पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४१२

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(apparont )| लिमो भो तापक्रमयन्त्रके वतु साकार होता है। कारण म में जन्न गाढतम प्रति संको भागमें साप देनेमे पारा न चढ़ने लगेगा ; जिसना/ चनको चरम सोमाको प्राप्त होता है। फिर चाहे चढ़ना देखेंगे, उतना 3मका प्रत्यक्ष प्रसरण है । कारण उमे उत्तप्त करें या शोसन, या प्रमारित ही तापसे पारद जिम तरह प्रमारित हवा, उसी तरह वर्त.. होगा । जन्तमें यदि यह वैपरात्य न होता, तो नाकार भाग भा इयत् प्रसारित हुवा , इसलिए वतु ला. शातप्रधान देशों में, शीतकालमें जो नद नदी कार भागम प्रब पारद की पूर्वापेक्षा अधिक स्थान पूर्ण हुद आदि तुषाराहत रहते हैं, उन सब तलेका जन्न जब करना पड़ा, किन्तु लाकार भाग अप तक बरफ न हो जाता तब तक जपरक जलका बरफ वम्याम हो रहता सा पारद नन के और भी अपा चढ़तः होना असम्भव होता। तलस्थ जलके बरफ हो जानसे और वहो पारदका यथार्थ प्रमाण कहता। दम तार कोई जलचर हो जोवित न रहता । किन्तु ४श में जल तान्न पदार्थ कि मी पामें क्या न रह, तापमे तरन गाढ़तम हनिमे बरफ, जिमका तापक्रम 'श है। जन्नको पदार्थ के माध उम पात्रका भो कुछ प्रमरण होता है। अपेक्षा लघु होनकै कारण उसके ऊपर तैरता रहता है अतएव तरल पदाकि प्रमरणम हम लोग कंवल प्रत्यक्ष और बरफ अपरिचालक है, इसके ऊपर रहनेसे बाहरका प्रसरण हो देख पाते हैं। शोस निम्नस्थ जल में प्रवेश नहीं करता। उम जलका तरल पदार्थाका पसरण समस्त पदों : प्रमरणको तापक्रम ४.शरस्ता है और उसो जल में मत्स्य एवं अपेक्षा पल्प नियमानुयायो है : तापक्रम जितना हो अन्यान्य जलचर जोवन धारण करते हैं। वाष्याभाव बिन्दु समोपवर्तो होता है, उतना हो उसके वाष्पीय पदार्थों का प्रसरण अन्य पदार्थों के प्रमरणको नियमका व्यतिक्रम भी बढ़न लगता है। . अपेक्षा अधिक नियमाभ्यायो है और समस्त वाष्योय धन और तरल उभय प्रकार के कितने ही पदार्था में पदामि प्रायः ममभावसे होता है। यह प्रसरण तरल प्रसरण-नियमका वैपगत्य लक्षित होता है । गन्धक और पदार्थों के प्रमरणको अपेक्षा १२ गुण अधिक होता है। किमो किसो मिश्रधातु के गलानम वर घनीभूत होने वास्पोय पदाथाँके प्रसर गसे मानव-जोवनको सैकड़ों लाभ ममा मङ्क चित न हो कर सरित होता है। जिस पहुंचते हैं। केवल मानव जीवन हो क्या, ऐसा कोई धातुमे छापने के अक्षर जनते हैं, मांवेमं ढालनके बाद जोवन हो नहीं जो इसके प्रभावसे नष्ट नहीं होता हो। शोसल होते समय वह अल्प प्रमारित हो कर अक्षरका जिमके अभावसे हम मुहत मात्र भो जा नहीं सकते, अग्रभाग सुस्पष्ट रूपमे विभिन्न कर देती है। उम वायुसे पाच्छन रहने पर भी हम उसके ही प्रभावसे सापके घश लिख कर प्रकाश करने हों तो उनकी मंख्याक दाहनी ओर कुछ अपरमें एक छोटी बिन्दो लगा मर जाते । नम जो वायु नि:श्वास द्वारा त्याग करते है. देनी चाहिए। और शतांशिक, फारेनहोट अथवा रिमर वह यदि प्रमरण गुणके कारण साक्षणात् अ गति म जिम प्रणालोके अंश ही. उसके नाम का प्रादि अक्षर होतो पोर उसके बदले यदि परिष्कार वायु न पाते, वही लिखना चाहिये ; जैसे २७ श, ६. फा. १२.रि अर्थात परित्यक्त वायु हमें फिर ग्रहण करनी पड़ती, तो उसके शाशिकके २७, फारेनहोठक ६० और रिउमरके १२ हारा हमारे जीवनका संहार हो जाता। मृदु मम्मयानिल अंश । शून्यमे नोचेका कोई अंश हो तो ऋण-चिन देना वायुसे ले कर प्रचण्ड तूफान तक, मभो वायुगतियोंका चाहिए; जैसे-१५. श. अर्थात् शतांशिक तापमानके यही एक मात्र कारण है। इसके मिवा इस वायुगतिके शून्यसे १५ अश नोचे। महोनेसे मेघ जहां उठते, वहीं प्रर्थात् समुद्रके अपर ही तरल पदार्थामें जल हो इसका उदाहरण स्थल है। रह जाती, पृथ्वोके प्राय: समस्त देशोंमें अनावृष्टि होतो, मताशिक तापक्रमके ४० पंश पर्यन्त जल शोतसे सकु. षिकार्य न चलता, रत्यादि अशेष-विध प्रमगन होते। चित होता है। किन्तु जलका सापनाम इसके नोचे , किन्तु तापके प्रसरण-बलसे पूर्वो किसो भो प्रकारक जिमना- कम होना जाता है, उतना ही जल प्रसारित । पास नहीं होते।