पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४२८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वापा-तापी वयवारक, कृषिजनक, कचिका और गुरु । इमके विवा तापोके नाम । तापोके इकोस नाम है- सत्या, सत्यो इसकी उपादान मामग्री में जो जो गुण हैं. हममें भी वे इवा, श्यामा, कपिला. कापिला, अम्बिका, तापनो, तपनो, ही गुण पाये जात।। भावकाश ) (त्रि.)२सा तपन', हार्दा, नासिकोडवा. म वित्रो महसकग, सन ना, हारिणो मात्र जिमम ता दूर हो। अमृतस्यन्दना, सुषुम्ना मक्ष्मरमाणो, मो, मर्षीविषापा, तापा (हिं० १०. १ मकन्ला मारने का सरला । २ मुरगी का तिग्मतिग्मरया (?), तारा और ताम। रबा। माहात्म्य ।-जा तापमं मान करते हैं, वे ममस्त तापायन (म' पु. ) वा जमनेयो शाखाका एक भेद । पामि विमुक्त होते हैं और जो दमका नामोच्चारण करते ताप (म० वि०) तापे तापकाले भव ठत्र । ग्रामभव हैं, उनका पाप दूर होता है। जम्नादि, जो गरमामे उत्पन होता हो। भाषाढ़ मामम तापोम मान करनेका फल।-बारह तापिच्छ (म० पु०. तापिन छादयति छद-ड पृषोदरा महीनामें कोई भी माम आषाढ़माम के ममान नहीं, क्यों माधुः। तापिन देखो। कि दम माममं जगत्पति थोविषा लक्ष्मोक माथ अनन्स- सावित्रछ ( म० पु. ! तापिन छति अाच्छादयति छद शय्या पर शयन करते हैं तथा इम मासमें विश्वकर्मान ड पृषोदरा०माधुः। १ तमालवृक्ष। (को) २ लामिक भूताक मृष्टि को है। (तापीख'० २२११२२) पुष्प, एक प्रकारका फूल। आषाढ़ माममें तापमान करनसे सब तरह के पामि तापिन । म को०) तापिन जयति जि-ड। १ धात छुटकारा मिलता है । प्रयाग जा कर माघ मास में बारह माक्षिक, मोना मकवो। ( पु. ) २ तमाल क्ष । बार सान करके जो पुण्यलाभ किया जाना है, आषाढ़ सापित R० त्रि.) तप-णिच-तो । १ तापयुक्त, जो तपाया मासमें दम तापीमें एक बार स्रान करनेसे उमसे भी गया हो । २ दुःखित पोड़ित । अधिक पुण्यलाभ होता है। तापिन ( म०वि०) तापयति ताप गिनि। १ तापक, यदि कोई मनुष्य कपटता करके इममें मान करे, ताप देनेवाला । तपाणिनि । २ ताश्यक. जिमम ताप हो। तो भो तापोंके माहात्म्यानुसार उमके शतजनाजित पाप (पु )२ बुद्धदेव । वम होते हैं। यदि बालत्ववगतः आषाढ़ मास में तापम तापो (म स्त्रो० ) तापयति तप-गिाच अच् गोरादित्वात् कोड़ा करते हुए स्नान करे, तो उसको भो देवालय. वापो, डोष । नदोमेद, एक प्रकारको नदो जो पश्चिमवाहिनो कूप, तडाग प्रादि बनवानका पुण्य होता है। यदि कोई और विन्ध्याचलम प्राविभूत होता है. तापतो नद।। व्यक्ति किमो द्रव्यको कामना करके इसमें खान करे, तो (4. पु०११३)२७ विष्णु पुराण के मतमें यर नदो मय वह ममस्त पापमि मुक्त हो कर अश्वमेधका फल लाभ पाटोद्भवा है। (विष्णु१० २०३१११ । करता है। उम नदीका जल गाढ़ा. गोतल, पित्तघ्न कफक्तत्, जो जानके वा बिना जान पाषाढ़ माममें सान वातदोषहर, हृद्य, कण्ड, और कुगठनाशक है : करते हैं, वे समस्त पापसे मुक्त होकर सनातन ब्रह्म- (हारित ७ अ०) पद पाते हैं। (तापीख ३३०) म्कन्दपुराणके तापोखगड़ में इनका विवरण इस प्रकार नि है- तापको मिट्टो शरीर पर लपेट कर अन्यत्र खान करनमे जम्मान्ता-कत पातक निश्चय होवंम होते हैं। जगप्रमिह सोमव में बकायगा नाम के एक राजा थे। वरुणन अगम्त्य मनि: शापमे मम्मरणारूप में जन्म अाषाढ़ मासमें तापोक किनारे जो दोपदान देते हैं, वे सहस्र कोटि कुनका उहार करते हैं। (तापीख. ३) ग्रहण किया । उक्त राजाने कठोर पसाधन करके सुई- कन्धा तापोका भाय रूपमें गहण किया । ये तापा अशेष कुरुक्षेत्र में प्रभूत सुवर्णदान भरने से जो पुण्य होता है, पापदानी पौरपयन्स रूपलावण्यसम्पन थीं। रस तापोतट पर केवल दोपदान देनसे वहो पुण्य हुमा तपती देखो। करता है।