पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४३३

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तामस १५. विवसतापाल (जिसका अमलो खाद बिगड़ गया हो), निद्रा, पाग्नस्थ पौर प्रमादके हारा जो सुख उत्पन. पूतिमत्, पसित, उच्छिष्टादि अमेध्य पाहार तामस होता है, जो पात्मामें वतमान पोर परिणाममें मोरके पाहार और यह आहार हो तामस लागकिं लिये सिवा और कुछ भा उत्पब नहीं करता, उस सुखका नाम प्रिय है। तामस सव है। (गीता) पौरोहिस्य, याचन, देवल्य अति दुराग्रह द्वारा दूसरेके उस दनके लिए प्रात्मा ! शूद्रादि द्वारा प्रतिष्ठित विग्रहादिको नित्यपूजा), ग्राम- नाना प्रकारको पोड़ा उत्पब करके जो तप किया जाता याजन, विष्णुसेवापराध, विशुनामापराध. भसप्रतिग्रह है, उसे तामसतप करते हैं और ऐसा तप ताममप्रकतिक प्राभिचार, परजावादि हनन, पातक, उपपासक, पति लोग ही करते हैं। पाप. महापाप, अनुपातक, लोभ, मोह, पहार, काम, देश-काल-पावादिका विचार न कर, किमो भो क्रोध ये ममम्त तामसकर्म हैं। ( पद्मपु. १० ख० ) देश वा कास अथवा पाबमें असत्कार और प्रवचनाके ताममऋत्विक र तामसट्रम्य हारा सामसभाव साथ जो दान दिया जाता है, उसको तामसदान करते अवलम्बन कर जो यन्त्र दिया जाता है, उसका नाम तामस यन्त है। इस प्रकारके तामस यन्न, तामम दान ___ भविथत्का प्रभफल, शक्तिचय, अर्थचय और और तामस तपस्या दार! मरकमें जन्म होता है। परिजनादिका क्षय तथा प्राणिहिमा और प्रात्मसामा तमोगुण प्रकतिक तोन गुणोममे एक है। जिस गुपके दिको पर्यासोचना न करके प्रज्ञान वा अविवेकतावश हारा तम अर्थात् ग्लानि उत्पन हो, उसको तम पर्थात् मोनिया पनुष्ठित होतो है, उसके तामसको किया करते श्रावरक गुण करते हैं, इभलिए तमोगुण मोहका कारण है। मत्व, रज और तम ये तीन गुरु परस्पर मो व्यक्ति प्रवन्त असमाहित है अर्थात् किसो भो जड़ित हैं ; जब एक गुणका प्राधान्य होता है, तभी कार्यमें विशेषरूपसे मन नहीं लगता, जिमकी बुद्धि अत्यन्त उसको उम गुणांक नामसे पुकार सकते है। तम, रज असंस्थत है, जो निपुणताके साथ विचार न कर मकनके और मत्त्व भित्र भित्र नहीं रह सकते। हां, जब सत्व कारण प्रतिवश कोई प्रवृत्ति मनमें उदित हो और उसके ओर रजको पराजित कर अपना धर्म प्रकट करता अनुसार काम कर डालता हो, जो जान-पर्यालोचनाके रहता है, तभी उसको तम कहा जा सकता है। किन्तु द्वारा कुछ भी परिमार्जित नहीं हुआ हो, सदुपदेशबाग पराभूत भावमें मत्व और रज उसमें विद्यमान रहेंगे। जिसको किसी तरह से समझाया महीं जा सकता, अन्तः- तम तमोगुणा, एस गुण शब्दमें वैशेषिकोत गुणपदार्थ सारविहीन, मायावो, जो पन्त:करणके भावको छिपा नहीं है, इसको ट्रव्य पदाथ समझना चाहिये। बर बाहरमें अन्वरूप व्यवहार करता है भोर परवृत्तिको सत्व, रज और तम ये गुणत्रय अन्धभावसे प्रव. बिगाड़नेमें तत्पर है, चिन्ता आदि करने में पालसो है, स्थान करने पर भव्यक्त कहलाते हैं। ये गुणत्रय सर्व- सर्वदा पवमन मोर दोर्घसूत्री है, ऐसे कर्ताको सामस- कार्य व्यापो, अविनाशी और स्थिर होते है। जब ये गुण का कहते हैं। क्षुभित होते हैं, तब पचभूतात्मक नवहारयुक्त पुररूपम जो मनसे अधर्म को धर्म और अकर्तव्य विषयको परिणत हुआ करते हैं। उता पुरके मध्य प्रन्ट्रियाँ पवा कर्तव्य समझता है, ऐसे विपरीत भावप्रकाशक मनको __स्थान कर जोवको विषयवासनामें प्रवृत्त करती है। मन तामसमन कहते हैं। उस पुरमें रह कर विषयाको अभिश्थता कर देता है, बुद्धि जिम व्यक्ति किसी विशेष धारणाके द्वारा सर्वदा हो उम पुरकी कर्ती है। लोग भान्तिपूर्वक उस पुरको मनमें शोक, भय, स्वा, विषाद, मत्तता पादि उदित जीवात्मा कहते हैं । किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है, जीव हुमा करतो ., उम दुमै धा व्यक्तिको धारणाको तामस उम पुरमें रह कर सिर्फ सुख और दुःखका भोग करता धृति कहत है। गुणत्रय एक दूसरेका पाश्रय ले कर अक्सान करते Vol. Ix. 108