पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४५५

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ताम्ररसायनी-ताम्रलिप्त ४५१ सक क्रमशः एक एक रत्तो बढ़ाना चाहिये। पोछे १२ हपा, कि क्यों यह नाम पड़ा । तमलुक देखो। दिग्विजय दिनके बादसे एक एक रत्तो घटा कर सेवन करें। उक्त प्रकाश नामके विषय में एक पद्धत उपाख्यान दिया पौपधके साथ त्रिफला और त्रिकटुचण को मात्रा भी एक गया है. उसे यहां हम उहत करते हैं- एक रत्तो बढ़ाई जातो है । परन्तु विडङ्गको मात्रा बरा- जिम ममय वृन्दावन वासुदेव रासलोला कर रहे थे, बर एकमी रखनी चाहिये । यदि रोगोको कोष्टवडता हो उस ममय उनकी इच्छामे चन्द्र सूर्य का स्तम्भन हा और उसमें विरेचन पावश्यक समझे, तो विडङ्गचुण २ था । पछि सूर्य देवने सारथिमे कहा-'मैं भारतमें दिन रत्तो देवें; इससे कोठा साफ हो जायगा। यह ताम्रयोग करूंगा. तुम उदयाचलमे शोघ्र पाया।” सारथिके रश्मि ग्रहणोरोगको एक उत्तम औषध है। इससे अम्लपित्त, ले कर उस्थित होने पर उम पर ज्योना पड़ो, फिर अरुण क्षय पोर शूलरोग विनष्ट होता है, बल और बण को दूरोभूत हो कर समुहप्रान्तमें लिन हो गया। जिस स्थानमं वृद्धि हो कर अग्निको वृद्धि होती है। लिम हुए थे, वह स्थान ताम्रलिमके नामसे प्रमिड हात ( चक्रदत्त प्रहण्यधिकार ) बादमें रामलोलाका अवमान होने पर दिवाकरन अस- साम्ररसायनो ( स० स्त्री० ) ताम रसस्य रतनिर्यासस्य का उद्धार किया और वह स्थान धनधान्यवान हो अयनो, ६-तत्। गोरक्षदुग्ध, एक प्रकारका पेड़ जिसका गया। रस दूधमा सफेद होता है। प्राचीन और आधुनिक अवस्थान । --महाभारतकं पढ़नये ताम लिल-एक अति प्राचोन जनपद । महाभारत भोम मान्न म होता है, कि यह जनपद ममुद्र किनार और पर्व (७६), हरिवश. ब्रह्माण्डपुराण, अथर्व परिशिष्ट कनिङ्ग बालमें था। पालि महाशके पढ़नेमे जात आदि पौराणिक ग्रन्थों में इसका उल्लेख है। शब्दरत्नावतो होता है. कि ईमाके जन्मसे ३०७ वर्ष पहलेमेहोताम्रनिम्न विकागड़शेष और हेमचन्द्र के अभिधानचिन्तामणिमें इसके नगर ममुद्रलवर्ती एक बन्दरकं नामसे प्रसिद्ध था। उस कई एक पर्याय दिये गये हैं- ममय मिहलके राजान उक्त बन्दर जहाज पर आरो- समोलिनि, तामलिल, बेलाकल, समालिका, तामलिता, हण किया था। इस बदरसे ही बोडकि पाराध्य बोधि- दामलिल, तमालिनी, विष्णुग्रह । द्रुम मिहल होपको भेजे गये थे जिनके लिए समुद्र के जैमिनिभारतमें रत्ननगर और वङ्गकवि कागोदामके किनारे खड़े हो कर सम्राट, धर्माशोकने विलाप किया महाभारतमें रत्नावतोपुर नामसे इसका उल्लेख है। था। दाथवंशमें लिखा है. कि दन्तकुमार और हेममाला इखका स्थानीय एक प्राचीन नाम रत्नाकर भी है। वर्क- इम प्राचीन बंदरसे जलयान द्वारा बुहदन्त सिंहलम ले मान नाम तमोलक. तमलक वा तामलक है। गये थे । वृहत्कथाका उपाख्यान पढ़नसे यह मालम ___पाचात्य भौगोलिक टलेमौने तामन्नितिम ( Tamli- होता है, कि सैकड़ों बणिक यहाँ जहाज पर चढ़ते थे । tes ) एवं महावंश और दाथव'कारने ताम्रलित्ति ईमाको ५वीं शताब्दोंमें चीन-परिबाजक फाहियान दो नामसे इस स्थानका उल्लेख किया है। दोनों हो शब्द वर्ष तक यहां रहे थे और बौद्धधर्म ग्रन्यादिको प्रतिलिपि संसातसे उत्पन्न हैं। लेकर ममद्रपथमे मिहल गये थे। उनके भो दो मौ मेगस्थिनिमने गङ्गाके उस पार सालति + "ज्योत्स्नापतितकिरणदूरीभूतो हि चारुणः। ( Taluctac ) नामको एक जातिका उल्लेख किया है। समुद्रप्रान्तभूमौ च निमग्नश्रातिमोहितः ॥५६॥ अनुवादक मैक्रिण्डल माहबके मतमे वह शब्द तामलिन अरुणाख्य सारयेश्च पनात् नृपशेखर वासियोंका निर्देशक हैं। * ताम्रलिप्तमतो लोके गायन्ति पूर्ववासिनः ॥ ५० ॥" . नाम्रलिजको नामोत्पत्ति के विषयमें बहुत से बहुतमो (विहिजयप्रकाश ) बाते कहते हैं, पर अभी तक उमका कोई निर्दय नहीं महावंश ११वां और १९वो परिच्छेद । - Indian Antiquary, Vol, VI, P. 89 N. S. Bealis FaHian.