पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४२५

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तापमान एक शून्यबिन्दु, दूमगे रेखाके पास १०० एकसौका पा इन तीनों प्रकार के तापमान-यन्त्रों को दो तामें घटबद- लिखा जाता है। नलोके अपर अङ्क लिखने के लिए उसे की जा सकती है और घनीभाव-विन्दु उसके मध्यस्थल में मोम लगा कर चारों पोरमे ठक दो । इसके बाद प्रथम कभी १ के भेदसे और कभी ५के भेदसे परित किया रेखासे हितोय अर्थात् अन्तिम रेखा तक ठोक जगह पर जाता है तथा तापांश प्रकाश करते समय परस्परके को- सुईसे अङ्क दे कर सारो नलो हाइड्रोपारिक (Ilydro- के जपर एक बिन्द, दिया जाता है। जैसे गलण्ड में fluoric) एसिद ( तेजाब ) में डुबाओ। कुछ देर बाद ग्रीष्मकालका तापक्रम ३५ । निकाल कर मोम पोंछ देने पर देखा जायगा कि { उस फारेनहोट तापमान के साथ सेलसियस वा रिउमर तेजाबके साथ, कॉचका एक विशेष गुण होने के कारण, तापमानको तुलना किंवा सेलसियम या रिउमर तापमान उसके सहयोगसे ) कांचके सभी अङ्कित स्थानों में क्षत हो के माथ फारेनहोटको तुलना करनी हो तो इस प्रकार गये हैं। उपरोक्त नलोका व लाकार भाग नोचेको भोग करनी चाहिये :- रखनसे श न्यके ऊपर एकके बाद एक अङ्क तापको क्रमश: (फारेनहोट फ, मेलमियस स, रिउमर र) नोभाव- उबतिका बोध कराते हैं; सुतरां उपरोक्त रेखाकि विन्द से वायीभाव तक फ १८०, म १०० और र ८० बोचको किसो रेखाके अपरको रेखा अपेक्षाकृत अधिक अंशोंमें विभक्त हैं। सुतरा १८० फ१००-८०। ताप प्रकाथ करतो है। प्रत्ये कमें २० का भाग देकर निकला- सबसे पहले यहो शतांशिक तापमान-यन्त्र व्यवहार फ-५ -४ लाया गया। अत्यन्त सुविधाजनक होने के कारण यह सुतरां १ फ-स- र आजकल सर्वत्र प्रचलित है। स्वोउन देश-वासो एक और सफर वैज्ञानिकने इस निर्माण किया है। उनका नाम मेल्सि- सुतर्गफ-स-र यस ( Celsius ) था। इन्होंने मन् १६७० में जन्म और १-६फर लिया और सन् १७५६ में इनको मृत्यु हुई । तथा १२-२ -३.स फारमहोट (Pahrenheit, नामक एक प्रसिया देश अब इनके द्वारा किसी एक तापमानके घर मेसे वासी वैज्ञानिकन एक दूसरा तापमान-यन्त्र बनाया। और दो तापमानों के अंश महज ही प्राप्त किये जा सकते यही तापमान इङ्गालैण्ड में अधिक व्यवहारमें लाया जाता है। इसके तोन नियम नोचे दिखलाए जाते है। है। यह सेल्सियसके तापमानसे भिव है । यह तापमान यह याद र पना चाहिये कि फ ३२ र और म. धनोभावबोधिका और वाष्योभावबोधिका रे तक १८० के ०', सुतरां फको र या ममें परिणत करने के लिए पहने समभागांमें विभक्त है। इस यन्त्रक वायोभाव-बिन्दुमै ३. घटाना होगा। २१२और घनीभाव-बिन्दु ३२का अङ्क लिखा रहता है। शम्यबिन्दु धनोभाव-चिन्टुक २२ घश नोवे रहता है। प्रणालो इस प्रकार है:--- कारण, उनके मतम नमक और तुषार साथ मिलानसे फ-३२ निमातम तापक्रम उत्पन्न करते हैं इसीलिये उन्होंने वहां स-८४५ पर शूम्ब बिन्दु निर्धारित किया। इन दो तापमानोको फ-३२ छोड़ कर एक और तापमान है; उसका नाम है रिउ- मर (Reaumer), रिटमर नामक किसी रासायनिकने २-८४४ इसका निर्माण किया। यह जर्मनीके उत्तरमें व्यवन फको समें परिणत करने के लिये फ के अजमे प्रथम होता है। यह वाष्पाभाव-बोधिकासे घनाभाव-बोधिका २२ घटा कर बाकोवा ई से - गुणा करो; यथा- रख सक ८० शाम विभता है। प्रयोजनके पनसार २१२ -(२१२-२२) १८०+-१००स Vol. IX. 105