पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४०९

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रित और विकारित होता है। सभी स्थानों में ताप प्रत्यन से नापको प्रसारण सापादि विधाएँ लजित कर 'प्राध पोर परिमय है। कई पदार्थ तापका गोषण करते सक्रतो है। है, किन्तु उत्तन नहीं होते अथवा उनका उत्तप्त होना २-ताप अणों के कम्पनसे उत्पन होता है। जिस देखने में नहीं पाता। ऐसे स्थलों में तार गूढ़, अनिन्द्रिय ममय किसो पदार्थ के समस्त पए कम्बित होती प्राध वा अनुमित ग्राहा कहलाता है। उस समय उसे स्पर्श करनेसे वह कम्पन हमारी नसों में प्रतएव ताप दो प्रकारका है-प्रत्यक्षग्राहा ( Sen. भाकर प्राचात करतो है पोर इमोसे हमें उण-स्वर्णानुभव sible.) पोर अनुमितग्राद्य ( latent ) होता है : वह कम्पन सिके शव पणों में हो पाखाम • तापका लक्षण-जिस के किसी वस्तु में रहने से वह वस्तु करता हो, ऐसा नहों, वह ममस्त पणुपोंके प्रवान्तर उष्ण माल म पड़े, उसोका नाम ताप है। प्रदेशस्थित स्थरमें भी विद्यमान रहती है। यहो (शेषोत) - तापकी प्रकृति (Nature of heat) - अनिक विज्ञान मत इम समय विशेष युक्तिमजत प्रतीत होता है। विद विहान् म विषयमें नाना प्रकार के मत प्रकाशित कारण रस समारमें जो कुछ पदार्थ दृष्टिगोचर होते है, कर गये है, किन्तु उन सबमें एक भो भर्वाङ्ग सुन्दर रूपसे यथार्थ में वे मभो अनच्छित गतिमोल है। .. गृहीत नहीं हो सका। किन्तु यह स्थिर है कि ताप. वस्तुतः यथार्थ स्थिति किमो को भो.नहीं भालोक ओर तड़ित, ये तोनों एक पदार्थ है-एको स्थितियोल है, ऐमा किमोके विषय में नहीं करना पदार्थ के रूपान्तर मात्र। सकता। तो भो वह गति किसो किसो खलमें प्रत्यक्ष इन तीनोंका उपादान पदार्थ इथर (Pther) है जो और किसो किमो स्थलमै अनुमित होती है। वह गति प्रणपोंके परस्पर अवान्तर प्रदेशमें परियाल हो कर अव. भी बलका अन्यका मात्र है। वही बन फिर पात्मगत स्थान करता है। वा पन्थन्लभ्य हो सकता है। कुछ भी हो, म गति वा प्राचीन विद्वानों का कहना है कि, जिसका उष्णस्पर्श बलमे ताप उत्पन होता है । पदार्था के परस्पर समापसे है, उसका नाम तेज है। पुरातन य रोपोय विहान् इमे तापकी उत्पत्ति होतो है। जिन पास वह पदार्थ एक प्रकारका अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ ममझते थे, किन्त बमा है, उनके चलने वा परस्पर सहप गरेतापकी नये विद्वानों का मत है कि ताप काई खतन्त्र वा भिव उत्पत्ति होता है। प्राघात करनसे वस्तु में रखताया पदार्थ नहीं है। जाती है। अत: जितना अधिक बल प्रयोग किया जायगा, उन्होंने प्रमाणित किया है कि जडात्मक अणुपोंका उतना ही अधिक ताप उत्पन होगा। बान्धीव भकट कम्पन हो ताप है। उनके मतसे जड पदार्थोके परमाणु या वाष्पोय यान इसके निदर्शनस्वरूप है। वही समुह थर या प्रकाश नामक एक प्रकार के विश्वव्याय) ताप अवस्थान्तरको प्राप्त होता है, अर्थात् बब उसे पुनः सूक्ष्म पदार्थ से परिवेष्ठित है, उन्हों के प्रान्दोलनसे ( जड़ किसो प्रकारको गतिममुत्पादनमें प्रवत्त किया जाता है, दृव्योंके समस्त पण पान्दोलित होनेसे) ताप उत्पब तब वह तिरोहित हो जाता है। होता है। तापके उत्पत्ति स्थान (Sources of heat)-यहां कुछ भी हो, तापके विषयमें यही दो प्रधान मत तापके उत्पत्ति स्थानका वर्णन किया जाता है। जितने प्रचलित हैं, जिनमें शेषोत मत हो सर्वत्र परिग्रहीत तापप्रभव पदार्थ है, उनमें सूर्य एक प्रधानतम है। सूर्यका ताप पृथ्वो पर पड़ता है एवं उसके सम्म कार्य १-ताप एक सूक्ष्मतम तरल पदार्थ इथर (Ether) बहा दिखाई देते हैं। ग्रीष्मकाल में अधिक तापका अनु. है। यह सब जगह और समस्त वखयोंके सहयोग भव होता है, उस समय उशिजीको परिवधनादि साप- पस्याग करने एवं प्रयोजनवय पुनः उन सबसे पसग क्रियाए लक्षित होता है। साप एयो पर पतित होकर होजनिम समापस प्रकार सहयोग चोर विदिपनीको सत्ता करता मोके पास पायल Vol. Ix. 102