पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४५७

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पत्रके मुसि लगार्जुनके अपमानको बात सुन कर ताम्रलिसमानामा लिना -तमोलिस तीर्थ नितान्त दुखित हुए। उन्होंने पुत्वको बहुत कुछ कहा श्रीक्षणका पतिप्रिय स्थान है। बोलणने स्वयं प्रजुन. सुना और भत्र्सना की। उधर मुर्छा छुट आने पर श्री. से कहा है कि. "हे अर्जुन : तमोलिबसे प्यारा स्थान सण छह बामणके वश पौर अर्जुन बालकके वेशमें मेरा दूमरा नहीं है। लक्ष्मी जैसे मेरे वक्षस्थलको नहीं मय रध्वजके पास पहुंचे। वहां पहुंच कर श्रीकृष्णले छोड़ सकतो. वैसे ही मैं भी तमोमिनको महौं छोड़ छलनापूर्वक मय रध्वजसे कहा, कि 'पापके एक पुत्रको सकता। हे कोन्स य ! तुम निचय समझना, काल काल. सिंहने पकड़ लिया है। यदि गजा उसे अपना प्राधा शरीर में और युग युग मघ कुछ छोड़ मकताई पर समो. प्रदान करें, तो पापके पुत्रको छोड़ मकता है।' धार्मिक लिमको कभी भी नहीं छोड़ सकता।" प्रवर मय रध्वज इस पर गजो हो गये। सरधर्मिणो वर्तमानमें जिष्ण नागयणका मन्दिर, वगंभीमा कुमुदवतो और पुत्र ताम्रध्वज दोनों हो अपना अपना देवी और कपालमोचनतोथ अधिक प्रसिन है। तान- शरोर उत्सग करने के लिए अग्रसर हुए थे । किन्तु गजा. लिममात्मामें लिखा है-कपालमोचनतीर्थ में खान ने उनको बहुत समझा-बुझा कर अपना शरीर हिखण्ड करनेसे जिष्णु नारायण पोर वर्गभीमाके दर्शन करनेमे करने के लिए प्रादेश दिया। भार्या पोर पुत्र दोनों ने मिल पुनर्जन्म नहीं होता। इस तरह के बहुतमे मारामा कर पारीसे राजाका मस्तक विदोग कर डाला। उम सूचक विवरण उस माहात्माग्रन्यमें वर्णित है। समय साधुचेता मय रध्वजने सबको सम्बोधन करके कहा जैनग्रन्यमें भी ताम्रलिप्तका उल्लेख है। सुप्रसिद्ध था-"अन्यके उपकारके लिए जिनका शरीर पोर अर्थ जैनाचार्य जिनमेनखामोने स्वरचित पादिपुराणमें नान- है, वे हो यथार्थ में मनुष्य हैं। जो शरीर वा जो अर्थ । लिप्त नगरका उल्लेख किया है। दूमरेके उपकारमें नहीं पाता, उसको दशा सर्वदा शोच- पम प्रकार बहुत समासे हिन्द, बोज पोर जैनोने नीय रहती है।" प्रसिद्ध होने पर भी बहुत दिनांसे ताम्रलिन्की पुगनो वासुदेव मय रध्वज के निःस्वार्थ प्रात्मोत्सर्ग से अत्यन्त महाममृधि जातो रहो है। प्रब वहाँ वैसे बन्दर नहीं मुग्ध हुए ; उन्होंने अपने असली रूप में दर्शन दिये । ना- रहे। हिन्दू तीर्थ यात्रो इसे तार्थ समझ कर यात्राके नारायणका रूप देख कर मय रध्वजने अपने को कतवत्य लिए नहीं पाते। समझा । अन्तमें वे धन-जन-राज मबको त्याग कर श्री. ताम्रलिप्तको पूर्व महिक्यों और कैसे विलुन अष्णके शरणापत्र हुए। (१) हुरे, हम विषयमें दिग्विजयप्रकाश नामक संस्थत भौगो. तमलुक में अब भी ऐसा प्रवाद प्रचलित है कि, परम- लिक ग्रन्थमें एक उपाख्यान लिखा है, जो नोचे लिखा वैष्णव राजा मयूरध्वजने सर्वदा नर नारायणरूपी कष्णा- जाता है। जुनक सहवाममें रहने और उन्हें देखने के उद्देशासे कायस्यवंशमें परशुधार नामक एक पाशास्त्रविद्या- एक बड़ा भारी मन्दिर बनवा कर उममें दोनोंको मूर्तियां रद राजा उत्पन्न हुए थे जो ताम्रलिप्त और काशजोशाका स्थापित की थी जो अब भी जिष्ण नागयणके नामसे शासन करते थे। उन्होंने बहुत दूरदेयोंसे वैदिक ब्राह्मगों- प्रसिद्ध है। बहुत दिन हुये, वह प्राचीन मन्दिर रूप को बुला कर भोमादेवोके प्रामादमें याग कराया था। नारायगाके गर्भशायी हो गया है। इस समय वे मूर्ति या दैववश किसी ब्राह्मणन आकर इनसे १०० भर चांदा एक दूसरी मन्दिरमें रक्खी है। वर्तमान मन्दिर चार मांगी। राजा परशुधारने पूछा-"पाप कसे पाये है पाँच सौ वर्ष मे ज्यादा प्राचोन नहीं होगा। पोर क्यों धन मांग रहे हैं ? ब्राणने उत्तर दिया- (१) जैमिनिभारत से ४६ अध्याय । बंगला काशीवासी । 'भागोरथोके उत्तरम कौशिकोमदोके किनारे माड़वपुरका महाभारतमें भी यह गल्प है, किन्तु मूल भारतमें इसका नामो- मैं रहनेवालाई भार समाबगोवमें मेरा जन्म है। निशान नहीं है। मुझे तीन विवाह करने होंगे। यदि तुम अपनाको Vol. IX. 114.. .