमैले, नोले, पोले, भूरे, नाल अादि नाना रंगोंसे चित्र- फिरल है, कि तमर रेशमका हो एक भेद है। विचित्र होते हैं। इनको आँखें उज्ज्वन और पैर छोटे रेशम देखो। छोटे होते हैं। अपर जिन स्थानों के नाम लिखे गये है, उन प्रदेशों के जङ्गलाम तसर अपने आप को उत्पन्न होता है। अडे फटने के बादमे अब तक इनके शत्र पोंको कमो इमको खेतो भो होती है। समरको खेती रेशम जमा नहीं रहतो। प्रथमतः क्षुद्र अवस्थामै चोटियों इनकी नों है। रेशम उत्पन्न करने के लिए जैसे सतिया परम शत्र, हैं। चोल, कोए पोर अन्यान्य बनचर पक्षी, पत्त खिला कर रेशमकै कोडांको पालते है और यन्त्र गिलहरो, माप प्रादि मौका लगते हो इनको खा जाते पूर्व क उनको घरमें ही रख कर, घरमें ही गुटिका उत्पत्र हैं। इसलिए पालनेवालोको इस समय बड़ो सावधानीसे भारत हैं, तमर के उक्त प्रदेशाम वैसा नहीं करते । चॉई. इनको रक्षा करनी पड़तो है । रक्षकगण तोरधनु, कंकड़ वामा, हजागेवाग. लोहारडागा आदि स्थानों में तसर बाँस आदिसे उक्त जानवरोंको मार कर भगा देते हैं। उत्पादनकारियांका तमरको खेतो मी यत्नसाय नहीं जो लोग इनको रक्षा के लिए नियुक्त होते है, वे है। इनको जङ्गली में प्रापसे आप होनेवाले कोड़ोंको कठोर अनचर्य अवलम्बन कर जङ्गलमें ही रहते हैं। मिफ चिड़ियों और चींटियोंसे बचाने के सिवा और कुछ उनका विश्वास है, कि ऐमा न करनेसे कोड़े मर जाते मा नहीं करना पड़ता। है। अतएव वे जङ्गलमें झोपड़ो बना कर २।३ मास तक तसर की उत्पत्ति -पहलेसे कुछ पके हुये बोज वा कोशों- व्रतपरायण हो गडाचारमे रहते हैं। मल-मूत्र त्यागनेके का मौंग्रह कर रखते हैं और यथासमय उनमें से कोड़े बाद हो ये स्नान करते है और प्रतिदिन हविथान निकलने पर उनको पासके जङ्गग्नमें छोड़ देते हैं। वहां भक्षण कर तृणशय्या पर मोते हैं। जब तक कोड़े पूरो वे अपने अपने जोड़े ठूढ़ लेते हैं। शीघ्र ही मादा बाढको नहीं पहुँचते, तब तक ये स्त्रीपुत्रादिका मुखाव कड़े वृक्ष के पत्तों पर छोटे छोटे चपटे, मरसों जैसे लोकम नहीं करते। इनको और भो एक ऐसा हो प्रगडे देने लगते हैं। ये अण्डे कुछ चिपकने होनसे विश्वास जम गया है, कि रक्षा करते समय बहाँसे यदि 'पत्ते पर खूब चिपट जाते है। एक एक कोड़ा श४ थानका गमन हो, तो कोड़ोंमें उत्पादिका प्रति बढ़ दिनमें २००से २५० तक पण्डे देता है। एक बारगी जातो है। इसीलिए थान गमन करने पर रक्षकगण मब पण्डे दे देने पर इनके जीवन-कार्यका पन्त हो अधिक लाभको पाया करते है। सत्याल, कोन, कुरमो जाता है पर देनेके श४ दिन बाद.जीये मर जाते है। भादि जातिवादी प्रधानता र दा बारनेका काम