पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३६७

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पिजरके बाहर प्रभूत परिमाणसे ताहितमा मंचय होने परिचालवावी भीतर जो तापितकी क्रिया प्रकट महों पर भो उस हलके पदार्थ पर वा तडिहोक्षणयन्च पर होतो, ठीक उसी धर्मके फलसे ऐसा होता है, यह गणित- उसका जग भी प्रभाव नहीं पड़ता। मायकेल फारादेन शाखको सहायतासे प्रमाधित हो सकता है। किमो एक बड़े भारी काठके अकसको बागेक रांगेको पत्तियोंसे निर्दिष्ट पाकारके धातुमय पदार्थक उपरिभागके किमो जड़ कर यन्त्रके जरिये उसमें प्रभूत ताडितका मञ्चय किया पंश पर ताडित जमनसे भोतरमें ताड़ितको क्रिया प्रकट पौर स्वयं तड़िहोचणादि ले कर उसके भीतर घुस गये। नहीं होती, रसको गपितको सहायतासे गणना हो बकसके बाहरसे बड़े अम्निस्फुलिङ्ग पधर उधरका मकती है। गणितप्रयोग वर्तमान निबन्धसे बहिभूत है। विक्षिल हो रहे थे, किन्तु बकसके भीतर उन्हें कुछ भी परिचालक और अपरिचालहमें प्रभेद ।-परिचालक के माल मन हा। भोतर बिजलो बलप्रयोग नहीं करतो; पर परिचालकके ___ गणितशास्त्रानुसार देखा जाता है, कि जिम प्रदेशमें भीतर बिजलोका बल प्रयुक्त होता है। दो ताड़ितयुत्ता ताड़ितको कोई क्रिया नहीं है, वहाँ ताडितका अस्तित्व पदार्थ वारक मध्य रसनेसे दोनों में या तो पाकर्षगा या भो नहीं है। धातुद्रश्य के भीतर जैसे बिजलोको क्रिया विकर्षण होत देखा जाता है। दोमसे एकको पिंजरे नहीं होतो, उसी तरह उसके भीतर बिजलो भो मञ्चित ! या बकसमें भर देनसे फिर पाकर्षण वा विकष प कुछ नहीं रहतो। ठोस या पोलो कसो भो क्यों न हो, किसो भी उस बकसको धातको भेद कर नहीं जाता । पिंजरा भो धातुको चोजमें बिजलो सश्चित करनेसे समस्त साड़ित वा बकस मानो मिही छ कर रहता है। ऐसी हालतमें वा बिजली उसके अपर पा जातो है। उनके भीतर जरा भोतरको बिजलो और बाहरको बिजली परस्पर सम्पण भी नहीं रह जातो। किसी ताड़ित वशिष्ट द्रव्यको बकस प्रथक पौर स्वाधीनभावमे रहतो है। परिचालक पदार्थ या पिजरे जैसे पोले धातुमय पदार्थ के भीतर घुमेड़ देने ताडितबलक मन्चालनमें असमर्थ है, किन्तु अपरिचालक से स्पर्श मात्रसे समय ताडित उस बकस या पिंजरेके पटा इसमें पट है। दोनोका यह प्रभेद इस प्रकारसे अपर पा जाता है। उस समय उस दृश्यको निकाल कर कुछ कुछ समझा जा सकता है। रस्पात काँच, महो, तडिद्यीक्षणहारा उमको परोक्षा करनसे मालम होगा पत्थर, रबर आदि कठिन योको खींचा, सोडा पोर टेढ़ा कि, उसमें जरा भो बिजलो नहीं रहो है। किया जा सकता है, किन्तु जल, तेल, गुड, कोचड़ ___एक पिजरे या लोह के जाल के भीतर रहनेसे बजा- घातको कुछ प्राशङ्का नहीं रहती। इत्यादि तरल द्रव्योको इस तरह खोचा, तोड़ा और टेढ़ा अपरिचालक पदार्थ के भीतर सर्वत्र ताडितक्रियाकी नहीं किया जा सकता। काँपको दोनों हाथासे पकड स्फति होतो है तथा उसके ऊपर और भोतर सर्वत्र हो कर स्खोंचा जा सकता है, काँच उस खोचमें यथेष्ट ताडित सञ्चित हो सकता है। बाधा पहुंचाता है। थोडासा कोचड ले कर खो चमेसे परिचालक पदार्थ में सिवा अपरके पन्यत्र कहीं भी कोचड़ इतनी कम वाधा पहुँचाता है कि, खींचन हो बिजली नहीं रहतो । पोर जपर भो सर्वत्र समान परि महौं पड़ती। जल इससे भी ज्यादा है। बिज़लोके लिए मागमे नहीं रहतो। एक लोहे के गोले पर सर्वत्र समान अपरिचालक पदार्थ कठिन द्रव्य के समान है और परि- भावसे बिजली मौजूद रहतो है। किन्तु धातुमय द्रव्यका चालक पदार्थ जल वा कीचड़के समान । पपरिचालक- उपरिभाग ऊँचा नीचा होने पर सब जगह समान के भीतर बिजलोको खोंचन पड़तो है पौर धका भो बिजली नहीं होती। जो जमीन जितनी ऊँचो होगी. लगता, परिचालकक भीतर म तो खो चन पड़तो वहाँ उतनी ही ज्यादा बिजलो ठहरेगी चौर मोचीजमीन पौरन का ही लगता है। कठिन महीका परिभाग पर उतनी ही काम। इस प्रकार जरी जहां नोकसौ] ऊँचा नीचा वा असमान हो सकता है, किन्तु सरल निकासी रहेगो वहां वहां बिजली का ज्यादा जमती जलका उपरिभाग समतल ही होता है, ऊँचा नोचा पन्धन उससे कुछ कम करतो । महो । जसके भीतर यवसामान्य दाबको कमोवेशो होते