पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४४२

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१८ खेतोका काम कुए के पानोमे होता है । धारवाड़ वैद्यकके मनसे पानके गुण-विशदगुणवत्ता, रचि. पान पावादको वस्त है। यह खुलो जमो नमें होता है, कारक, तोरण. उष्णवीय, कषाय तिता, कटरम, सारक, अपर मचान नहीं धांधा जाता। ३ बोधेमें प्रायः १ वगोकरणक्षम, क्षारयुका, रक्तपित्तजनक, लघु, बलकारक हजार बेल लगाई जाती है। एक पावादो ३ मे ७ वर्ष तथा कफ, मुखगत दुर्गन्धमल, वायु चौर श्रान्ति- नायक है। तक रहती है। कनाड़ाके पान आम्रवृक्ष के नोचे बोये जाते हैं। तीन भोजन के बाद सुपारो, कपूर. कम्त रो, लवन, जाय. वर्ष बाद पत्त तोड़ते हैं। थाना जिसमें यह पथगेलो, । शामा सिरानो फल अथवा मुखके लिए निमन्तत्वजनक कट तिला पोर दलदलो और गोलो जमोनके सिवा और मब जगह होता कषाय मयुक्त फलके सुगन्धद्रव्य के माय ताम्ब ल खाना चाहिये। है। यहाँ १ फुट या १॥ फुट गहरे गड्ढे खोदते और पौष रात्रिको, निद्रावसान होने पर, मानके बाद, भोजनके माम उनको पानोसे भर देते हैं। पानों के सूख जान बाद, वमन के बाद और परिश्रम कर चुकने पर, पगिड़त- पर (मिट्टो कुछ कुछ गोन्ना रहतो है ) एक एक गड़े में सभा और राजमभामें ताम्ब ल खाना अच्छा है। एक एक साथ लम्ब चार चार डण्ठल गाड़ देते हैं; (सजवल्लभ ) फिर उगने पर उनको कमांचियोंमे बांध देते हैं। इन किसीके मतसे -ताम्बल तीक्ष्ण, उष्णवोय, अत्यन्त गौम प्रायः एक एक पाव मरौंको खनी भो देनी रुचिकारक, मारक, क्षारसयुक्त, तिक्त, कट ग्म, कामो- पड़तो है। एक माम बाद फिर प्रत्येक गड़े में एक एक हीपक, रक्तपित्तजनक, लघु, वश्यताजनक, कफन, मुवि. पाव खग्लो डालो जाती है। नताके बढ़ने पर को दुर्गन्ध और मलका नाशक, वातन्त्र, अमापहारक, दमका बन्धन ग्बोल दिया जाता है, जिममे वह जमीन पर मुग्वमें निर्मलता और सुगन्ध लानेवाला, कान्तिजनक, लेटने लगती है। इसके बाद फिर रहलो डालते हैं और अङ्ग-मौष्ठवकारक, हनु और टन्तगत मलनाशक, रमने- जड़ में राख मिट्टी देते हैं। फिर लता को गांठोंमे डानिया न्द्रियका शोधक तथा मुखस्राव और गलरोगका विना- निकान कर बढ़ने लगती हैं। और एक प्रकारको खेती शक है। होतो है, जिसमें लताको जमीन पर न लिटा कर माँचे पर। नूतन ताम्ब ल ईषत् कषाययुक्त, मधुररस, गुरु और चढ़ा देते हैं। एक वर्ष बाद पत्ते तोडते रहते हैं। कफकारक तथा प्राय: पत्रकमदृश है। पवथाकमें जो कोन्नावा जिले में मछलीको खाद देते और ताड़पत्र ढकते जो गण होते हैं, न तन ताम्ब लपात्र में भी वे वे गुण है।पना, मतारा पोर घाटपर्वतमें उत्कष्ट पान होते हैं। मौजट रहते हैं। जितने भो पान बङ्गालमें पैदा होते संयुक्त प्रदेश-बुन्देलखण्ड में अच्छ पान होते हैं। मैंने अत्यन्त कट रस. सारक, पाचक, पित्तवईक, उष्ण- पर यहाँ पानको खेतो बहुत कम होता है। वीय और कफनाशक हैं। ब्रह्मदेश-यहां करेनजातिके लोग चे स्थान पर परान पान कट रमविहीन, लघु, कोमलतर और बड़े बड़े जगालो पेड़ोंके नोचे पानको खेतो करते हैं। वागड वर्ग होते हैं; ये अत्यन्त गुणदायक है। अन्यान्य उत्त पड़ोको नोचेको डानियां काट दी जाती हैं। पन- पान इसको अपेक्षा होनगुणविशिष्ट है। पानमें सुपारो बल हक्षक काण्ड पर चारों तरफ फैलती और लम्ब कत्था और चना लगा कर खानसे कफ, पित्त और वायु सम्मे पतं फैलाता है। यह देखने में बड़ो मनोहर नष्ट होतो है, मन प्रफुल होता है, मुख निमल और लगता है। युवकगण पानके वृक्ष पर चढ़ना बड़े कौशल- सुगन्धित होता है तथा कान्ति और प्राके सोन्दय की से सोखते है। शायद इसलिये इसका नाम "कड़ी" हधि होतो है। पड़ गया है। 'मघई' नामक एक प्रकारका पान प्रात:कालमें ताम्ब स खावें तो सुपारी अधिक, दो. होमा है, जो बहुत ही सुखादु होता है तथा 'मोठा पहरके ममय कत्था पधिक तथा रात्रिको घना अधिक नामका पान भी खानेमें बहुत उमदा लगता है। मिलाना चाहिए।