पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४३७

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मनिट दानका खून और ताण्डवनृत्य पमन्द करते हैं। इनमें वा दिगम्बर-जनीका प्राधान्य देखा था।जनोंके समय में कोई बकरा, कोई सूपरके बच्चे और कोई मुरगासे सन्तुष्ट द्राविड़को यथेष्ट उबति हुई है। पब भो द्राविड़ के नाना होते हैं। और कोई कोई तो बिना शराब मिले सन्तुष्ट स्थानों में प्रभूत जैन कोर्तियों प्राचीन जेन समृद्धिका विशेष हो नहीं होते। बहुतमे निम्न श्रेणोके तामिका परिचय दे रही है। यहांके प्राचीन जनधर्मावलम्बियोंको विश्वास है, कि भूतसे हो दुःस्वप्न होते हैं। एक प्रकार प्रमभ्य, अनार्य वा म्लेच्छ नहीं कहा जा सकता। वे का भूत है जो साते ममय गरदन या दबाता है। अवश्य हो सुसभ्य और पाय थे। किसो किसो भाषा विदका अनुमान है कि सुप्रसिद्ध कुमारिल भहने पान्ध. ट्राविड़ शब्दमे जिस द्राविड़भाषाका उसख किया है, वह उन्हीं के ममकालोन जैनों में व्यवात तामिल भाषा है। पाण्डाराज सुन्दरपाण्डा परम व थे। उनके ममयमें तामिल-भूमि पर शोका प्राधान्य पौर जन धम को अवनति का सूत्रपात हुा । शहराचार्य के दौर दौरेमे यहां जैनधर्म का प्रभाव एकबारगो होनाभ हो गया था। तामिलोंमें बहुत दिनों तक शैवधर्म प्रबल था, इस समय शिवोपामकगण स्मात कहलाते हैं। रामानुजके प्रयत्नसे वैष्णवधर्म का प्राधान्य स्थापित एमा। तामिलोंमें तामिल छात्र। किमोको रोग होने पर अब भी निम्र श्रेणियों में श्रोझा अब दो श्रेणीक वैष्णव दोख पड़ते हैं, एकका नाम तेङ्गल वा दक्षिणवेदी है और दूसरेका बड़गल वा उत्तर बुलाये जाते हैं । वे सिर पर पगडो, गले माला, हाथमें वेदो। कड़े और बांहमें टंडिया पहन कर पाते और माथमें इस समय उत्तर भारतमें जैसे पहलेको तर वेदका घगटादार धनुष लाते हैं। वह बर्ड जारमे चिना कर प्रचलन नहीं रहा है, वैमा द्राविड़में अभी तक नहीं कूदते हुए मन्त्र पढ़ता और उस धनुषको बजाता रहता हुअाः तामिलमें अब भो वेदका यथेष्ट अादर है। पौर है। इमसे ओझाक शरोम भूतावश होता है। फिर वह तो क्या, द्राविड़का ऐमा कोई मन्दिर नहीं, जहां प्रति रोगको व्यवस्था करता है । भूत-पूजा नौचौका धर्म होने दिन वेद न पढ़ा जाता हो। तामिन ब्राह्मण समस्त पर भी उच्च श्रेणो लोगों में इसका प्रचार अब बिल्कुल धर्म कर्म में वेदपाठहोको एक प्रधान अङ्ग समझते है। नहीं रहा है। ब्रामणगगा अब भी यथासाध्य शास्त्रको मान कर चलते बरतो का विश्वास है, कि दाक्षिणात्यमें ब्रह्मा हैं। यहां वर्ण विचारको प्रथा भी शिथिस नहीं हुई प्राधान्य स्थापित होने पहले, बहत मपय तर यहाँ है। अब भो ऐसे बहुत स्थान हैं, जहांके ब्रामण शूद्रको जैनधर्म का प्रावल्य था। पहले ही लिया जा चुका है, स्पर्श करने में अपने धर्म नाशको आशा करते है। ऐसे कि जैन-ग्रन्य शत्रुञ्जय-मात्मा मतः आदि तोथर भी बहतमे ब्राह्मण-ग्राम हैं, जहां शूद्रोको प्रवेश करनेका श्रीऋषभदेवके पुत्र नामानुसार द्रविड़ नाम हुआ है। अधिकार नहीं है। और उन्हों के अपत्यगण द्राविड़ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं। मुसलमानोंक प्राधिपत्यकालमें बहुत थोड़े तामिलों में उपर्युत पोराणिक कथाम स्पष्ट जान पड़ता है, कि किमी हो इस्लामधर्म माना था । उनको सन्तान मन्ततियो मेसे ममय तामिल देशमें जैनो का माधिक प्रावल्य था। बहता ने ईसाको १६वीं शताब्दोंमें फ्रान्सिमजेसियरके ईसाको ७वीं शताब्दोमें जब चौन-परिव्राजक यूयेन- प्रयत्नसे ईसाई धर्म मान लिया था। इस समय तामिलों- चयांग इस देश में प्राय थे, उस समय भी उम्होंने निर्णय में फोसदो १ ईसाई मिलेगा। Vol IX. 109