पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३६२

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३५८ वाई-ताईका जुझाबसा काम करता है । प्रदारिक रोग तथा शोथ में ताड़में अनेक गुण रानके कारण इसे पवित्र धोंमें भो यह बहुत उपकागे है। दमक फलों के कच्चे अंकुरी- गिनते हैं। कोई कोई इसे ही कल्पद्रुमसा समझते हैं। को पोछनेसे बहतमा नशीला रस निकलता है जिसे ताडो वद्यक मतसे इसके गुण-मधुर, थोतल, पित्त, करते। नाडी देखो। दाह और श्रमनाशक है। एमके रसका गुण-कफ, पित्त, ताडोका पुनटिम फोड़े या धावके लिए अत्यन्त उप. दाह और शोथनाथक तथा मत्तताकारक है। फलका कारो है। ताजा ताडके रसको मैदाम मिला कर थोडी गुण-पक्का ताड़ दुर्जर, मूत्र, तन्द्रा, अभिष्यन्द, एक. पाँच नम उममे जो फन निकलने लगता है, वही पुल- पित्त, रक और कफधिकर होता है। (भावप्रकाश ) टिम है । पके हुए ताडको मज्जा चर्म रोगमै बहुत उप राजवल्लभक मतसे इसके गुण वात, मि, कुष्ठ, तथा कारी है। शरीरका कोई अक्षत होने पर मिहलके रक्त पित्तनाथक, ण, वष्य और स्वादु है। चिकित्सक लेह रोकने के लिये उसके ऊपर ताडको साड़को गरीका गुण-मूत्रकर, मिष्ट, वातपित्तना. पाठीक रेश चिपका देते हैं। शक और गुरु है । ताड़को अस्थिमज्जाका गुण-मधुर. जिम रममे तुरन्त फैन बाहर निकाला है उसे खानसे मूत्रल, शीतल और गुरु है। ताड़के जलका गुण पित्त, मूत्रमाक्ररोग जाता रहता है। यह शोथमें भी बहुत नाशक, शुक्र और स्तन्यहदिकर तथा गुरु है। नतन ताडोका गुण-मदकर, कफ, पित्त, दाह पौर शोथ उपकारी है। । नाशक है, खट्टा हो जानेमे यह वासनाशक और पित्तधि- साडकी गरीके जलसे वमन और वममोट्रेक चला। कर होतो है। ताड़के कोपलका गुण-खादु, तिक्त, होता है। कषाय, मूत्ररोगनाशक, वल, प्राण और शुक्रवद्धिकर है। ताड़के ताजा रमसे बढ़िया गुड ओर चीनो तैयार ताड़को तरुण मज्जाका गुण सारक, लघु, नेमल, वात होती है। चीनी देखो। ताडीको चुभानेमे अरक या और पित्तनाशक है । ताड़को जटाका गुण-रुक्ष और शराब बनतो है। मद्य देखो। क्षयरोगनाशक है। राजवल्लभ ) कष्णताल, तमालका चैतके महीने में इममें फल लगते हैं और वैशावमै पेड़ । १० हिन्ताल । ११ कण्टकताल। फल जो भादौम ख ब पक जाते हैं। एक एक फलमें ताड़क (सं० त्रि. ) ताडकन् । १ प्रहारकारो, ताड़न कमसे कम तीन मौन अाँठो रहती है, छोटे फलमें दो भो करनेवासा । (को०) २ वृहदारकबोज, बधारका बोज । मातो। कञ्चो अवस्थामें फलों के भीतर गरो ताडकजनाल-ताड़का देखो। रहती है जो खनिक योग्य होता है। इस अवस्थामें इसके ताडका ( स० स्त्रो०) १ राक्षसोभेद. एक राक्षसोका भीतर जल रहता है। ज्यों ज्या फन्ल पकता जाता है नाम, इमको उत्पत्तिक सम्बन्ध, कथा है कि सुकेतु त्यो त्यो जल कड़ा होता जाता है। अन्तम उम अोठोंके नामक किमो पराकमशालो यचन सन्तान के लिये ब्रह्माके मध्य गरी होता है जो खनिमें मिष्ट, मुखप्रिय तथा नारि उहशसे कठोर तपस्या को। ब्रह्माने उसको तपस्यासे यलको गरीक सहश इसमें अनेक गुण हैं। सन्तुष्ट हो कर उसे एक वर दिया जिससे उन्हें ताउका पहले हो कहा जा चुका है कि ताड़को लकड़ीसे नामको एक कन्या उत्पन हुई। ब्रह्माके वरसे साड़काको अनेक प्रकारको ग्रहमामग्रो प्रस्तुत होतो है । उसी तरह हजार हाथियोका बल था । यह जन्भनन्दन सुन्दको व्याहो इसका रम भो भोजन इत्यादिके अलावा और दूसरे थो। जब पगस्त्य ऋषिने किमो बात पर हो कर दूसरे कामोंम व्यवत होता है । डिम्बके पानी में ताड़का 'सुन्दको मार डाला, तब यह अपने पुत्र मारीचको ले कर रस डाल कर यदि उसमें शख या सोपका च प मिला गस्त्य ऋषिको खाने दोड़ी। षिके मापसे माता पौर दिया जाय तो सुन्दर पालिश तयार होतो है और मेज पुर्व दोनों घोर राक्षस हो गये। इसी समयसे या राक्षसो पर सका लेप देनेमे यह बहुत चमकने लगता है। मामाजीका तपोवन नाम करने लगी पोर से उन्होंने