पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४५६

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साम्ररसायनी वर्ष बाद चीन-परिव्राजक युएनगिने यकामे जहाज ! के रूपमें परिणत एचा होगा। कोई कोई लिखते हैं पर पारोहण किया था, किन्तु उम ममय नगरसे सागर- कि उम ममय यह स्थान कलिङ्गाराज्यके पन्तर्गत था। स्रोत दूर हट गया था । * पाडवविजय नामक मस्कृत भौगोलिक ग्रन्थ में लिखा "कालि गस्ताम्रलिप्तश्च पत्तनाधिपतिस्तथा।" (भारत आदि १८६३१) "ताम्रलिप्तदेशयक्षे भागीरध्यास्तटे नृप। महाभारतके इम वचन के अनुसार यही प्रतीत त्रियोजनपरिमितो गावो यत्र च भूरिशः॥" होता है कि कलिज पोर ताम्रलिप्त विभिन्न राजाके भागोरोके तट पर उत्तरभागमें तीन योजन परि- अधीन भित्र भित्र देश थे। द्रोणपर्व में लिखा है. कि यहां मित ताम्रलिम देश है, जह बहुत गाये हैं। क्षत्रिय राजा भो परशुगम निशित घराघातमे निहत इससे ज्ञात होता है, कि किमो समय गङ्गाको किमो हुए थे। ( भारत द्रोण ७०११) शाखाके निकट ताम्रलिल नगर अवस्थित था। सभापर्व में ऐमा लिखा है, कि राजसूयय त के भोम- दो मौ वर्ष से परलेके लिखे हुए दिग्विजयप्रकाशर्म सेनने यहां के राजाओंको पराजित कर वसूल किया था। लिखा- (सभाप० २९ भ० ) "मण्डलघदक्षिणे व हैजलस्य च त्यत्तरे । कुरुक्षेत्र के महासमरमें यके वोरोंने दुर्योधनका पक्ष राम्रलिप्तप्रदेशव पणिकस्य निवासभूः ॥ लिया था । उनको मलेच्छ कहा गया है। द्वादशयोजनै→क्तः रूपानद्या: समीपतः ॥" ____(द्रोणप० ११८।१५) मण्डलघाटके दक्षिण और हिजलोके उत्तर में बणिको उपयुक्त विवरण के पढ़नेमे यहो माल म होता है, कि को वासभूमि ताम्रलिल प्रदेश १२ योजन विम्त त और महाभारत के समय यहां म्लेच्छोका राज्य था। जैमिनोय रूपा अर्थात् रूपनारायण नदी के निकट अवस्थित है। पाश्वमेधिक पर्व में लिखा है- दिग्विजयपकाग के पढ़नेसे माल म होता है, कि उस जिम ममय मय रध्वज पुत्र ताम्रध्वज पिताके अश्व- समय ताम्रलिल नगर समुद्रकूनमे बहुत दूर था। हां यह मधोय मुक्ता अखको रक्षामें थे, उप ममय अर्जुनका कहा जा सकता है कि कभी कभी बाढका पानो वहां घोटक उनके घोड़े के पाम आया। ताम्रध्वजके सेना- तक प्रा आया करता था। पति बहुलवजने उस घोटक के ललाटस्थ पत्र को पढ़ कर म समय ताम्रलिप्त नगर समुद्र के किनारे नहीं. वल्कि ताम्रध्वजमे उमका हाल कहा। शोघ्र हो योकण गध्र ममुद्र से सोम कोमको दूरी पर अवस्थित है। तमलुक व्य हको रचना करके अखके उद्धार के लिए अग्रसर हुए। शब्दमें वर्तम न अवस्थाका वर्णन देखो। प्रजुन, अनुशाल्व, प्रद्युम, अनिकड, हंसध्वज, मात्यकि, पुरातत्व - साम्रलिल पति प्राचोन जनपद है । वेद, यौवनाख, व वाहन, प्रादि महायोडा भी उनके साथ' उपनिषद अथवा गमायण में दमका कोई उल्लेख न रहने थे। ताम्रध्वज के माथ इनका घोरतर युद्ध हुआ। महा. पर भी महाभारत एवं प्रधान प्रधान मभो पुराणों में वीर ताम्रध्वनने एक एक करके सबको परास्त कर दिया, इसका उल्लेख पाया जाता है। रामायण में ताम्रलिपी औरको तो बात क्या, श्रीकृष्ण और अर्जुन भो मच्छित निकटवर्ती जनपदका उल है, किन्तु इस प्रसिद्ध स्थान- हो गये। मणिपुरमें यह घटना हुई थो। दैवयोगसे का कुछ उमेख न रहने के कारण अनुमान किया ज ता । मय रध्वजका यज्ञोय प्रख और उसके साथ पर्जुनका है, कि उम ममय यह स्थान ममुद्र के गर्भ में होगा और घोड़ा भी रखपुर (ताम्रलिय)को तरफ दौड़ा। ताम्रध्वज महाभारत समय वहांसे समुद्र हट जानसे वह जनपद- भोजष्णार्जुनको मूच्छित अवस्थामें छोड़ कर घोड़. के पीछे दौड़ते हुए अपने पिताको राजधानीमें उपखित Beal's Records of the Western World, पए । उनीने पिताने सबकास का सुनाया । मय रामज