पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३७१

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होगी और ऋण-ताड़ितके जितने पासमें जागोगे उडति पृथिवोको उहतिको जरा भो पति-वधि नहीं होती। उतनो ही कम होगी। धन अधिक उड,तियुक्त स्थानसे इसोलिए किमी साहितयुता द्रष्यका भूमिसे स्पर्श होने दूर जानकी और ऋण उसमे विपरीत दिशाको जानेको पर उमको प्रायः तमाम विलो पृथिवोम चलो जाता चेष्टा करता है। धन जब एक तरफ चले, तो समझना है; पृथिवीके हिस्से में प्रायः सब पड़ता है । परन्तु तो भी चाहिये कि ऋण भी विपरीत दिशाको जा रहा है पृथिवीको उपासिका जरा भी व्यतिक्रम नहीं होता। अपरिचालक प्रदेशमें उस तिको कमोबेशो हो सकती है, महासागर में जितना हो पानो गिरता है और कितना ही क्यों कि परिचालकके भीतरसे बिजली महजमें जा नहीं निकलता है, पर तो भी उसमें कुछ घटतो बढ़ती नहीं सकतो। परिचालकके भोतर उहति सर्वत्र समान होतो होतो, उमको मर्यादा ममाम हो रहती है, इसका है, क्योंकि वो धन और ऋण बिना वाधाके चल फिर हिसाब भी प्रायः वसा की है। कर उड तिको समान कर लेते हैं। मर्वत्र उह तिको पृथियोको उहानिको महज डास वृद्धि नहीं होतो, समान करते समय धन-ताडितको गति ऋगको तरफ मोलिए पन्यान्य ताड़ितयुक्त पदाथाको उद्दतिको धिवी. अथवा ऋणको गति धनको नरफ होतो है। फन्न स्वरूप के साथ मिला कर परिमाया निर्णय करमेको प्रथा दोनीका सम्मिलन वा योग होता है, अर्थात् कुछ धन है। पर्वतको उच्चता नापनो हो तो वह मागरपृष्ठसे और उसनेहो ऋणका तिरोभाव होता है। कितना ऊँचा है, और समुद्रको गभोरता मापनी हो तो ताड़ित प्रहणकी क्षमता । साधारणतः दो धातुः वह कितना नोचा है. यही देखा जाता है, मी तरह द्रव्योंको ताड़तयुक्त करके दोनोको छुपा देनेमे मम्पण किमो स्थानमें ताडितको उहतिका निखय करने के लिए ताडितको दोनों बॉट लेते हैं । तात्पर्य यह है, कि जो बड़ा वह पृथिवासे कितनी ज्यादा वा कम है, रमो बातका होता है, उसमें हो ताडितका अंश अधिक पड़ता है। निर्णय किया जाता है। द्रव्यके आयतन और पाकारको देख कर किम हिम्म में पानो जैसे ऊंचेसे अपने पाप नोचेको जाता है, कितना पड़ेगा, इसको गणना को जा सकता है। ताप जिस तर गरम जगहमे शोतल स्थानको जाता विसी द्रव्यम कुछ धन-ताड़ित देने पर उसको उद्धति है, धनता डे.न भी उसो तरह जहाँ उड़,ति ज्यादा है, जरूर पड़ती है ; ताड़ित जितना ज्यादा दिया जायगा, वहाँसे जहाँ कम हो, वहाँ जाना चाहता है। इसलिए उद्दति उतनी ही बढ़ जायगो । चोर छोटो वस्तु में जरासी किसी जगह ताडित सश्चित करना हो, तो उदधति जितनी बिजलो देखनसे जितनी उद्धति पड़ती है. एक बड़ा वस्तुमें कम हो, उतना ही सुभोता है।. पातोको जेसे ऊँचो उतनी देनसे उछ नि उतनो नहीं पड़ती। एक थालीमें जगहमें न रख कर नौचो जगहमें रखनसे सुभोना पड़ता और एक म्लाममें ममान जल ढालनेमे, ग्लासके पानाम है, गिरनेका सर नहीं रहता इसे भो कुछ कुछ वैसा ही उच्चता और वाष्य जितनी होती है, उतनो थालोकं मम । मौलिए ऐसे स्थानमें और ऐसे उपायसे धन पानी में नहीं होती, ऐसा हो इसका हिसाब है। साडित मश्चित कर रखना चाहिये कि, जहाँ जति खूब पातति और परिमाण माल म रहने पर, किसना बिज- ज्यादा न हो । अन्यथा ताडितके निकल जानेकी पाचन खोसे वितनो उति बढ़ती है, यह कहा जा सकता है। रहेगी। दो चोजोंको कुभा देनेसे जिममें उहति अधिक है, लीडेन-जार ।-एक टीनको चहर पर कुछ धन-ताडित वहाँसे जिसमें कम है, उसमें थोड़ासा धन-साड़ित चला। मशित कररिका । और एक टोनको चहरको अमोनसे जाता है। इसलिए समग्र ताड़ित दोनों चीजोंमें बँट जाने लगा कर उमके सामने समान्तराल करके रक्खो । पर दोनीको उदधति समान हो जाता है। इस चहरको जो पीठ पहलो चहरके सामने है, उस पीठ पन्यान्य द्रव्योंकी तुलना में प्रथिवोका पाकार बसना पर ऋष-ताडित संक्रमणवशतः पाविभूत होता है। वड़ा बिपन्य द्रव्योंसे पथियो ताहित जाने बाम पाली बहरमें जितना धन होगा, इसमें उतना ही भूण