पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४१६

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ताएं ४१२ वृद्धि नहीं होगी। और भी देखा जाता है कि द्रव गाण जल भी रसो कारणमे शुद्ध है। अधिकांग विवड अस कठिन द्रव्य और उनमे उत्पन्न द्रय द्रव्योकी उष्णता जिम प्रस्तुत करने के लिये जानाशादिका जन्म ले कर उमे तरह बिन्नकुन अभिव है, बालते हुए ट्रव्य और उनमें उत्ताप हाग वाष्य बनाते है और उस वाधको घनीभूत उत्पत्र वाष्पको उष्णता भा ठोक उमी तरह ममान है। करके पुनः जल बनाया जाना है। इस तरह जो जम्मा विशुद्ध जल २१२ फा उषा हनिमे उबल उठता है एवं सैय्यार होता है, उसे सापका जन्न करते है। एक बार ग्वोन्न उठन पर भो जितना उत्ताप दिया जाय, द्रव द्रव्य के अपरो भागसे मयंदा ही वाष्य उस्थित उमर्क हाग उमणताको कुछ भी वृद्धि नहीं होती। और हवा करता है। यह सभी जानते हैं कि, नदी जद मरो- नवोन्नने जलमे जो वाष्प उत्पन होता है उमको उपणता वगदिके पृष्ठ देशसे नित्य हो वाष्य उस्थित होता है । दात्र भो ठोक २१२फा रहती है। अतएव यहाँ प्रत'त को न्य,नाधिकलामे वायुनिःसरण में भी न्य नाधिका हवा होता है कि कठिन द्रव्य के ट्रव होते ममय जिम तरह करता है । जलादिके जपर वाष्प राशि का दबाव जितमा किञ्चित् परिमाणमें सेम अप्रत्यक्ष रहता है. समी तरह अल्प होता है, उतना ही वाय निःमाग अधिक हवा द्रव द्रष्यके वाम्य होते ममय भो तेजका कियदंश प्रच्छन्न करता है। वाय-निष्काशन-यन्त्रमें किश्चित् इयर नामक रह जाता है। जिम परिमाणमें ताप देनसे १ दगड में तरल द्रव्य रख कर वायु-निष्काशन करनेमे वापरतमी तुषारपिम जल खोल उठता है, उमो परिमाणमें फिर जोरमे निकलने लगता है कि फिर वह शीघ्र ही उबन्न ५६ दगड काल उत्तम न होनसे वह वाष्य नहीं होता, उठता है। फलतः वाप-परिणामयोन ट्रय द्रव्यमान को अर्थात् हिम जलको ३२ फारनहोटर्स २१२ फा प्रमाण वायुविहीन स्थल में पहुंचते हो उमो ममय वास्वरूप उषा करने में जितन सापका प्रयोग करना पडता है. परिणत हो जाता है। नोन, इथर आदि शौत्र वाष्य-परिणामशील का प्रमाण उपा अम्लको वामें परिणत करनेके लिये उमको अपेक्षा ५४ गुणा अधिक ताप प्रयोग कनिकी वस्तुषोंक स्पा से शरोर शीतन होता है। इसका कारण आवश्यकता होती है। अतएव जलीय वाष्पके अप्रत्यक्ष यही है कि ये वस्तुएँ वाष्प होते ममय शरोरसे तेज गूढ़ तापका परिमाण प्राय: १८० ५४८ ८७२ फा ग्रहण करती है। दृष्टि के बाद वायु शीतल हो जातो है. क्योंकि वर्षाके समस्त जन्नकण भूमि और वायुमे तेजले हुआ। • श एक सेर जलक माथ १०० श एक सैर कर वाष्य होते है । ग्रोप्मऋतु सुराहीमें जन्न रखनमे जल मिश्रित करनसे ५० प्रमाण उष्णा दो से जल वह माधारण जन्न को अपना अधिक शोतन हो जाता प्रस्तुत होता है किन्तु १०० श एक सेर जलीय वायको है। इसका कारण यहां है कि जलकण सुराहोके छिद्रोंमें गौतन्न जलके मध्यस्थित किसो नल के द्वारा परिचालित प्रवेश करते हैं और बाहर निकल कर वाष्य-रूपमें परि- कर १०. एक मर जल उत्पादन करने में इतना तेज गत होते ममय भोतरके जलमे तंज खोच लेते हैं। सो निकलता है कि उसके हाग ५४ मेर जलशमे १०० लिए जल शोतल हो जाता है। मुगहोका जल वामें तक उष्ण होता है। सतगं जलोय वा अप्रत्यक्ष रखनसे और भी अधिक शोसल होता है । धनाढ्य व्यक्तियो. जि परिमागा हवा १०.५४-५४० शया ५७२ फा। के मकानों में पंखा पोर पानीसे भोगो हुई खमग्यसके और भी देखा जाता है कि जन्न के वाप, होने पर जो संज पन्ताहत होता है, वही सज जलीय वाष्पके धनो- समय जल-विन्दयों द्वारा तेज ग्रहण किया जाना हो है। द्वारा जो तराबट को जातो है, उनका कारण वाप होते भूत हो कर अन्न होने में पुनः प्रकाशित होता है। ताप.चालन-परिचालन, परिवाहन और विकिरण ..जो द्रव्य जल में द्रवीभूत. हो कर रहते हैं, जलके ___तोन प्रकार से एक स्थानका ताप दूसरे स्थानमें लाया बफ या वाष्य होने पर उन सबको नियुक्ति हो जातो जा सकता है। इस बातको तो सभी जानते है कि लोहे के है। बर्फ के द्रव या वाष्पके घनाभूत होनसे जो डाई का एक किनारा पागमें रखनसे क्रमश: दूसरा जल पक्षोता है, वह रसोलिये विशुद्ध है। कृष्टिना किनारा भौत हो उठता है।