पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४५३

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ताम्र -प्रसार ४५९ अपेक्षा परदत्त भूमिको रक्षा करना पत्यन्त पुखजनक दूरी पर अवखित ।। मार्कयोलो रसो क्यालको कयेल है। भारतवर्ष के सब स्थानोंसे हो स तरह मैकड़ो बतखा गये। ताम्रशासन भाविकत हुए है। इममे भारतीय राजानी रामायण, महाभारत तथा सभी मुख्य पुराणों में रस को वशावलो और इतिहास बहुत कुछ स्थिर होता है। नदोका उल्लेख है। प्रियदर्शी पशोकके १२वं अनुयामनमें ताम्रपत्र ( म०पु०) तान र पत्र' यस्य बनौ। रस नदोका जो उल्लेख है, उसमें लिखा है, कि दक्षिणमें १ जीवशाक, एक प्रकारका माग । २ रावण पक्ष चोड़गण और पाण्डागण सन्यपत्री (साब्रवी) तक राज्य मात्र, एक प्रकारका पेड़ जिसके पत्ते लाल होते हैं। करते थे, उस समय वहाँ बोडधर्म का प्रभाव जोरोंमे कर्मधा। ३ ताममय लेखनपत्र, तौबकी चहरका फैला हुआ था। टुकड़ा । । रक्तदल नव पल्लव, लालरङ्गको नयो पत्तियों। जहाँमे यह नदी निकलो है, वहाँ ताम्रपर्णी नामको ताम्रपत्रक (म. पु. ) ताम्रपत्र देखो एक पोर नदो रे जो पषिमको पोर बदतो हुई विवा. ताम्रपण-मिहल होपका मामान्तर ( Taprohane )| हर राज्यमें प्रवेश करतो है। सिहल देखा। २ बम्बई प्रदेशके अन्तर्गत बेलगाम जिलेको एक ताम्रपर्णी-मन्द्राजके अन्तर्गत तिववेनि जिलको एक छोटी नदी। यह सिविल नामक स्थानमें घाटममा नदो। इमका स्थानीय नाम "परुनै"है। हलेसी नदोसे पा मिली। और पेरिप्लम इसका उल्लेख कर गये हैं। यह पश्चिम- ३ सिंहल होपको एक नगरो। इस नगरो के कारण घाट पर्वतसे निकल कर दक्षिण-पूर्व को ओर बहती हुई समूचे सिंहलका साम्रपर्ण नाम पड़ा है। ४ मनिष्ठा, ___ मजीठ। ५ मरोवर, तालाब, बावलो। शर्म टेवो तक चली गई है। फिर वहाँसे उत्तर-पूर्व को । ताम्रपर्णीय ( म० पु. ) सिंहलहीयवासो वोध । पोर होतो हुई तिब्रलिमे पालमकोटा तक पौर वहाँसे ताम्रपल्लव ( स० पु.) सामणि पन्नवानि यस्य बहुव्री०। फिर कभी दक्षिणको भोर कभी पूर्व को पोर होतो हुई। अशोकक्ष । इम के मस्त पर्याय-हेमपुष्प, वनल 'अनोपसागरमें जा गिरी है। कालि, पिण्डपुष्प, गन्धपुष्प और नट । ( भावप्रकाश ) जहाँसे यह नटो निकली है, वहाँ चित्तार पादि इसको अनेक उपनदियों है। ताम्रपर्णीको लम्बाई ७० ताम्राको (म' पु०) पचते इति पाक: पच्-धज , तामः रतवर्ण: पाक परिणतिरस्सास्य इति इनि । गद भागड़ मौसके लगभग है। इम मदोसे तिने वेलि जिलको च, पावरका पेड़। प्रायः १८.५००० बीघा जमीन सौंचो जाती है। जल- साम्रपान (म'. क्लो० ) ताम्रनिर्मितं पात्र कर्मधा। सञ्चारको सुविधाके लिये इममें पाठ पुल दिये गये है। ताम्रमय पान, ताँबेका बरतन। ताम्रपानमें सपण इनमेंसे सात तो हिन्दराजाओंके ममय के है और पाठवा करना प्रशस्त है। किसो देवकार्य में तामपानमें हो जो श्रीव कुण्ठम् नामक स्थान में है उसे हटिश गवर्मेण्टमे सङ्कल्प करना पड़ता है। ताम्बपात्र में भोजन करना १८८६ में बनाया है। यह पुल समुद्रपृष्ठले २७४. निषिद्ध है। ताम्रपाषमें मधु और दुग्ध रखनेसे वह फुट ऊंचा है। जब नदी में बाढ़ अधिक पा जातो है, तब मद्यतुल्य हो जाता है। ये सब पुल डूब जाते है। इसके किनारेका कोलकेई "नारिकेलजलं कास्ये तामपाने स्थितं मधु! नामक स्थान प्रभी ममुद्रतीरसे ५ मोल हट गया है। गव्य च सामपात्रस्थ मयतुल्य घृत' बिना।" किन्तु टलेमोका वर्णन पढ़नेसे मालूम पड़ता है कि वह (स्मृतिसागर) खान ममुद्रवर्ती एक बन्दर था। प्रभो वह ग्रामके रूप में ताम्रपाबमें हत रखमा प्रशस्त है । तामपावमें दधि परिणत हो गया है। तामिल भाषामें कालकको पथ' पौर माम दूषणीय है, किन्तु द्रव्यान्तरयुक्त मांस चोरहत- सेना टल वा सेना शिविर है। कयाल नामक एक युक्त दधि दूषणीय नहीं है। तानका पात्र प्रयत। दूमरा छोटा पाम है. जो समुद्री किनारेसे दो मोलको ताबवाय भाव मत्पात्र हितकर । Vol. IX. 113