पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४३४

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सामस-तामसकील है। यह बात पहले दो हो जा चुकी है. कि जिस अध्यवसाय, बुद्धि धर्म ज्ञान, विराग, · ऐलयं ये स्थान पर उनमें से किमा एकक अधिक्य होता है, वहाँ मात्विक और इसके विपरीत ताम है। (मास्यका.) दूमरोको मौनता नलित सत्व और रज होन विषादका नाम है मोह, विषाद का स्वरूप हो तमोगुण होने पर तमोगु " प्रकशित त हैं। इपो तरह तमः- है, जब कभी इस गुणका आविर्भाव होता है, तभो विष- होन होने पर जोर रज होन होने पर सत्व प्रकट ममता प्रा उपस्थित होतो है। जब तमोगुण प्रकाशित शेता है। तमोगुण अ-प्रकाशात्मक है, उमको मोह होता है, उस समय वह रज घार मत्वको पराजित कर कल मकते है। अपनोवृत्ति प्रकाशित किया करता है। इम तमोगुण के प्रावन्यसे मनुष्यको अधर्म में प्रवृत्ति मत्वगुण लघुप्रकाशक और इष्ट है । रज उपष्ट- हा करती है । तमोगुण के कार्य ये है-मोह, अज्ञानता म्भक और चञ्चल है तथा तमोगुण गुरु-वरणक अत्याग, अनिश्चयता, स्वप्र. स्तम्भ भय, लोभ, शोक. है। गुण परस्पर विरोधी होते हैं, किन्तु विरोधो होने मत्कार्यदूषण, अस्मृति, अफलता, नास्तिकता, दुश्चरित्रता, पर भो स्वय सुन्द और उपसन्दवत् विनष्ट नहीं होते। सदमदविवेकराहित्य, इन्द्रियवर्ग को अपरिम्फुटता, निक्लष्ट जिस प्रकार वर्ति और तैल परस्पर विरुद्ध होने पर भी धर्म प्रप्ति, पकार्य में कार्यज्ञान. अज्ञान में ज्ञानाभिमान, एकत्र मिलित हो कर परस्पर अर्थ प्रकट किया करते अमित्रता, काय में अत्ति , अश्रद्धा, वृथा चिन्ता, अस- है तथा वायु, पित्त और श्लेषा परस्पर विरोधी होने पर रखता, कुबुद्धि पक्षमता, अजितेन्द्रियता, दूमरा का अप- भा एकत्र मिल कर शरोर-धारणरूप कार्य करते हैं, उसो वाद. अभिमान, क्रोध, असहिष्णुता, मत्सरता, नोचकम- प्रकार ये गुणत्रय परस्पर विरोधी होने पर भी एकत्र में अनुराग, प्रसुखकर कार्य का अनुदान, अपात्रम दान। मिलित हो कर परम्परको वृत्ति अर्थात् सुख, दुःख भोर जो उस कार्यो का अनुष्ठान करते हैं, उनकी तामम- मोह प्रकट करते रहते हैं । तम अर्थात् अविद्या पाठ भेद प्रजातिका मनुथ समझना चाहिय । नाममप्रतिक हैं -प्रयता महद, अहङ्कार और पञ्च नन्हात्र । ये पाठ लोग जन्मान्तरमें स्थावर, राक्षस, मय, म. कोट, पक्षो, प्रकार तम प्रज्ञान हैं। ( सांख्यका० ८) विविध चतुष्पद जन्तु होते हैं। जो मवदा निकष्ट ने यायिक विद्वानोंका करना है कि पालोकका कार्य करते रहते हैं, उनको तमोगुण प्राधान्यमे तामस प्रभाव हो तम है। प्रभाकरों के मतसे रूपके दर्शनका प्रजातिका कहना चाहिये। मत्व, रज पार तम ये तोनों प्रभाव हो तम है। गुरु सर्वदा प्राणियों के शरोरमें अवच्छिवरूपमे रहते विशेष विवरणके लिये प्रकृति' शब्द देगे। हैं। इसलिए उनको कभो भो पृथक रूपमें नहीं दे (पु.) तमसो गहोरपत्य प्रणा । १. रासुत. सकते। उत तोनों गुण एक दूसरे पर अनुरक्त हो कर नाममकोलक । ११ शिवका एक अनुचर । परम्परको पाश्रय किया करते हैं। मन्वगु " मत्वमे, तमो. सामम कोलक ( स० पु. ) सामम राहुसुत: कोलकाव । गुण तमसे, रजोगुण मत्व और तममे किमो समय भो. राहुसुन केतुमेद । तामसकोलक आदि संधाविशिष्ट राहु- तिरोहित नहीं होता। उक्त गुणत्रय परस्पर मिल कर सुत केतु नेतास प्रकारक है । वर्ण, स्थान और पाकारा- सांसारिक समस्त कार्य करते हैं। कवन जन्मासरोग्ण दिहारा सूर्य मण्डलमें उनका लक्ष्य करके फल निर्णय पापपुण्यके कारण प्राणियोको देहमें इनका तारतम्य किया जाता है। वे यदि सूर्य मगडलगत हो, तो अमङ्गल देखने में पाता है। स्थावरममुदायमें तमोगुण का आधिक्य होता है, चन्द्रमण्डलगत होने पर सभफल ; तथा यदि विद्यमान है; किन्तु वे रज और तमोगुणमे विररित चन्द्रमण्डलम वे काक, कवन्ध वा प्रहरणरूपमें प्रकट नहीं है। जागतिक प्रत्येक पदार्थ में तम विद्यमान है हो, तो अमङ्गलदायक होते है। उनके पाक उदयसे बमाधिक्य भावसे रहने के कारण किसो द्रव्यका नाम मब कुछ विरुप हो जाता है जल मलिन और पाकाश सात्विक और किसोका राजसिक वा सामस हा धूलिममान होता है। प्रचहवायु पसा करती है,