पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४०८

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५०४ तान्त्रिकी-ताप १ सम्बयानवेत्ता, जो तन्त्र-शास्त्र जानता हो। मारगा. के मनेषण, विषण अवस्थान्तर वा रूपान्तर-प्रात्रि मोहन, उच्चाटन पादिका प्रयोग करनेवाला। ४ तन्त्र प्रादि क्रियानों का एक प्रधानतम माधक है। सम्बन्धी । (पु.) ५ मविपात-रोगविशेष, एक प्रकारका रोमो कोई गमायनिक क्रिया नहीं. जिसमें मापका सविपात, जिम मनिपातमें प्रत्यन्त उँचाई पौर उममे विनियोग, उद्भय या लोप नहीं होता हो। इसके मुल- अधिक प्याम लगता हो, अतिसार, अत्यन्त खास, कास, तत्व और यथायोग्य विनियोग प्रणालीको भन्नोभांति जाम गात्र वेदना हो शरीर अधिक गरम और गला सूख जाता लेनेसे म'सारमें से कड़ी पडत और महोपकागे कार्योंका हो, नाकका अगला भाग शोतम हो जाता हो, जोभमें मम्पादन किया जा सकता है। बाप्पोय-गकाट, वाष्पोय काली पड़ जाती हो, थकावट माग्न म पड़ती हो तथा यान ( रेल, जहाज) और तापमानयन्त्र आदि इमी के अषगा-शक्तिका डास मोर दार उत्पन्न होता हो उमे निदर्शन स्वरूप है। क्या प्राणि राज्य और क्या जड़-राज्य सान्त्रिक सविपात कहते हैं। तापको महोपकारिता मर्वत्र हो विशेषतामे देखने में तान्त्रिको (स. स्त्री० ) तान्त्रिक डोप । १ तन्त्र- पाती है। मम्बन्धौया। अतिप्रमाणक धर्म दो प्रकारका है, वैदिक सापके न होने से प्राणियों पोर उद्भिजोंका जन्म, परि- और तान्त्रिक । तन्त्र देखा। थईन और पचन कुछ भी न होता। ताप विशेष उप तान्दम (सं .) वायु, हवा। कारो है, किन्तु इमका लक्षण क्या है ? ताप अदृश्य है; सान्दुर ( स० लो०) तन्दुरेण पाकयन्त्रभेदेन मित्त प्रदोपको जलता देव कर यह नहीं कहा जा मका कि पण । तन्दुरपका-मामभेद, अनारसे परिपूर्ण गडढे वह उत्तम है। ताप भारविहान है : रिमो वस्तुका में अलग अलग राज मोससे आच्छादन कर उसे तन्दुर. शीतकाम्नमें जितना भार है. ग्रामकानमें भी उपना हो यन्त्र-शाम पास करनेमे तान्दुर माम प्रस्तुत होता है। भार रहता है। ताप हारा भारमें कछ भो परिवत न ताम्व ( स० पु०) सन्बा: प्राणाधिष्ठितत्वात् पाणवत्या नहीं होता। फिर भी को मत्ताको उपलब्धि होतो अयं पज, संज्ञा पूर्व कविघनित्यत्वात् वेदे न गुणः। है। वह मत्ता स्पण ग्राह्य ओर एक्रमानुमेय है। ताप १तमुज, पुत्र, घटा। २ ऋषिमंद, तनु नामक ऋषिके जब किमो पदार्थ मे मकामत होता है, तब पदार्थ वंशज । तनु दशा पवित्रवस्त्र तस्य दं प्रगा । ३ दशा. उमे शोषण करता है और उसे 3 का अवस्थान्तर या पवित्र चल सम्बन्धो स्वार्थे प्रण । ४ दशावस्त्र । रुपान्तर होता है। उम मम तापका क्रम देखा जा ताम्वङ्ग ( पु.) सन्वङ्ग ऋषिके वशन। सकता है और उमो समय विस्तारण, तरनाकरण और साब (स.पु०) तप-वज।१ क्लयजनक उष्णादि स्पर्श वाष्योकरगा प्रभृति रियायोको उपलब्धि होती है। जन्य सन्साप । २ कच्छ, दुःख । २ उष्णता, पाँच, लपट । ताप समस्त पदार्थो अल्प वा अधिक मात्रामें वत. ४ व्यर, बुखार। ५ यातना, मानसिक कष्ट, हदयका मान रहता है। यति कि तुषारपिण्ड जो अत्यन्त दुःख । पाध्यात्मिक, पाधिदैविक और प्राधिभो तक शीतल है उममें भो ताप है। कारण तापमानयन्त्र दुःख । दुःख देगे। धारा यह निर्धारित हो चुका है कि शोसप्रधान देशोका m (Heat)-प्रति-कार्य में मामञ्जस्य स्थापन के लिए तुषार ग्रोमकालमें जितना रहता है, शोतकालमें उसकी विशेष उपयोगी एक प्राकतिक गति, जिसका प्रभाव अपेक्षा अधिक शीतल हो जाता है। पदार्थोक पिघलने, भाष बनने चादि व्यापारों में पड़ता है, तापको गति मौधो रेखाके रूपमें और पालोकको उष्णता, गरमी, तेज। इसके द्वारा पन्धिी तुफान पादि तरह एक वस्तुसे दूसरो वस्तमें प्रतिफलित एवं सका- कड़ीपाश्चर्यजनक मयामक घटनाएं होती है। स- मित तो है। कोई कोई पदार्थ इसे प्रात्मसात् वा के होनमे विशेष परीक्षाकै हारा रसायनशास्त्रकी शोषित करते हैं, किसो किसी बात-बारा यह प्रतिफलित बालोषणा नहीं की जा सकती। पधार्थ में ताप, पदार्थी ! भो होता है और किसी किसो वसहारा परिचालित प्रसा